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सात दशक पुरानी विरासत का अंत: Assam Vani का सफ़र
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Assam Vani का अंतिम अंक और मौन प्रबंधन

नव ठाकुरिया
गुवाहाटी स्थित Assam Tribune Group के अख़बारों पर कोविड-19 महामारी के बाद गहराए संकट के बीच एक लोकप्रिय असमिया साप्ताहिक अख़बार (Assam Vani) 2025 के अंत में बंद हो गया। दशकों तक असमिया पाठकों के लिए मुख्यधारा का साप्ताहिक रहा ‘असम वाणी’ पिछले वर्ष सितंबर से प्रकाशन से बाहर हो गया, क्योंकि प्रबंधन ने हर शुक्रवार इसके मुद्रण को जारी रखने में रुचि नहीं दिखाई।
हालाँकि सात दशक पुराना यह असमिया साप्ताहिक अख़बार स्टॉलों से ग़ायब हो गया, लेकिन प्रबंधन की ओर से ‘असम वाणी’ को लेकर कोई औपचारिक बयान नहीं आया। इससे पहले इस साप्ताहिक को मीडिया हाउस के प्रतिष्ठित असमिया दैनिक Dainik Asom के साथ शुक्रवार के परिशिष्ट (सप्लीमेंट) के रूप में मर्ज कर दिया गया था।
कभी सतीश चंद्र काकती, तिलक हज़ारिका, फणी तालुकदार, निरोद चौधरी, होमेन बरगोहेन और चंद्रप्रसाद सैकिया जैसे प्रतिष्ठित असमिया पत्रकार-लेखकों द्वारा संपादित इस साप्ताहिक के अंतिम संपादक दिलीप चंदन थे, जिन्होंने लगभग तीन दशकों तक ‘असम वाणी’ में कार्य किया। इस साप्ताहिक की स्थापना 1 जुलाई 1955 को प्रसिद्ध असमिया उद्यमी राधा गोविंद बरुआ ने की थी।
अपने लंबे सफ़र के दौरान ‘असम वाणी’ ने असमिया माध्यम शिक्षा आंदोलन, असम में घुसपैठ के विरुद्ध संघर्ष, उग्रवाद के अचानक उभार, सामाजिक अशांति, क्षेत्रीय राजनीति के विकास और स्थानीय समाज में बदलती जनभावनाओं जैसे कई महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक घटनाक्रमों को नज़दीक से देखा और रिपोर्ट किया।
महामारी के बाद Assam Tribune Group द्वारा प्रकाशित सभी अख़बारों के सर्कुलेशन में भारी गिरावट आई, जिसका सीधा असर व्यावसायिक विज्ञापनों से मिलने वाले राजस्व पर पड़ा। देश के अन्य मीडिया संस्थानों की तरह इस समूह को भी गंभीर वित्तीय संकट का सामना करना पड़ा। हालात ऐसे बने कि कार्यरत पत्रकारों और कर्मचारियों को अनियमित वेतन मिलने लगा।
कर्मचारी यूनियन सेवानिवृत्त कर्मचारियों के बकाया भुगतान सहित कई मुद्दों को लेकर सार्वजनिक रूप से सामने आई। यूनियन नेताओं ने आरोप लगाया कि राज्य सूचना एवं जनसंपर्क निदेशालय से प्रकाशित सरकारी विज्ञापनों के एवज में समूह को बड़ी राशि का भुगतान नहीं किया गया।
इसी बीच पूरे मीडिया समूह को शहर के किसी अन्य टेलीविज़न नेटवर्क को बेचे जाने की अफ़वाहें फैलने लगीं, जिन्हें असम ट्रिब्यून प्रबंधन ने सख़्ती से ख़ारिज किया। एक आधिकारिक बयान में प्रबंधन ने अपनी “संपादकीय स्वतंत्रता, पत्रकारिता की विश्वसनीयता तथा पाठकों, विज्ञापनदाताओं और हितधारकों को निरंतर सेवा देने” की प्रतिबद्धता दोहराई और लोगों से “बेबुनियाद अटकलों पर ध्यान न देने” की अपील की।
गौरतलब है कि समूह का प्रमुख समाचारपत्र The Assam Tribune 4 अगस्त 1939 को शुरू हुआ था, जिसके पहले संपादक लक्ष्मीनाथ फुकन थे। यह आज भी पूर्वोत्तर भारत का सबसे अधिक प्रसारित अंग्रेज़ी दैनिक है।
हालाँकि, आर. जी. बरुआ के दूसरे पुत्र प्रफुल्ल गोविंद बरुआ के नेतृत्व वाला प्रबंधन—जिनका हाल ही में 14 दिसंबर को 93 वर्ष की आयु में निधन हुआ—ने छह दशक से अधिक पुराने ‘दैनिक असम’ की ज़िम्मेदारी युवा उद्यमी किशोर बोरा के मीडिया समूह को सौंप दी। किशोर बोरा का समूह असमिया न्यूज़ चैनल ND24 का संचालन करता है।
यह सौदा पिछले वर्ष 17 सितंबर को सार्वजनिक हुआ, जिसके बाद नए प्रबंधन ने ‘दैनिक असम’ का प्रकाशन संभाल लिया, लेकिन ‘असम वाणी’ की ज़िम्मेदारी लेने में कोई रुचि नहीं दिखाई। परिणामस्वरूप, ‘दैनिक असम’ के परिशिष्ट के रूप में ‘असम वाणी’ का अंतिम अंक 12 सितंबर को प्रकाशित हुआ।
मीडिया विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रिब्यून हाउस लंबे समय तक अपनी सूचना-प्रणाली, संपादकीय विचारों और लेखन की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए जाना जाता था, लेकिन हाल के वर्षों में इन्हीं मूल्यों से काफी हद तक समझौता किया गया। इसके प्रमुख अख़बार The Assam Tribune ने 2019 में शुरू हुए नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) विरोधी आंदोलन को खुला समर्थन दिया और उसे व्यापक कवरेज दी। इस दौरान पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से आए सताए हुए हिंदू, सिख, बौद्ध और ईसाई परिवारों को नागरिकता देने की केंद्र सरकार की पहल की तीखी आलोचना की गई। इस आंदोलन के कारण असम की ब्रह्मपुत्र घाटी कई हफ्तों तक उथल-पुथल में रही।
इसके अलावा, असम के लोग अब भी याद करते हैं कि पाँच वर्ष पहले गुवाहाटी प्रेस क्लब चुनावों के दौरान The Assam Tribune में प्रकाशित कुछ रिपोर्टें पक्षपातपूर्ण, गैर-ज़िम्मेदार और प्रेस क्लब के एक पूर्व सचिव के चरित्र हनन से जुड़ी थीं, जिससे अख़बार की साख पर सवाल खड़े हुए।
आज Assam Tribune Group की वित्तीय स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। यह संकट केवल महामारी का परिणाम नहीं है, बल्कि कुछ अहंकारी मीडिया पेशेवरों की भूमिका ने हालात को और जटिल बना दिया, जिन्होंने संस्थान में सभी सुविधाओं का लाभ उठाया, लेकिन अव्यवस्था फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी—और हैरानी की बात यह रही कि प्रबंधन मूक दर्शक बना रहा।

