नेपाल (Nepal) में चुनाव (Election) की घंटियाँ, क्या ओली (Oli) कर पाएंगे वापसी?

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नव ठाकुरीया

Nepal एक बार फिर राष्ट्रीय चुनाव (National Election) की दहलीज़ पर खड़ा है। 5 मार्च को होने वाले ये चुनाव उस अभूतपूर्व राजनीतिक उथल-पुथल के बाद अनिवार्य हो गए, जब सितंबर 2025 में युवा विद्रोह अपने चरम पर पहुँचा और केपी शर्मा ओली (KP Sharma Oli) की सरकार गिर गई।

हिमालयी राष्ट्र नेपाल में पिछला आम चुनाव वर्ष 2022 में हुआ था और अगला चुनाव सामान्यतः 2027 में प्रस्तावित था। लेकिन पिछले वर्ष संसद भंग होने के बाद सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में गठित अंतरिम सरकार की निगरानी में चुनावी प्रक्रिया शुरू की गई।

करीब 2.9 करोड़ की आबादी वाले इस हिंदू-बहुल देश में इस बार चुनावी मुकाबला बेहद रोचक माना जा रहा है। चार पूर्व प्रधानमंत्री मैदान में उतरने की तैयारी में हैं, जबकि तीन मौजूदा मेयर भी अपनी राजनीतिक किस्मत आज़माने जा रहे हैं।

पद से हटाए गए पूर्व प्रधानमंत्री और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) के नेता केपी शर्मा ओली झापा-5 संसदीय सीट से चुनाव लड़ेंगे। उनका मुकाबला काठमांडू महानगर के पूर्व मेयर बालेन्द्र शाह से होगा, जिन्होंने हाल ही में मेयर पद से इस्तीफा देकर राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का दामन थामा है।

इंजीनियर से रैपर और फिर राजनेता बने बालेन्द्र शाह पिछले वर्ष सरकार-विरोधी आंदोलनों के प्रमुख चेहरों में शामिल रहे। स्थानीय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चार बार प्रधानमंत्री रह चुके ओली के लिए यह चुनाव आसान नहीं होगा।

ओली ने हाल ही में आरोप लगाया था कि काठमांडू में उनकी सरकार गिराने के पीछे कुछ विदेशी शक्तियों की भूमिका रही, जिन्होंने नेपाली नागरिकों को उकसाया। उनका दावा है कि जिस विद्रोह में 77 नागरिकों की मौत हुई और लगभग 84 अरब नेपाली रुपये की सरकारी व निजी संपत्ति को नुकसान पहुँचा, वह स्वतःस्फूर्त नहीं बल्कि सुनियोजित था।

उन्होंने यह भी कहा कि श्रीलंका और बांग्लादेश के बाद नेपाल को भी दक्षिण एशिया में लोकतंत्र को अस्थिर करने वाली ताकतों ने निशाना बनाया। विभिन्न मौकों पर ओली भारत-विरोधी टिप्पणियाँ करते रहे हैं और नेपाल के प्रति नई दिल्ली की विदेश नीति की आलोचना भी की है—जबकि नेपाल की सीमाएँ तिब्बत (अब चीन के अधीन) से भी लगती हैं।

इस चुनाव में मैदान में उतरने वाले अन्य पूर्व प्रधानमंत्रियों में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी सेंटर) के अध्यक्ष पुष्पकमल दहल उर्फ़ प्रचंड, प्रगतिशील लोकतांत्रिक पार्टी के बाबूराम भट्टराई और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के माधव कुमार नेपाल शामिल हैं।

हालाँकि, दो पूर्व प्रधानमंत्री—नेपाली कांग्रेस के शेर बहादुर देउबा और एनसीपी के झाला नाथ खनाल—ने चुनाव न लड़ने का फैसला किया है। देउबा को पार्टी के भीतर गहरे विभाजन के कारण चुनावी राजनीति से दूरी बनानी पड़ी।

मेयर पद से चुनावी राजनीति में उतरने वालों में बालेन्द्र शाह के अलावा धरान उप-महानगरपालिका के मेयर हरका संपंग और भरतपुर महानगरपालिका की मेयर रेणु दहल भी शामिल हैं। उल्लेखनीय है कि रेणु दहल, माओवादी आंदोलन के नेता प्रचंड की पुत्री हैं।

कट्टर कम्युनिस्ट नेता प्रचंड ने 2008 में नेपाल की सदियों पुरानी हिंदू राजशाही को समाप्त करने में निर्णायक भूमिका निभाई थी। नेपाल के अंतिम राजा ज्ञानेंद्र शाह, जो अब एक सामान्य नागरिक की तरह जीवन व्यतीत कर रहे हैं, ने हाल ही में नेपाली राजनीतिक नेतृत्व की विदेश नीति पर तीखी टिप्पणी की है।

अपने पूर्वज पृथ्वी नारायण शाह की 304वीं जयंती और राष्ट्रीय एकता दिवस के अवसर पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए पूर्व राजा ने कहा कि बीते दो दशकों में राजनीतिक नेतृत्व ने देश को लगातार संकट में डाला है और राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध असंतुलित विदेश नीति अपनाई है।

इस बीच, नेपाल सरकार और विभिन्न राजनीतिक दलों के अनुरोध पर भारत लगातार चुनावी सहायता प्रदान कर रहा है। हाल ही में दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत ने काठमांडू को चुनाव तैयारियों के लिए 60 से अधिक वाहन और अन्य सामग्री सौंपी। नेपाल के गृह मंत्री ओम प्रकाश आर्यल ने यह सहायता भारतीय राजनयिक राकेश पांडे से औपचारिक रूप से ग्रहण की।

प्रमुख नेपाली दैनिक द काठमांडू पोस्ट के अनुसार, मंत्री आर्यल ने इस सहयोग के लिए भारत का आभार जताते हुए कहा कि यह दोनों पड़ोसी देशों के बीच विश्वास और मित्रता की गहराई को दर्शाता है। गौरतलब है कि वर्ष 2008 से भारत नेपाल को चुनावी सहायता देता आ रहा है और इस बार 600 से अधिक वाहन उपलब्ध कराने की योजना है।

(लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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