अक्सर जब हम ‘भारतीय’ होने की बात करते हैं, तो हमारा ध्यान नागरिकता, आधार कार्ड, पासपोर्ट या मतदाता पहचान पत्र जैसे वैधानिक दस्तावेज़ों की ओर चला जाता है। संवैधानिक दृष्टि से यह अनुचित भी नहीं है। भारत में नागरिकता मूलतः एक ऐसा सामाजिक अनुबंध है, जो हमें मताधिकार, सुरक्षा और विविध सुविधाएँ प्रदान करता है।
किन्तु प्रश्न यह है कि क्या 140 करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले इस जीवंत राष्ट्र की पहचान केवल काग़ज़ी दस्तावेज़ों तक सीमित की जा सकती है? कदापि नहीं। वास्तव में ‘भारतीय’ होना भूगोल और राजनीति के मानचित्रों से कहीं परे एक चेतना है—एक भाव, एक संस्कार और जीवन जीने का विशिष्ट दर्शन है। नागरिकता जहाँ हमें निवास का वैधानिक पता देती है, वहीं भारतीयता हमें हमारी वास्तविक पहचान का बोध कराती है।
यह पहचान उस असाधारण स्वीकार्यता में निहित है, जो हमें सहस्रों भाषाओं, सैकड़ों बोलियों और विविध मत-पंथों के बावजूद एक अदृश्य, अटूट सूत्र में पिरोती है। भारतीयता का वास्तविक मर्म उस समरसता में है, जहाँ मंदिर के घंटे की ध्वनि, मस्जिद की अज़ान, गुरुद्वारे की गुरबाणी, बौद्ध स्तूपों के धम्म-चक्र और चर्च की प्रार्थना में एक ही शाश्वत सत्य की प्रतिध्वनि सुनाई देती है।
जब हम पंजाब के स्वर्णिम खेतों से लेकर केरल के शांत जलक्षेत्र तक, और कच्छ के श्वेत रण से लेकर पूर्वोत्तर की हरित पहाड़ियों तक फैली सांस्कृतिक विरासत को आत्मसात करते हैं, तब हम नागरिकता के संकीर्ण दायरे से निकलकर भारतीयता के उस वृहद आकाश को स्पर्श करते हैं, जहाँ कृत्रिम भेद स्वतः विलीन हो जाते हैं। ‘विविधता में एकता’ यहाँ केवल एक नारा नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक धड़कन है।
वैश्वीकरण आज विश्व के लिए एक आधुनिक आर्थिक परिघटना हो सकता है, किन्तु भारत की मिट्टी में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का बीज युगों पूर्व रोपा जा चुका है। भारतीय होने का अर्थ है—अपने द्वार पर आए अतिथि में नारायण के दर्शन करना, अर्थात् ‘अतिथि देवो भव’ की संस्कृति को जीना। अपनी थाली का एक अंश किसी क्षुधित के लिए सुरक्षित रखना; दीन-दुखियों, वंचितों और ज़रूरतमंदों के लिए अपने हृदय के द्वार सदैव खुले रखना—यही हमारी मौलिक उदारता है।
जाति, धर्म, भाषा और लिंग के पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर दूसरों की पीड़ा में सहभागी होना ही वह सांस्कृतिक तत्व है, जो हमें एक भीड़ से अलग कर एक राष्ट्र के रूप में परिभाषित करता है।
भारतीयता विरोधाभासों के बीच अद्भुत संतुलन साधने की कला का नाम भी है। हम वह विलक्षण समाज हैं, जो मंगलयान और चंद्रयान जैसे जटिल वैज्ञानिक अभियानों की सफलता को अपनी प्राचीन परम्पराओं के साथ मनाता है। हम अपनी जड़ों से दृढ़ता से जुड़े रहकर अंतरिक्ष की गहराइयों को नापने का साहस रखते हैं।
यही शौर्य और संकल्प हमारी सीमाओं पर और भी प्रखर हो उठता है। जब हमारे वीर सैनिक शून्य से नीचे के तापमान या तपते रेगिस्तानों में शत्रुओं का सामना करते हैं, तो उनकी रगों में दौड़ता भारतीयत्व ही उनकी सबसे बड़ी शक्ति होता है। वे केवल शस्त्रों से नहीं, बल्कि अदम्य इच्छाशक्ति से लड़ते हैं। रणभूमि में जब वे प्राणों की बाज़ी लगाते हैं, तो ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम्’ के गगनभेदी जयघोष के साथ अपने इष्ट और अपनी रेजिमेंट के ध्येय-वाक्य का उद्घोष करते हैं। यह राष्ट्रभक्ति और आत्मिक गौरव का वह दुर्लभ संगम है, जो एक साधारण नागरिक को वीर और एक सैनिक को अजेय बना देता है।
अंततः, नागरिकता जहाँ अधिकारों का दावा करती है, वहीं भारतीयता कर्तव्यों का बोध कराती है और संविधान सम्मत आचरण के लिए प्रेरित करती है। जब कोई व्यक्ति सड़क पर पड़ा कूड़ा यह सोचकर उठाता है कि “यह मेरा देश है,” तब वह विधिक परिभाषाओं से ऊपर उठ जाता है। दस्तावेज़ हमें इस भू-भाग का वैधानिक निवासी बना सकते हैं, किंतु हमारे कर्म, बंधुत्व और करुणा ही हमें सच्चा ‘भारतीय’ बनाते हैं।
यह वही नैसर्गिक गौरव है, जो राष्ट्रगान की प्रथम स्वरलहरी बजते ही रोंगटे खड़े कर देता है।
इसलिए, आइए हम केवल आँकड़ों वाले नागरिक न बनें, बल्कि अपने आचरण से सच्चे भारतीय बनें—राष्ट्र के प्रति अटूट निष्ठा रखें, उसकी कमियों को सुधारने का उत्तरदायित्व लें और अपना जीवन देश की आन-बान-शान के लिए समर्पित करें।


