वैश्विक व्यापार नीति में एक बड़े बदलाव के तहत अमेरिका (US) ने भारतीय वस्तुओं पर शुल्क घटाकर 18% कर दिया है। यह फैसला लंबे समय से चली आ रही व्यापारिक तनातनी के अंत का संकेत है और भारत–अमेरिका आर्थिक संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत करता है। पहले कई भारतीय निर्यातों पर शुल्क लगभग 50% तक पहुंच गया था, जिसे अब हटाकर 18% की सीमा में लाया गया है। इसे दोनों देशों के बीच हाल के वर्षों का सबसे बड़ा “ट्रेड रीसेट” माना जा रहा है।
लेकिन यह समझौता केवल सस्ते निर्यात तक सीमित नहीं है — यह ऊर्जा, निवेश, भू-राजनीति और वैश्विक सप्लाई चेन से जुड़ा एक रणनीतिक आर्थिक पुनर्संरेखण है।
क्या बदला है
नई टैरिफ व्यवस्था के तहत भारतीय उत्पादों की एक बड़ी श्रृंखला को राहत दी गई है, जिनमें शामिल हैं:
- वस्त्र
- फार्मास्यूटिकल्स
- केमिकल्स
- इंजीनियरिंग उत्पाद
- ऑटो कंपोनेंट्स
- रत्न व आभूषण
- सीफूड
- मशीनरी
- उपभोक्ता वस्तुएं
18% की सीमा तय होने से भारतीय उत्पाद अब अमेरिकी बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी होंगे, जिससे निर्यातकों को बाजार हिस्सेदारी वापस पाने में मदद मिलेगी और वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग नेटवर्क में भारत की भूमिका और मजबूत होगी।
रूसी तेल से जुड़ी शर्त
इस टैरिफ राहत की एक अहम शर्त भारत का रूसी कच्चे तेल से धीरे-धीरे दूरी बनाना है।
वॉशिंगटन ने भारत द्वारा रूस से बढ़ते तेल आयात पर चिंता जताई थी। इसी के चलते टैरिफ में कटौती को भारत की इस प्रतिबद्धता से जोड़ा गया है कि वह ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाएगा और रूस के साथ नए दीर्घकालिक तेल अनुबंध नहीं करेगा।इसका मतलब तुरंत आयात रोकना नहीं है, बल्कि वैकल्पिक आपूर्तिकर्ताओं — जिनमें अमेरिका और उसके सहयोगी देश शामिल हैं — की ओर चरणबद्ध बदलाव है।
500 अरब डॉलर का व्यापार विस्तार लक्ष्य
टैरिफ कटौती के साथ ही दोनों देशों ने एक दीर्घकालिक ढांचा भी तैयार किया है, जिसके तहत भारत आने वाले वर्षों में अमेरिका से 500 अरब डॉलर तक के सामान का आयात कर सकता है। इसमें शामिल हैं:
- तेल और एलएनजी
- रक्षा प्रणालियां
- वाणिज्यिक विमान
- कृषि उत्पाद
- औद्योगिक मशीनरी
- टेक्नोलॉजी और सेमीकंडक्टर
यह कोई एकमुश्त सौदा नहीं, बल्कि द्विपक्षीय व्यापार को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की रणनीति है।
भारत में अमेरिकी निवेश का रास्ता
यह समझौता केवल व्यापार नहीं, बल्कि बड़े पैमाने पर अमेरिकी निवेश का भी द्वार खोलता है। कम शुल्क के कारण भारत अब अमेरिकी कंपनियों के लिए एक आकर्षक मैन्युफैक्चरिंग बेस बन गया है, जहां वे:
- उत्पादन इकाइयां स्थापित कर सकती हैं
- सप्लाई-चेन हब बना सकती हैं
- जॉइंट वेंचर कर सकती हैं
- रक्षा और ऊर्जा ढांचा बढ़ा सकती हैं
- हाई-टेक व सेमीकंडक्टर सुविधाएं विकसित कर सकती हैं
यानी यह डील दीर्घकालिक एफडीआई का इंजन भी है।
आर्थिक प्रभाव
इस समझौते से:
- भारतीय निर्यात बढ़ेगा
- मैन्युफैक्चरिंग मजबूत होगी
- विदेशी प्रत्यक्ष निवेश में वृद्धि होगी
- रोजगार सृजित होंगे
- भारत वैश्विक सप्लाई चेन में और गहराई से जुड़ेगा
बाजारों ने भी इस पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है।
रणनीतिक संदेश
यह सिर्फ टैरिफ कटौती नहीं, बल्कि भारत–अमेरिका रणनीतिक साझेदारी की गहराई को दर्शाता है — जहां व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग और भू-राजनीतिक तालमेल एक साथ आगे बढ़ रहे हैं।
एक पंक्ति में
18% टैरिफ समझौता एक साथ ट्रेड रीसेट, ऊर्जा बदलाव, 500 अरब डॉलर का विज़न और निवेश का प्रवेशद्वार है।
18% टैरिफ डील और भारत में अमेरिकी निवेश का संबंध
1. भारत बना सस्ता एक्सपोर्ट बेस
18% की सीमा के बाद अमेरिकी कंपनियां भारत को कम लागत वाले मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में देखने लगी हैं। इससे:
- चीन/वियतनाम से भारत में शिफ्टिंग
- भारतीय कंपनियों के साथ जॉइंट वेंचर
- सप्लायर बेस का विस्तार
संभव होगा।
2. सप्लाई चेन शिफ्ट रणनीति
यह डील अमेरिका की उस नीति का हिस्सा है, जिसके तहत सप्लाई चेन को संवेदनशील क्षेत्रों से हटाकर भारत में लाया जा रहा है। इसमें शामिल हैं:
- इलेक्ट्रॉनिक्स
- रक्षा उत्पादन
- सेमीकंडक्टर
- ग्रीन एनर्जी उपकरण
- औद्योगिक कंपोनेंट्स
3. ऊर्जा और रक्षा सौदे निवेश भी लाएंगे
500 अरब डॉलर के आयात ढांचे को पूरा करने के लिए अमेरिकी कंपनियों को भारत में:
- स्थानीय ऑपरेशन
- सर्विस व मेंटेनेंस हब
- मैन्युफैक्चरिंग साझेदारी
करनी होगी — जिससे निवेश और रोजगार बढ़ेंगे।
4. भारत का एफडीआई माहौल मजबूत
कम टैरिफ से निर्यात जोखिम घटेगा, जिससे:
- क्रेडिट आउटलुक सुधरेगा
- अमेरिकी संस्थागत निवेश आएगा
- मैन्युफैक्चरिंग एफडीआई बढ़ेगा
- वैश्विक साझेदार के रूप में भारत की साख मजबूत होगी
एक लाइन का जवाब
हां — यह टैरिफ कटौती सिर्फ निर्यात नहीं, बल्कि भारत में बड़े पैमाने पर अमेरिकी निवेश का प्रवेश द्वार है।


