नई दिल्ली। भारत ने अमेरिका के साथ व्यापार समझौते (India–US Trade Deal) पर किसी भी तरह के दबाव को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट कर दिया कि वह “बुली” होकर कोई समझौता नहीं करेगा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत बातचीत को लेकर इतना आश्वस्त और धैर्यवान था कि अगर जरूरत पड़ती तो वह अमेरिका के मौजूदा राष्ट्रपति कार्यकाल के अंत यानी 2029 तक इंतजार करने को भी तैयार था।
अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्था ब्लूमबर्ग के हवाले से आई रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने अमेरिकी सांसदों से साफ शब्दों में कहा था कि भारत किसी भी कीमत पर अपनी संप्रभुता और आर्थिक हितों से समझौता नहीं करेगा।
ट्रंप के ऐलान से मचा सियासी हलचल
हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सार्वजनिक मंच से इस ट्रेड डील को अपनी बड़ी उपलब्धि के तौर पर पेश किया। हालांकि भारत सरकार के सूत्रों का कहना है कि उस वक्त तक समझौते के सभी तकनीकी और कानूनी पहलुओं पर सहमति नहीं बनी थी। इससे भारत में यह सवाल उठा कि क्या अमेरिका ने जल्दबाजी में राजनीतिक घोषणा कर दी।
कृषि और डेयरी ‘रेड लाइन’
सरकार के अनुसार, भारत ने बातचीत के दौरान कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को लेकर कोई समझौता नहीं किया। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने संसद में कहा कि यह डील राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए तैयार की गई है और इससे किसानों या घरेलू उद्योग को नुकसान नहीं होने दिया जाएगा।
विपक्ष का विरोध और पारदर्शिता की मांग
ट्रेड डील को लेकर विपक्ष और किसान संगठनों ने कड़ा विरोध जताया है। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने आरोप लगाया कि सरकार समझौते के पूरे ब्योरे को संसद और जनता से छिपा रही है। विपक्ष का कहना है कि अगर शर्तें इतनी मजबूत हैं तो सरकार को पूरी डील सार्वजनिक करनी चाहिए।
रणनीतिक धैर्य की मिसाल
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत का यह रुख रणनीतिक धैर्य का उदाहरण है। भारत ने साफ कर दिया कि वह जल्दबाजी में किसी वैश्विक ताकत के दबाव में समझौता नहीं करेगा। यूरोपीय संघ और अन्य देशों के साथ समानांतर बातचीत कर भारत ने यह भी संकेत दिया कि उसके पास विकल्प मौजूद हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह संदेश दिया है कि भारत अब वैश्विक व्यापार में आत्मविश्वास के साथ, बराबरी की शर्तों पर और दीर्घकालिक लाभ को ध्यान में रखकर आगे बढ़ रहा है।

