No-Confidence Notice: 118 सांसदों का समर्थन, पर क्या मिलेगा बहुमत?

No-Confidence Notice: 118 सांसदों का समर्थन, पर क्या मिलेगा बहुमत?
74 / 100 SEO Score

लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास नोटिस: संख्या, कानून और आगे की राह

 

 

by Ashis Sinha

लोकसभा  (Lok Sabha)अध्यक्ष ओम बिरला  (Om Birla) के खिलाफ 118 विपक्षी सांसदों के अविश्वास नोटिस  (No-Confidence Notice)के बाद उठे सवाल — संख्या बल, संवैधानिक प्रक्रिया और संभावित राजनीतिक परिणाम का विश्लेषण।

 

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ 118 विपक्षी सांसदों द्वारा दिया गया अविश्वास नोटिस (No-Confidence Notice) इस सवाल पर बहस छेड़ रहा है कि क्या आरोप वास्तव में ठोस चुनौती में बदल सकते हैं — खासकर सदन की मौजूदा संख्या-बल और अध्यक्ष को हटाने से जुड़े कानूनी ढाँचे को देखते हुए।

545 सदस्यों की स्वीकृत संख्या वाली लोकसभा में कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्षी गठबंधन स्पष्ट बहुमत से काफी दूर है। नोटिस दाखिल करना प्रक्रिया की न्यूनतम शर्त पूरी करता है, लेकिन संसदीय विशेषज्ञों का कहना है कि प्रस्ताव को टिकाए रखने के लिए सदन में बहुमत समर्थन जुटाना होगा — जो केवल नोटिस दाखिल करने से कहीं अधिक कठिन मानक है।


संख्या बनाम प्रक्रिया

संसदीय नियमों के तहत अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव निर्धारित नोटिस के बाद स्वीकार किया जाता है और सूचीबद्ध कर मतदान के लिए लाया जाता है। इसे पारित होने के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का बहुमत आवश्यक होता है।
118 हस्ताक्षरों से विपक्ष ने राजनीतिक असहमति तो प्रदर्शित की है, पर संख्या-बल का प्रभुत्व नहीं। यदि अन्य दल समर्थन नहीं देते, तो यह प्रस्ताव गणितीय दृष्टि से गंभीर चुनौती का सामना करेगा।

कुछ विपक्षी दलों — विशेषकर तृणमूल कांग्रेस — के समर्थन के अभाव ने संख्या को और कमजोर किया है, जिससे संकेत मिलता है कि फिलहाल यह नोटिस परिणाम तय करने से अधिक प्रतीकात्मक या रणनीतिक कदम हो सकता है।


कानूनी और संवैधानिक ढाँचा

यह प्रक्रिया संविधान के प्रावधानों और लोकसभा के प्रक्रिया-नियमों से संचालित होती है। प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद:

  • अनिवार्य नोटिस अवधि के बाद चर्चा तय की जाती है

  • अध्यक्ष सामान्यतः अपनी ही पदच्युति से जुड़ी कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं करते

  • मतदान कराया जाता है, और उपस्थित व मतदान करने वालों का साधारण बहुमत परिणाम तय करता है

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि पक्षपात जैसे आरोप राजनीतिक प्रकृति के होते हैं और संसद के भीतर न्यायिक तरीके से तय नहीं किए जाते। उनकी “वैधता” बहस और मतदान से निर्धारित होती है, जब तक कि अलग से कोई संवैधानिक मुकदमा न उठे।


संभावित परिदृश्य

मतदान में प्रस्ताव असफल
यदि मौजूदा संख्या कायम रहती है, तो यही सबसे संभावित स्थिति है — जिससे सरकार की स्थिति मजबूत होगी और मामला प्रक्रियात्मक रूप से समाप्त हो जाएगा।

विपक्ष का व्यापक एकजुट होना
अगर अतिरिक्त दल समर्थन देते हैं, तो बहस राजनीतिक रूप से अधिक प्रभावशाली बन सकती है, भले सफलता अनिश्चित रहे।

राजनीतिक संदेश का मंच
मतदान के परिणाम से इतर, यह नोटिस विपक्ष के लिए अपनी शिकायतें उजागर करने और आगामी सत्रों से पहले जन-विमर्श को प्रभावित करने का माध्यम बन सकता है।


आगे की दिशा

यह नोटिस संसदीय टकराव की तीव्रता को दर्शाता है, लेकिन इसका भविष्य आरोपों से अधिक संख्या-बल पर निर्भर करेगा। भारत की संसदीय प्रणाली में अध्यक्ष को हटाने का फैसला अंततः सदन के पटल पर — आरोपों से नहीं, बल्कि संख्याओं से तय होता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *