सच्ची घर वापसी : अपने मूल संस्कार, संस्कृति और स्वदेश का आत्म-साक्षात्कार

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प्रो. (डा.) मनमोहन प्रकाश

 

‘सच्ची घर वापसी’ का व्यापक अर्थ—मूल संस्कारों, भारतीय संस्कृति और स्वदेश के प्रति राष्ट्रनिष्ठा की ओर लौटने की प्रेरक व्याख्या।

‘घर वापसी’ शब्द प्रायः धार्मिक या संकीर्ण वैचारिक बहसों तक सीमित कर दिया जाता है, जबकि इसके मर्म में निहित अर्थ कहीं अधिक व्यापक, सकारात्मक और राष्ट्रबोध से जुड़ा हुआ है। यदि इसे समग्र दृष्टि से देखा जाए, तो ‘घर वापसी’ का आशय अपने मूल संस्कारों, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्र के प्रति आत्मीय निष्ठा की ओर लौटने से है। यहाँ ‘घर’ किसी भौतिक संरचना या सीमित पहचान का नाम नहीं, बल्कि वह राष्ट्र है जो हमारी जन्मभूमि और कर्मभूमि होने के साथ-साथ हमारी पहचान, सुरक्षा और स्वाभिमान का शाश्वत आधार है।

सच्ची घर वापसी का प्रथम और अनिवार्य सोपान है—स्वदेश हित में सोचना, बात करना और कर्म करना। निस्संदेह आलोचना लोकतंत्र की संजीवनी है, किंतु जब यही आलोचना राष्ट्र की संस्थाओं को दुर्बल करने लगे, उसकी अखंडता पर प्रहार करे या शत्रु शक्तियों को वैचारिक बल प्रदान करने लगे, तब वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि आत्मघाती विघटन का रूप ले लेती है। सच्ची राष्ट्रनिष्ठा का अर्थ यह नहीं कि नीतियों पर प्रश्न न उठाए जाएँ, बल्कि यह है कि विमर्श प्रखर और तथ्याधारित हो, किंतु राष्ट्र की एकता और संप्रभुता सर्वोपरि बनी रहे।

वस्तुतः राष्ट्र केवल मानचित्र पर खिंची रेखाओं का समूह नहीं होता; वह साझा इतिहास, गौरवशाली संस्कृति और असंख्य बलिदानों से निर्मित एक जीवंत चेतना है। इस दृष्टि से ‘घर वापसी’ का सबसे महत्वपूर्ण आयाम अपने उन संस्कारों और सांस्कृतिक मूल्यों से पुनः जुड़ना है, जिनसे हम आधुनिकता की अंधी दौड़ या बाह्य प्रभावों के कारण विमुख होते जा रहे हैं। जब कोई नागरिक अपनी सांस्कृतिक थाती को पहचानकर उसे आत्मसात करता है और उसके संरक्षण-संवर्धन के लिए प्रतिबद्ध होता है, तभी उसका वास्तविक आत्म-साक्षात्कार होता है। देश की आन-बान-शान के लिए स्वयं को अर्पित करने का भाव ही वह कसौटी है, जो नागरिक को राष्ट्ररूपी ‘घर’ से जोड़ती है।

यह राष्ट्रबोध केवल सीमाओं पर तैनात सैनिकों तक सीमित नहीं होना चाहिए। एक निष्ठावान शिक्षक, वैज्ञानिक, किसान, श्रमिक, उद्यमी, प्रशासक या जनप्रतिनिधि—सभी के आचरण में राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व समान रूप से प्रतिबिंबित होना चाहिए। राष्ट्रहित में अपने-अपने क्षेत्र में ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ कार्य करना भी राष्ट्रसेवा का सशक्त रूप है।

घर वापसी का एक साहसी और अनिवार्य पक्ष उन भटके हुए स्वरों को भी मुख्यधारा से जोड़ना है, जो जाने-अनजाने में राष्ट्रविरोधी विमर्श या गतिविधियों का हिस्सा बन जाते हैं। राष्ट्रीय अस्मिता और अखंडता के प्रश्न पर तटस्थता सदैव सद्गुण नहीं होती; कई अवसरों पर यह मौन कायरता का पर्याय बन जाती है। जब कोई भारतीय राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का परित्याग कर राष्ट्रहितैषी आचरण की ओर लौटता है, तो वह भी ‘घर वापसी’ का एक सशक्त रूप है।

राष्ट्रविरोधी गतिविधियाँ वे विचार, क्रियाएँ या आंदोलन हैं जो देश की एकता, संप्रभुता, संविधान और राष्ट्रीय हितों को क्षति पहुँचाते हैं—जैसे अलगाववादी प्रवृत्तियाँ; आतंकवाद या हिंसा का समर्थन; देशद्रोही संगठनों से सहानुभूति; संविधान, राष्ट्रीय ध्वज या राष्ट्रगान का अपमान; विदेशी शक्तियों के हित में राष्ट्र को कमजोर करने के प्रयास; तथा झूठे प्रचार द्वारा समाज में विद्वेष, अस्थिरता और अविश्वास फैलाना। इसके विपरीत, राष्ट्र-समर्थित गतिविधियाँ वे आचरण और प्रयास हैं जो देश की सुरक्षा, विकास और सामाजिक समरसता को सुदृढ़ करते हैं—जैसे संविधान और कानून का सम्मान, राष्ट्रीय एकता और अखंडता की रक्षा, राष्ट्रनिर्माण और आत्मनिर्भरता में योगदान, मर्यादित एवं संवैधानिक ढंग से असहमति व्यक्त करना तथा समाज में सद्भाव, अनुशासन और राष्ट्रीय चेतना को बढ़ावा देना। राष्ट्रविरोधी मार्ग से राष्ट्र-समर्थित मार्ग की ओर लौटना भी घर वापसी का सार्थक अर्थ है।

घर वापसी का एक आधुनिक और व्यावहारिक आयाम उन भारतीयों से भी जुड़ा है, जो बेहतर सुख-सुविधाओं, आर्थिक अवसरों या पेशेवर कारणों से विदेशों में बस गए हैं और जिन्होंने विदेशी नागरिकता ग्रहण कर ली है या ऐसा करने का विचार कर रहे हैं। वैश्वीकरण के युग में अंतर्राष्ट्रीय अवसरों की खोज स्वाभाविक है, किंतु जब भौतिक समृद्धि के साथ-साथ अपने स्वदेश के प्रति भावनात्मक, सांस्कृतिक और नैतिक दायित्वों का बोध पुनः जागृत होता है, तब स्वदेश लौटने की आकांक्षा स्वयं में एक प्रकार की घर वापसी बन जाती है। ऐसे नागरिकों का भारत लौटना केवल भौगोलिक वापसी नहीं, बल्कि अपने ज्ञान, अनुभव, पूंजी और वैश्विक दृष्टि के साथ राष्ट्रनिर्माण में पुनः सहभागी होना है। यह प्रक्रिया राष्ट्र के लिए ‘ब्रेन गेन’ का मार्ग प्रशस्त करती है—यह भी मेरी दृष्टि में घर वापसी ही है।

इस दिशा में समाज और शासन—दोनों स्तरों पर सकारात्मक और संवेदनशील प्रयास आवश्यक हैं, ताकि स्वदेश लौटने वालों को सम्मान, अवसर और अनुकूल वातावरण मिल सके। जब विदेशों में अर्जित दक्षता और अनुभव भारत की प्रगति में लगते हैं, तब राष्ट्र भी सशक्त होता है और वह व्यक्ति भी राष्ट्ररूपी घर से पुनः आत्मिक रूप से जुड़ जाता है। भावनात्मक लगाव, सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव और राष्ट्र के भविष्य में सहभागी बनने की यह चेतना भी घर वापसी का एक आधुनिक, सृजनात्मक और राष्ट्रहितकारी रूप है।

राष्ट्रवादी चेतना हमें यह बोध कराती है कि राष्ट्र की एकता और सुरक्षा पर किसी भी प्रकार का समझौता आत्मघाती सिद्ध होता है। इस चेतना का मार्ग संविधान-सम्मत आचरण तथा राष्ट्रीय प्रतीकों और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति अटूट श्रद्धा से होकर गुजरता है। संविधान केवल विधिक दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत की सामूहिक आत्मा है। तिरंगा हमारा स्वाभिमान है और राष्ट्रगान-राष्ट्रगीत हमारी एकता का स्वर। इनका सम्मान किसी राजनीतिक विचारधारा के प्रति निष्ठा नहीं, बल्कि मातृभूमि के प्रति प्रत्येक नागरिक का प्राथमिक कर्तव्य है। जो लोग इन कर्तव्यों का पालन नहीं करते, उन्हें इसके लिए प्रेरित करना भी घर वापसी मुहिम का हिस्सा है।

निष्कर्षतः, घर वापसी किसी एक पहचान को त्यागकर दूसरी को अपनाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि अपने मौलिक राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक गौरव और संवैधानिक मूल्यों की ओर लौटने की यात्रा है। यह वह बिंदु है जहाँ नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों को भी सहर्ष स्वीकार करता है और जहाँ विविधताओं के विशाल समुद्र के बीच राष्ट्रहित सर्वोपरि रहता है। जब व्यक्ति राष्ट्र को अपना घर और उसकी संस्कृति को अपना प्राण मान लेता है, तभी उसकी घर वापसी पूर्ण होती है।

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