जानकी नवमी (Janaki Navami) पर बोकारो (Bokaro) में भक्ति और मिथिला संस्कृति का भव्य संगम

जानकी नवमी (Janaki Navami) पर बोकारो (Bokaro) में भक्ति और मिथिला संस्कृति का भव्य संगम
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  • मिथिला सांस्कृतिक परिषद् ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ मनाई जानकी नवमी (Janaki Navami)
  • प्रगटी सिया सुखदैया… जनकपुर में गूँजे बधैया गीत

बोकारो: माता जानकी के प्राकट्य दिवस जानकी नवमी के अवसर पर रविवार देर शाम सेक्टर-4ई स्थित मिथिला एकेडमी पब्लिक स्कूल के विद्यापति सभागार में भक्ति और संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिला। मिथिला सांस्कृतिक परिषद् (Mithila Sanskritik Parishad) द्वारा आयोजित इस गरिमामयी कार्यक्रम में मिथिलांचल की समृद्ध परंपरा और माता सीता के आदर्शों को गीत-संगीत और विचारों के माध्यम से जीवंत किया गया।

कार्यक्रम का शुभारंभ परिषद के अध्यक्ष जय प्रकाश चौधरी, महासचिव नीरज चौधरी, विद्यालय के अध्यक्ष राजेन्द्र कुमार, उपाध्यक्ष बटोही कुंवर, सचिव दिलीप झा, सांस्कृतिक कार्यक्रम निदेशक अरुण पाठक, मिथिला महिला समिति की आशा झा और सखी बहिनपा मैथिलानी समूह की बोकारो प्रभारी अमिता झा सहित अन्य गणमान्य लोगों ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया।

महासचिव नीरज चौधरी ने अपने संबोधन में माता सीता के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि यह पूरे मिथिलांचल के लिए गौरव का विषय है कि जगत जननी मां जानकी इसी धरती की पुत्री हैं। उन्होंने बताया कि वैशाख शुक्ल नवमी माता सीता के भूमि से प्राकट्य की पावन स्मृति का दिन है। माता जानकी का जीवन पवित्रता, त्याग और अदम्य स्त्री शक्ति का वैश्विक प्रतीक है, जो समाज को धर्म और धैर्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

सांस्कृतिक कार्यक्रम की शुरुआत आंचल पाठक की स्वरचित भगवती वंदना “जय जय भैरवि असुर भयाउनि…” से हुई। इसके बाद उन्होंने मैथिल रचनाएँ “जगदंब अहीं अवलंब हमर…” और लोकगीत “मोहि लेलखिन सजनी…” प्रस्तुत कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया।
आशा झा ने “धन-धन मिथिला के माटि…”, शेफाली दुबे ने “प्रगटी सिया सुखदैया…” और “मिथिला मगन भई…”, जबकि विभा गोस्वामी ने “रामा रामा रटते रटते…” की प्रस्तुति दी। अरुण पाठक ने “राम-लखन सन पाहुन…” गाकर दर्शकों की खूब सराहना बटोरी। ढोलक पर विश्वनाथ गोस्वामी और कीबोर्ड पर ऋषि गोस्वामी ने सुमधुर संगत दी।

कार्यक्रम का संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन अरुण पाठक ने किया। इस अवसर पर परिषद के निदेशक मंडल सदस्य एवं अन्य गणमान्य लोग बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।

यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि मिथिला की सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम भी साबित हुआ।

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