भारत की बड़ी स्पेस सफलता: AgniKul Cosmos ने एक साथ फायर किए 4 3D-प्रिंटेड रॉकेट इंजन

भारत की बड़ी स्पेस सफलता: AgniKul Cosmos ने एक साथ फायर किए 4 3D-प्रिंटेड रॉकेट इंजन
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IIT मद्रास स्टार्टअप AgniKul Cosmos ने रचा इतिहास, 3D-प्रिंटेड 4 रॉकेट इंजनों का एक साथ सफल टेस्ट

 

 

Chennai: भारत की निजी स्पेस टेक कंपनी Agnikul Cosmos ने एक साथ चार सेमी-क्रायोजेनिक रॉकेट इंजनों का सफल परीक्षण कर देश के स्पेस सेक्टर में एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि हासिल की है। यह परीक्षण “क्लस्टर कॉन्फ़िगरेशन” में किया गया, यानी चारों इंजन एक साथ समन्वय के साथ संचालित किए गए।

कंपनी के अनुसार, यह परीक्षण भविष्य के रॉकेट लॉन्च और भारी पेलोड को अंतरिक्ष में भेजने की दिशा में बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

पूरी तरह 3D-प्रिंटेड हैं चारों इंजन

अग्निकुल कॉसमॉस ने बताया कि परीक्षण में इस्तेमाल किए गए चारों इंजन पूरी तरह 3D-प्रिंटेड हैं और इन्हें चेन्नई स्थित कंपनी के “रॉकेट फैक्ट्री-1” में ही डिजाइन और तैयार किया गया है।

कंपनी ने कहा कि उसके सभी प्रोपल्शन सिस्टम की तरह ये इंजन भी पूरी तरह इन-हाउस विकसित किए गए हैं। इस परीक्षण में कई इलेक्ट्रिक मोटर्स, पंप्स और कंट्रोल सिस्टम को एक साथ सिंक्रोनाइज़ किया गया, जो रॉकेट इंजीनियरिंग में बेहद जटिल प्रक्रिया मानी जाती है।

क्या है इस परीक्षण का महत्व?

रॉकेट लॉन्च के दौरान भारी वजन को अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए अधिक थ्रस्ट यानी शक्ति की जरूरत होती है। ऐसे में कई छोटे इंजनों को एक साथ चलाकर ज्यादा ताकत हासिल की जाती है। इसे इंजन क्लस्टरिंग कहा जाता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, चार इंजनों का एक साथ सफल संचालन यह साबित करता है कि Agnikul Cosmos अब उन्नत लॉन्च व्हीकल टेक्नोलॉजी की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही है।

इससे भविष्य में रॉकेट लॉन्च की विश्वसनीयता बढ़ेगी और मिशन अधिक सुरक्षित होंगे।

अग्निबाण रॉकेट के लिए अहम कदम

यह परीक्षण कंपनी के छोटे सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल Agnibaan के विकास के लिए बेहद अहम माना जा रहा है। अग्निबाण रॉकेट में इसी तरह के क्लस्टर्ड सेमी-क्रायोजेनिक इंजनों का इस्तेमाल किया जाएगा।

अग्निकुल का लक्ष्य कम लागत में छोटे सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजने के लिए एक लचीला और आधुनिक लॉन्च सिस्टम तैयार करना है।

3D-प्रिंटेड इंजन क्यों खास हैं?

सामान्य रॉकेट इंजनों में सैकड़ों छोटे-छोटे पार्ट्स को जोड़कर इंजन बनाया जाता है, जबकि अग्निकुल के इंजन एक ही पीस में 3D-प्रिंट किए जाते हैं।

इससे निर्माण लागत कम होती है, उत्पादन तेज होता है और तकनीकी खराबी की संभावना भी घट जाती है। यही वजह है कि दुनिया भर की स्पेस कंपनियां अब 3D-प्रिंटेड रॉकेट टेक्नोलॉजी पर तेजी से काम कर रही हैं।

भारत के निजी स्पेस सेक्टर को मिलेगा बड़ा फायदा

आईआईटी मद्रास से शुरू हुई Agnikul Cosmos भारत की तेजी से उभरती स्पेस स्टार्टअप कंपनियों में शामिल है। कंपनी पहले भी अपने “अग्निबाण SOrTeD मिशन” को लेकर चर्चा में रही थी, जिसमें 3D-प्रिंटेड रॉकेट इंजन का इस्तेमाल किया गया था।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह सफलता भारत को कम लागत वाले सैटेलाइट लॉन्च मार्केट में मजबूत स्थिति दिला सकती है और देश के निजी स्पेस सेक्टर को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दे सकती है।

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