गुरु-शिष्य परंपरा से सॉफ्ट पावर तक: डॉ. संध्या पुरेचा का सांस्कृतिक विजन
नई दिल्ली। जीडब्ल्यू-20 (GW20) की पूर्व अध्यक्षा और देश की प्रतिष्ठित सांस्कृतिक संस्था Sangeet Natak Akademi की अध्यक्ष Dr. Sandhya Purecha ने भारत की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, संवर्धन और भविष्य की दिशा को लेकर एक व्यापक दृष्टि प्रस्तुत की है। कालिदास सम्मान और संगीत नाटक अकादमी सम्मान से अलंकृत डॉ. पुरेचा न केवल एक ख्यातिप्राप्त भरतनाट्यम नृत्यांगना हैं, बल्कि वे कोरियोग्राफर, लेखिका और सांस्कृतिक प्रशासक के रूप में भी विशिष्ट पहचान रखती हैं।
अपने लोकप्रिय कार्यक्रम ‘मीट द आर्टिस्ट’ के माध्यम से देशभर के कलाकारों से संवाद स्थापित कर उनकी चुनौतियों को समझना और उनके समाधान की दिशा में पहल करना उनकी कार्यशैली का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। इसी क्रम में उन्होंने भारतीय कला जगत की चुनौतियों, संभावनाओं और सांस्कृतिक नीति को लेकर अपने विचारों को “साधना (SADHANA)” नामक एक वैचारिक रूपरेखा के रूप में प्रस्तुत किया है।
‘साधना’: सांस्कृतिक उत्कृष्टता की समग्र दृष्टि
डॉ. पुरेचा के अनुसार भारत की सांस्कृतिक शक्ति केवल उसके गौरवशाली अतीत में नहीं, बल्कि वर्तमान में उसकी जीवंतता और भविष्य में उसकी प्रासंगिकता में निहित है। संस्कृति तभी जीवित रहती है जब उसका अभ्यास, अध्ययन, नवाचार और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण निरंतर जारी रहे।
इसी सोच के आधार पर उन्होंने SADHANA रूपरेखा प्रस्तुत की, जो पाँच प्रमुख स्तंभों पर आधारित है—
- S – Safeguarding Living Heritage (जीवंत विरासत का संरक्षण)
- A – Apprenticeship through Guru-Shishya Parampara (गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से शिक्षण)
- D – Dialogue between Shastra and Practice (शास्त्र और व्यवहार का संवाद)
- H – Heritage-led Innovation (विरासत-आधारित नवाचार)
- A – Arts as National Identity and Soft Power (राष्ट्रीय पहचान और सॉफ्ट पावर के रूप में कलाएँ)
जीवंत विरासत के संरक्षण पर जोर
डॉ. पुरेचा का मानना है कि प्रदर्शनकारी कलाएँ केवल संग्रहालयों या अभिलेखों में सुरक्षित रखे जाने से जीवित नहीं रहतीं, बल्कि उनके निरंतर प्रदर्शन और अभ्यास से उनका अस्तित्व बना रहता है। इसी उद्देश्य से संगीत नाटक अकादमी देशभर में उत्सवों, कार्यशालाओं, व्याख्यानों और सांस्कृतिक संवाद कार्यक्रमों का आयोजन करती है।
उन्होंने कहा कि ‘कला दीक्षा’, ‘कला धरोहर’ और ‘कला संवाद’ जैसी पहलें जीवंत सांस्कृतिक परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का प्रभावी माध्यम बन रही हैं। छऊ और कुटियाट्टम जैसी दुर्लभ परंपराओं में वरिष्ठ गुरु युवा कलाकारों को प्रशिक्षित कर सांस्कृतिक निरंतरता सुनिश्चित कर रहे हैं।
गुरु-शिष्य परंपरा ही कला शिक्षा की आत्मा
भारतीय कला परंपरा में गुरु-शिष्य संबंध केवल तकनीकी प्रशिक्षण का माध्यम नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मूल्यों, अनुशासन और सौंदर्यबोध के हस्तांतरण का भी आधार रहा है।
डॉ. पुरेचा के अनुसार संगीत नाटक अकादमी अपने प्रशिक्षण संस्थानों और विरासत संरक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से इस परंपरा को सशक्त बना रही है, जिससे संकटग्रस्त कला विधाओं को नए साधक मिल रहे हैं और युवा कलाकारों को सांस्कृतिक दृष्टि के साथ प्रशिक्षण प्राप्त हो रहा है।
शास्त्र और व्यवहार का संतुलन आवश्यक
उन्होंने भारतीय कला परंपरा में शास्त्र और व्यवहार के संबंध को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि नाट्यशास्त्र, अभिनय दर्पण और संगीत रत्नाकर जैसे ग्रंथ आज भी कलाकारों को मार्गदर्शन प्रदान कर रहे हैं।
संगीत नाटक अकादमी अनुसंधान, प्रकाशन, दस्तावेजीकरण और संगोष्ठियों के माध्यम से विद्वानों और कलाकारों के बीच संवाद को बढ़ावा दे रही है, जिससे परंपरा और समकालीन अभ्यास के बीच संतुलन बना रहे।
विरासत से जन्म लेता है नवाचार
डॉ. पुरेचा ने इस धारणा को खारिज किया कि परंपरा और नवाचार एक-दूसरे के विरोधी हैं। उनके अनुसार वास्तविक और सार्थक नवाचार वही है जो अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा हो।
उन्होंने कहा कि भारतीय कलाएँ सदियों से इसलिए जीवित हैं क्योंकि प्रत्येक पीढ़ी ने उन्हें अपने समय के अनुरूप नए अर्थ दिए हैं। अकादमी समकालीन प्रस्तुतियों, रचनात्मक प्रयोगों और नई व्याख्याओं को प्रोत्साहित करते हुए पारंपरिक मूल्यों के संरक्षण पर भी समान रूप से ध्यान दे रही है।
कला: राष्ट्रीय पहचान और भारत की सॉफ्ट पावर
डॉ. पुरेचा ने कहा कि भारतीय प्रदर्शनकारी कलाएँ केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक पहचान और वैश्विक स्तर पर उसकी सॉफ्ट पावर का महत्वपूर्ण आधार हैं।
उन्होंने अक्टूबर 2024 में आयोजित अंतरराष्ट्रीय भारतीय नृत्य संगोष्ठी और जनवरी 2025 के गणतंत्र दिवस समारोह में प्रस्तुत Jayati Jaya Mama Bharatam का उल्लेख करते हुए कहा कि यह भारत की सांस्कृतिक शक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण है। इस प्रस्तुति में 5,000 से अधिक लोक एवं जनजातीय कलाकारों ने भाग लिया था और इसे Guinness World Records द्वारा “Largest Indian Folk Variety Dance” के रूप में मान्यता प्रदान की गई।
सामूहिक जिम्मेदारी का आह्वान
अपने विचारों के समापन में डॉ. संध्या पुरेचा ने कहा कि सांस्कृतिक संरक्षण केवल संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है। कलाकारों, विद्वानों, शिक्षकों, नीति-निर्माताओं और समाज के सभी वर्गों को मिलकर इस दिशा में कार्य करना होगा।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यदि जीवंत विरासत के संरक्षण, गुरु-शिष्य परंपरा, शास्त्र-व्यवहार संवाद, विरासत-आधारित नवाचार और राष्ट्रीय पहचान के रूप में कलाओं के सिद्धांतों को अपनाया जाए, तो भारत की सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए भी उतनी ही जीवंत और प्रेरणादायक बनी रहेगी।
“यही ‘साधना’ का वास्तविक भाव है—सांस्कृतिक उत्कृष्टता की निरंतर, सामूहिक और समर्पित साधना।”
प्रस्तुति: अरुण पाठक

