लोकसभा में 850 सीटों का प्रस्ताव, महिलाओं को मिलेगा 33% आरक्षण, लेकिन NDA को चाहिए 42 और सांसदों का साथ
परिसीमन (Delimitation) विधेयक 2026 क्या है? जानिए कैसे यह लोकसभा की सीटें 850 तक बढ़ा सकता है, महिला आरक्षण लागू कर सकता है और क्यों इसे पास कराने के लिए NDA को 42 अतिरिक्त सांसदों के समर्थन की जरूरत है।
संसद का आगामी मानसून सत्र कई मायनों में ऐतिहासिक हो सकता है। केंद्र सरकार परिसीमन (Delimitation) विधेयक, 2026 लाने की तैयारी में है। यह ऐसा संवैधानिक सुधार है, जो केवल चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं ही नहीं बदलेगा, बल्कि आने वाले वर्षों में देश की राजनीति, संसद की ताकत, राज्यों की हिस्सेदारी और महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व की तस्वीर भी बदल सकता है।
यदि यह विधेयक पारित हो जाता है तो लोकसभा की सीटें 543 से बढ़कर 850 तक हो सकती हैं, संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन होगा और महिलाओं को लोकसभा तथा विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने का रास्ता भी साफ हो जाएगा।
लेकिन इस बड़े बदलाव की राह आसान नहीं है। संविधान संशोधन के लिए जरूरी विशेष बहुमत जुटाने में सरकार अभी पीछे है। मौजूदा स्थिति में NDA को लोकसभा में 36 और राज्यसभा में 6 अतिरिक्त वोटों की जरूरत होगी।
सबसे पहले समझिए—आखिर परिसीमन होता क्या है?
सरल शब्दों में कहें तो परिसीमन (Delimitation) का मतलब है लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का नए सिरे से निर्धारण करना, ताकि हर सांसद और विधायक लगभग समान आबादी का प्रतिनिधित्व करे।
समय के साथ देश के अलग-अलग राज्यों में जनसंख्या अलग-अलग गति से बढ़ी है। इसका नतीजा यह हुआ कि आज कुछ संसदीय क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या बहुत अधिक है, जबकि कुछ क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम।
ऐसे में परिसीमन का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लोकतंत्र का मूल सिद्धांत “एक व्यक्ति, एक वोट और हर वोट का समान मूल्य” व्यवहार में भी लागू हो।
अब क्यों हो रही है परिसीमन की चर्चा?
इस सवाल का जवाब करीब 50 साल पुराने फैसले में छिपा है।
वर्ष 1976 में तत्कालीन सरकार ने संविधान के 42वें संशोधन के जरिए राज्यों को मिलने वाली लोकसभा सीटों का बंटवारा 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर (फ्रीज) कर दिया था।
ऐसा इसलिए किया गया ताकि जिन राज्यों ने परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा काम किया है, उन्हें कम सीटें मिलने के कारण नुकसान न उठाना पड़े।
इसके बाद 84वें संविधान संशोधन (2001) के जरिए यह व्यवस्था 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दी गई।
अब वह समय आ चुका है। इसलिए केंद्र सरकार नए परिसीमन की प्रक्रिया शुरू करना चाहती है।
क्या-क्या बदलेगा इस विधेयक से?
यदि प्रस्तावित विधेयक पारित हो जाता है तो—
✔ पूरे देश में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं दोबारा तय होंगी।
✔ जनसंख्या के आधार पर राज्यों को मिलने वाली सीटों की संख्या बदली जा सकती है।
✔ एक नया परिसीमन आयोग बनाया जाएगा।
✔ आयोग के फैसले कानून की तरह लागू होंगे।
✔ भविष्य में परिसीमन किस जनगणना के आधार पर होगा, इसका फैसला संसद करेगी।
लोकसभा बन सकती है दुनिया की सबसे बड़ी निर्वाचित संसद
इस विधेयक का सबसे बड़ा आकर्षण लोकसभा का विस्तार है।
फिलहाल लोकसभा में 543 निर्वाचित सदस्य हैं और संविधान इसकी अधिकतम सीमा 550 तय करता है।
सरकार प्रस्तावित संशोधन के जरिए इस सीमा को बढ़ाकर 850 सीटें करना चाहती है।
यदि ऐसा होता है तो भारत की लोकसभा दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक निर्वाचित संसद बन जाएगी।
बढ़ती आबादी के हिसाब से अधिक सांसद होने से प्रतिनिधित्व भी बेहतर माना जा रहा है।
महिला आरक्षण लागू होने का रास्ता भी इसी से निकलेगा
साल 2023 में संसद ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ पारित किया था, जिसके तहत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान किया गया।
लेकिन कानून में साफ कहा गया है कि यह आरक्षण नई जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होगा।
यानी यदि परिसीमन नहीं हुआ तो महिला आरक्षण भी लागू नहीं हो सकेगा।
दक्षिणी राज्यों की चिंता आखिर क्यों बढ़ गई है?
यही इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू है।
पिछले पांच दशकों में उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की आबादी तेजी से बढ़ी है।
वहीं तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है।
यदि नई सीटों का बंटवारा केवल आबादी के आधार पर हुआ तो उत्तरी राज्यों को ज्यादा सीटें मिल सकती हैं, जबकि दक्षिणी राज्यों की संसद में हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम हो सकती है।
इसी वजह से दक्षिण के कई राजनीतिक दल परिसीमन को लेकर खुलकर चिंता जता रहे हैं।
उनका कहना है कि जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण की नीति को सफल बनाया, उन्हें राजनीतिक रूप से कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।
अब बात सबसे अहम सवाल की—NDA को आखिर कितने वोट चाहिए?
यही इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
परिसीमन विधेयक के साथ सरकार संविधान (131वां संशोधन) विधेयक भी लाने की तैयारी में है। संविधान संशोधन के लिए अनुच्छेद-368 के तहत विशेष बहुमत जरूरी होता है।
इसका मतलब है—
- सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत।
- और उपस्थित एवं मतदान करने वाले सदस्यों में कम-से-कम दो-तिहाई समर्थन।
लोकसभा का गणित
लोकसभा की प्रभावी सदस्य संख्या फिलहाल 540 मानी जा रही है।
यदि सभी सदस्य मतदान करते हैं तो सरकार को करीब 360 वोट चाहिए होंगे।
वर्तमान में NDA के पास लगभग 324 सांसद हैं।
यानी सरकार को लोकसभा में 36 अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ेगी।
राज्यसभा का गणित
राज्यसभा में भी NDA के पास अपने दम पर आवश्यक विशेष बहुमत नहीं है।
मौजूदा संख्या बल के हिसाब से सरकार को करीब 6 अतिरिक्त वोटों की आवश्यकता होगी।
अर्थात् दोनों सदनों को मिलाकर सरकार को लगभग 42 अतिरिक्त सांसदों का समर्थन जुटाना होगा।
यही वजह है कि पिछले कुछ समय से सरकार कई क्षेत्रीय दलों और विपक्षी सांसदों के संपर्क में है।
सुप्रिया सुले के बयान से बढ़ी सियासी हलचल
इसी बीच राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) की सांसद सुप्रिया सुले के एक बयान ने राजनीतिक चर्चाओं को नई हवा दे दी है।
हालांकि विपक्ष की ओर से अभी कोई औपचारिक फैसला सामने नहीं आया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि कुछ क्षेत्रीय दल इस मुद्दे पर अलग रुख अपना सकते हैं।
अगर ऐसा हुआ तो संसद में हर वोट की अहमियत कई गुना बढ़ जाएगी।
क्या 2029 का चुनाव पूरी तरह बदल जाएगा?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि परिसीमन केवल चुनावी क्षेत्रों की सीमाएं बदलने वाला कानून नहीं है।
यह आने वाले वर्षों में—
- संसद की संरचना बदल सकता है,
- राज्यों की राजनीतिक ताकत का नया संतुलन तय कर सकता है,
- महिलाओं को संसद में अभूतपूर्व प्रतिनिधित्व दिला सकता है,
- और 2029 के लोकसभा चुनाव की पूरी राजनीतिक तस्वीर बदल सकता है।
समर्थकों का कहना है कि 1971 की जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व जारी रखना लोकतंत्र की भावना के अनुरूप नहीं है।
वहीं आलोचकों का तर्क है कि यदि पर्याप्त सुरक्षा उपाय नहीं किए गए तो इससे देश के संघीय ढांचे और राज्यों के बीच राजनीतिक संतुलन प्रभावित हो सकता है।
यही कारण है कि परिसीमन विधेयक 2026 को आज़ाद भारत के सबसे बड़े संवैधानिक और राजनीतिक सुधारों में से एक माना जा रहा है। संसद के मानसून सत्र में इस पर होने वाली बहस आने वाले दशकों की भारतीय राजनीति की दिशा तय कर सकती है।


