Assam और Manipur में NRC का मुद्दा फिर गरमाया

Assam और Manipur में NRC का मुद्दा फिर गरमाया
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नव ठाकुरिया

असम (Assam) और मणिपुर (Manipur) में NRC का मुद्दा फिर गरमाया। मणिपुर में NRC अपडेट की मांग, असम NRC पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और ED जांच से बढ़ी हलचल।

 

पूर्वोत्तर भारत में NRC को लेकर एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। Manipur में 1951 के नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) को अपडेट करने की मांग को लेकर आंदोलन शुरू हो गया है। वहीं, Assam में पहले ही अपडेट किए जा चुके NRC को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने इसकी समीक्षा की मांग वाली एक याचिका पर सुनवाई स्वीकार की है। असम NRC को अभी तक रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया (RGI) की औपचारिक मंजूरी नहीं मिली है। इसी बीच, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने मई 2014 से अक्टूबर 2019 के बीच असम में हुई NRC अपडेट प्रक्रिया में कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर मामला दर्ज किया है।

इन घटनाक्रमों के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 26 अगस्त 2026 को अवैध प्रवासियों से सख्ती से निपटने की केंद्र सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। नई दिल्ली में सुरक्षा एजेंसियों, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों तथा राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के पुलिस प्रमुखों समेत वरिष्ठ अधिकारियों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए शाह ने कहा कि देश में अवैध रूप से प्रवेश करने वालों से कानून के तहत सख्ती से निपटा जाएगा। इसके बाद ऐसी अटकलें भी तेज हुई हैं कि केंद्र सरकार देशभर में अनधिकृत रूप से रह रहे लोगों की पहचान के लिए व्यापक स्तर पर स्क्रीनिंग शुरू कर सकती है।

इस बीच, मई 2023 से लगातार हिंसा का सामना कर रहे मणिपुर में जनगणना-2027 से पहले NRC को अपडेट करने की मांग ने जोर पकड़ लिया है। मैतेई और कुकी-ज़ो समुदायों के बीच जारी संघर्ष में 250 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों लोग विस्थापित हुए हैं। मणिपुर में घर-घर जाकर डिजिटल सर्वेक्षण 1 सितंबर से शुरू होने वाला है। इससे पहले ही राज्य में NRC को अपडेट करने की मांग को लेकर बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हो रहे हैं।

NRC समर्थकों का तर्क है कि जनगणना के आंकड़ों के आधार पर अवैध प्रवासी, विशेषकर म्यांमार से आए लोग, नागरिकता संबंधी रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराने की कोशिश कर सकते हैं। इसी आशंका के चलते वे जनगणना प्रक्रिया से पहले NRC को अपडेट करने की मांग कर रहे हैं।

‘कैंपेन फॉर जस्ट एंड फेयर डेलिमिटेशन’ (JFD) के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन को मणिपुर के कई नागरिक समाज संगठनों, महिला संगठनों तथा छात्र-युवा निकायों का समर्थन प्राप्त है। आंदोलन अब इम्फाल घाटी से आगे भी फैल रहा है। कुकी-ज़ो समूहों के विपरीत, कुछ नागा संगठनों ने भी NRC की मांग का समर्थन किया है।

मणिपुर के मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह ने भी NRC की मांग का समर्थन किया है। इससे पहले राज्य विधानसभा ने 2022 में जनगणना से पहले NRC अपडेट करने के पक्ष में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया था। खेमचंद से पहले मुख्यमंत्री रहे भाजपा नेता एन. बीरेन सिंह ने भी हाल ही में नई दिल्ली में गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के दौरान जनगणना गतिविधियां शुरू होने से पहले मणिपुर में NRC के महत्व का मुद्दा उठाया था।

असम में NRC पर फिर उठे सवाल

असम में NRC अपडेट की प्रक्रिया शुरू से ही विवादों और सवालों से घिरी रही है। अब असम NRC के पूर्व समन्वयक हितेश देवशर्मा ने ड्राफ्ट और सप्लीमेंट्री NRC के व्यापक तथा समयबद्ध पुनःसत्यापन की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। यह प्रक्रिया पहले सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में पूरी की गई थी।

देवशर्मा ने अपनी याचिका में प्रक्रिया के दौरान कथित गलतियों और अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए कहा है कि यदि NRC में गंभीर त्रुटियां रह गई हैं, तो इसका देश की आंतरिक सुरक्षा पर भी असर पड़ सकता है। उनकी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, असम सरकार, NRC के राज्य समन्वयक और RGI को नोटिस जारी किए हैं।

असम के लिए NRC का ड्राफ्ट 30 जुलाई 2018 को प्रकाशित हुआ था। इसके बाद 31 अगस्त 2019 को अंतिम ड्राफ्ट/सप्लीमेंट्री सूची प्रकाशित की गई, जिसमें करीब 19 लाख लोग बाहर रह गए। इन लोगों में वे आवेदक शामिल थे जिनके दावे स्वीकार नहीं किए गए थे या जिनके आवेदन में आवश्यक दस्तावेज और प्रमाण पर्याप्त नहीं पाए गए।

हालांकि, NRC की अंतिम स्थिति को लेकर अब भी कानूनी और प्रशासनिक सवाल बने हुए हैं। NRC के तत्कालीन समन्वयक प्रतीक हजेला द्वारा 2019 में प्रकाशित सूची को अंतिम NRC के रूप में प्रस्तुत किए जाने पर भी सवाल उठते रहे हैं, क्योंकि अंतिम स्वीकृति RGI की ओर से दी जानी थी।

देवशर्मा ने अपनी याचिका में NRC प्रक्रिया के दौरान कथित सॉफ्टवेयर संबंधी गड़बड़ियों, डेटा प्रबंधन की समस्याओं और कर्मचारियों की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने यह भी दावा किया है कि कुछ ऐसे लोगों के नाम रिकॉर्ड में शामिल हो गए जो उनके अनुसार नागरिकता के आवश्यक मानदंडों को पूरा नहीं करते थे। इन आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान ही हो सकेगी।

देवशर्मा ने अपने अनुभव का हवाला देते हुए कहा है कि कामरूप जिले में कुछ लोगों को ‘ओरिजिनल इनहैबिटेंट’ यानी OI (मूल निवासी) श्रेणी में रखा गया, जबकि उनके अनुसार वे बांग्लादेश से आए प्रवासी थे। उन्होंने ‘फैमिली ट्री मैचिंग’ की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाते हुए दावा किया कि कुछ ऐसे लोगों के नाम भी NRC में शामिल हुए जो इस मानदंड को पूरा नहीं कर पाए थे।

इन आरोपों ने NRC प्रक्रिया की विश्वसनीयता और पारदर्शिता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। देवशर्मा ने इसी आधार पर तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप और व्यापक पुनःसत्यापन की मांग की है।

नागरिकता प्रमाण-पत्र को लेकर भी याचिका

दिलचस्प बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक दूसरी याचिका भी लंबित है, जिसमें NRC में शामिल लोगों को नागरिकता प्रमाण-पत्र जारी करने की मांग की गई है। याचिकाकर्ताओं में जमीयत उलेमा-ए-हिंद और ऑल असम माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन (AAMSU) शामिल हैं।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि NRC में नाम शामिल होना नागरिकता की स्थिति से जुड़ा महत्वपूर्ण रिकॉर्ड है और इसके आधार पर आवश्यक प्रमाण-पत्र जारी किए जाने चाहिए। दूसरी ओर, NRC की आधिकारिक स्थिति और RGI की मंजूरी को लेकर लंबित प्रक्रिया इस मामले को और जटिल बनाती है।

उम्मीद है कि सितंबर के अंत तक सुप्रीम कोर्ट इन दोनों मामलों पर आगे सुनवाई करेगा।

ED की जांच से बढ़ी मुश्किल

NRC अपडेट की प्रक्रिया में प्रवर्तन निदेशालय की एंट्री ने मामले को और पेचीदा बना दिया है। असम में NRC अपडेट पर केंद्र सरकार ने लगभग 1,600 करोड़ रुपये खर्च किए थे। वहीं, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) ने प्रक्रिया में करीब 260 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं की ओर इशारा किया था।

31 मार्च 2020 को समाप्त वित्त वर्ष के लिए सामाजिक, आर्थिक और सामान्य क्षेत्रों से संबंधित CAG रिपोर्ट में NRC अपडेट प्रक्रिया के दौरान हुई विभिन्न अनियमितताओं का उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट में तत्कालीन NRC समन्वयक प्रतीक हजेला और सिस्टम इंटीग्रेटर विप्रो लिमिटेड से संबंधित कार्रवाई की भी सिफारिश की गई थी।

ED की मौजूदा जांच अब इन वित्तीय अनियमितताओं को नए सिरे से जांच के दायरे में ला सकती है।

NRC की बहस फिर क्यों महत्वपूर्ण हो गई है?

असम और मणिपुर में NRC को लेकर मौजूदा घटनाक्रम यह दिखाते हैं कि पूर्वोत्तर में नागरिकता, अवैध प्रवासन और जनसांख्यिकीय बदलाव का सवाल अभी भी बेहद संवेदनशील है। असम में NRC की प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद उसकी कानूनी और प्रशासनिक स्थिति स्पष्ट रूप से अंतिम रूप नहीं ले पाई है। दूसरी ओर, मणिपुर में जनगणना-2027 से पहले NRC अपडेट करने की मांग राजनीतिक और सामाजिक दबाव का रूप ले रही है।

ऐसे में आने वाले महीनों में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, ED की जांच और जनगणना की तैयारियां—तीनों घटनाक्रम NRC की बहस की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।

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