G2: क्या US और China मिलकर नई विश्व व्यवस्था बना रहे हैं?

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by Ashis Sinha

Trump, Xi sumit ने ‘G2’ की बहस तेज कर दी है। क्या अमेरिका और चीन मिलकर नई विश्व व्यवस्था को आकार दे रहे हैं? जानिए भारत पर इसका असर।

 

दुनिया की निगाहें इस समय दो नेताओं पर टिकी हैं—अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (US President Trump) और चीन (China) के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping)। दोनों की मुलाकात ने सिर्फ अमेरिका-चीन रिश्तों को नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति के अगले अध्याय को लेकर भी बहस तेज कर दी है।

सवाल सीधा है—क्या दुनिया ‘G2’ की ओर बढ़ रही है?

अभी ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। अमेरिका और चीन ने किसी औपचारिक ‘G2’ व्यवस्था की घोषणा नहीं की है। लेकिन ट्रंप-शी की सीधी बातचीत और उन मुद्दों की लंबी सूची, जिन पर दोनों देश दुनिया को प्रभावित करते हैं, इस सवाल को जरूर गंभीर बनाती है।

‘G2’ आखिर है क्या?

‘G2’ कोई नया अंतरराष्ट्रीय संगठन नहीं है। यह एक विचार है—दुनिया की दो सबसे प्रभावशाली शक्तियां, अमेरिका और चीन, वैश्विक मुद्दों पर मिलकर या आपसी समझ के आधार पर बड़ी भूमिका निभाएं।

यह विचार नया नहीं है। पिछले करीब दो दशकों से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इसकी चर्चा होती रही है। ट्रंप भी पहले अमेरिका और चीन को ‘G2’ के संदर्भ में संबोधित कर चुके हैं।

यानी ‘G2’ अभी कोई औपचारिक क्लब नहीं, लेकिन अमेरिका-चीन संबंधों की बढ़ती वैश्विक अहमियत को समझने का एक राजनीतिक और रणनीतिक फ्रेम जरूर है।

ट्रंप-शी की मेज पर क्या था?

24-25 सितंबर की ट्रंप-शी वार्ता में सिर्फ व्यापार की बात नहीं हुई।

टैरिफ, व्यापार, दुर्लभ खनिज, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, तकनीक, ताइवान और वैश्विक सुरक्षा जैसे कई संवेदनशील मुद्दे बातचीत के केंद्र में रहे।

अमेरिकी प्रशासन ने दोनों देशों के रिश्तों में ‘रणनीतिक स्थिरता’ पर जोर दिया। AI जैसे तेजी से बदलते क्षेत्र में संवाद बढ़ाने के लिए नया तंत्र बनाने की बात भी सामने आई।

लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी है।

अमेरिका और चीन के बीच ताइवान, तकनीकी प्रतिस्पर्धा, व्यापार और रणनीतिक प्रभाव को लेकर मतभेद अभी खत्म नहीं हुए हैं। इसलिए इस मुलाकात को अमेरिका-चीन रिश्तों में स्थायी बदलाव का अंतिम संकेत मानना अभी जल्दबाजी होगी।

 

फिर ‘G2’ की चर्चा क्यों?

क्योंकि आज दुनिया के कई बड़े सवालों पर अमेरिका और चीन की भूमिका को नजरअंदाज करना मुश्किल है।

वैश्विक व्यापार से लेकर AI, सप्लाई चेन, तकनीकी प्रतिस्पर्धा, सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक तक—दोनों देशों के फैसलों का असर बाकी दुनिया पर पड़ता है।

दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप-शी की बैठक उस समय हुई, जब दुनिया के नेता संयुक्त राष्ट्र महासभा के लिए न्यूयॉर्क में जुटे थे।

एक तरफ UN का बहुपक्षीय मंच, दूसरी तरफ दुनिया की दो बड़ी शक्तियों के बीच सीधी बातचीत।

यही तस्वीर ‘G2’ बहस को हवा देती है।

लेकिन यहां एक सावधानी जरूरी है। विशेषज्ञों के बीच यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप का ‘G2’ शब्द किसी औपचारिक दो-शक्ति वाली विश्व व्यवस्था की योजना है या अमेरिका-चीन की असाधारण ताकत को बताने का एक राजनीतिक तरीका।

भारत के लिए क्यों अहम?

यहीं से कहानी भारत के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है।

भारत अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है। वहीं चीन के साथ भी संबंधों को स्थिर करने की कोशिशें जारी हैं। सितंबर में शी जिनपिंग की भारत यात्रा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी मुलाकात के बाद ट्रंप-शी बैठक का महत्व और बढ़ जाता है।

अगर अमेरिका और चीन के बीच तनाव कम होता है, तो वैश्विक व्यापार और अर्थव्यवस्था को स्थिरता मिल सकती है।

लेकिन अगर दुनिया के बड़े फैसलों में वॉशिंगटन और बीजिंग की भूमिका जरूरत से ज्यादा बढ़ती है, तो भारत समेत दूसरी बड़ी शक्तियों के लिए सवाल यह होगा कि वे बदलते शक्ति संतुलन में अपनी रणनीतिक स्वतंत्रता और प्रभाव कैसे बनाए रखें।

यही वजह है कि भारत के लिए ‘G2’ सिर्फ अमेरिका और चीन की कहानी नहीं है।

क्या दुनिया दो ध्रुवों की ओर बढ़ रही है?

फिलहाल इसका कोई सीधा जवाब नहीं है।

ट्रंप और शी के बीच बातचीत बढ़ रही है, लेकिन दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा भी कायम है। सहयोग और टकराव—दोनों एक साथ चल रहे हैं।

इसे फिलहाल ‘G2 की शुरुआत’ से ज्यादा अमेरिका-चीन के बीच नियंत्रित प्रतिस्पर्धा कहना ज्यादा सटीक होगा।

लेकिन एक बात साफ है—जब दुनिया की दो बड़ी शक्तियां आमने-सामने बैठती हैं और व्यापार से लेकर AI, सुरक्षा और वैश्विक स्थिरता तक पर बातचीत करती हैं, तो उसकी गूंज सिर्फ वॉशिंगटन और बीजिंग तक सीमित नहीं रहती।

सवाल अब यह नहीं है कि ‘G2’ बन चुका है या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिका और चीन धीरे-धीरे ऐसी भूमिका में पहुंच रहे हैं, जहां उनके आपसी समझौते दुनिया के बाकी हिस्सों की राजनीति और अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करने लगें।

और अगर ऐसा होता है, तो भारत समेत दुनिया की दूसरी बड़ी शक्तियों की भूमिका कैसी होगी—यही आने वाले समय की बड़ी भू-राजनीतिक कहानी हो सकती है।

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