गैंडे (Rhino) की रक्षा से विकास की पटरी तक: असम (Assam) ने संरक्षण (Conservation) की मिसाल कायम की

गैंडे (Rhino) की रक्षा से विकास की पटरी तक: असम (Assam) ने संरक्षण (Conservation) की मिसाल कायम की
70 / 100 SEO Score

नव ठाकुरीया

असम (Assam) में वन्यजीव संरक्षण के इतिहास ने बीते वर्ष एक और ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की है। सख्त कानूनों, असम पुलिस के सहयोग से सक्रिय और प्रशिक्षित वन अमले तथा बढ़ती जन-जागरूकता के चलते राज्य में एक-सींग वाले गैंडे (Rhino) के शिकार का एक भी मामला सामने नहीं आया। इससे पहले 2022 में भी असम ने यही उपलब्धि दर्ज की थी, जब पूरे वर्ष गैंडे के शिकार की कोई घटना नहीं हुई थी।

एक-सींग वाले गैंडे का शिकार मुख्यतः उसके सींग के लिए किया जाता रहा है। अवैध बाजार में इसके कथित कामोत्तेजक गुणों को लेकर फैली भ्रांतियों के कारण इसकी कीमत लाखों रुपये तक बताई जाती है। काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान (Kaziranga National Park) एवं टाइगर रिज़र्व (Tiger Reserve), जो एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है, में वर्तमान में लगभग 2,700 गैंडे निवास करते हैं।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व शर्मा ने हाल ही में बताया कि काजीरंगा में फरवरी 2024 से अब तक 730 दिनों से अधिक समय में गैंडे के शिकार की कोई घटना नहीं हुई है। उन्होंने ‘ऑपरेशन फाल्कन’ का उल्लेख किया—यह असम पुलिस और राज्य वन विभाग की संयुक्त एंटी-पोचिंग पहल है। इस अभियान के तहत अब तक कम से कम 42 शिकारियों की गिरफ्तारी की गई है, जबकि छह बड़े शिकार गिरोहों का भंडाफोड़ किया गया है। यह सख्त अभियान जनवरी 2024 में काजीरंगा के भीतर दो वयस्क गैंडों के शिकार की घटना के बाद शुरू किया गया था।

असम की एक बड़ी उपलब्धि यह भी रही है कि राज्य के आम लोग—जातीय और धार्मिक मतभेदों से ऊपर उठकर—गैंडे की रक्षा के लिए एकजुट दिखाई दिए हैं। इसी सोच को मज़बूत करने के लिए असम सरकार ने 2024 में लगभग 2,500 गैंडे के सींग नष्ट कर दिए। इस कदम का उद्देश्य उस आम धारणा को चुनौती देना था कि गैंडे के सींग में कोई विशेष औषधीय या यौन शक्ति बढ़ाने वाला गुण होता है। सरकार की इस पहल ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि गैंडे के सींग सामान्य केराटिन से बने होते हैं और उनका ऐसा कोई वैज्ञानिक उपयोग नहीं है।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काजीरंगा और अन्य वन क्षेत्रों में गैंडों के शिकार को रोकने के लिए राज्य सरकार के प्रयासों की सराहना की। 18 जनवरी 2026 को उन्होंने काजीरंगा एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना का भूमि पूजन किया। यह परियोजना काजीरंगा से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग-715 (पूर्व में NH-37) पर वन्यजीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल मानी जा रही है।

करीब 6,950 करोड़ रुपये से अधिक की लागत वाली इस पर्यावरण-अनुकूल परियोजना में 34.45 किलोमीटर लंबा एलिवेटेड वन्यजीव कॉरिडोर, जाखलाबंदा और बोकाखाट क्षेत्रों में बाईपास का विकास, तथा कालियाबोर से नुमालीगढ़ तक मौजूदा 86 किलोमीटर लंबे हाईवे को चार लेन में चौड़ा करना शामिल है। परियोजना पूरी होने के बाद, इसके नीचे से वन्यजीवों की पारंपरिक आवाजाही में किसी प्रकार की बाधा नहीं आएगी।

इससे विशेष रूप से रात के समय हाईवे पार करते वक्त होने वाली वन्यजीवों की दुर्घटनाओं में कमी आने की उम्मीद है। साथ ही, पूर्वी असम के क्षेत्रों की सड़क कनेक्टिविटी भी बेहतर होगी। इस अवसर पर एक सार्वजनिक रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि काजीरंगा केवल एक राष्ट्रीय उद्यान नहीं, बल्कि असम की आत्मा और भारत की जैव-विविधता का जीवंत प्रतीक है। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि काजीरंगा और उसके वन्यजीवों की रक्षा करना केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है। प्रधानमंत्री ने संगीत के महानायक भारत रत्न भूपेन हजारिका के शब्दों को भी याद किया, जिनमें काजीरंगा की सुंदरता और भव्यता का भावपूर्ण चित्रण मिलता है।

काजीरंगा की निदेशक सोनाली घोष ने बताया कि यह परियोजना भविष्य की विकास आवश्यकताओं और संरक्षण प्रयासों के बीच संतुलन साधने के लिए डिज़ाइन की गई है। उन्होंने कहा कि काजीरंगा केवल एक संरक्षित क्षेत्र नहीं है, बल्कि गैंडों, बाघों, हाथियों, जंगली भैंसों, दलदली हिरणों और कई अन्य दुर्लभ वन्यजीवों के लिए एक सुरक्षित आश्रय स्थल है।

बरसात के मौसम में, जब पार्क का बड़ा हिस्सा जलमग्न हो जाता है, तो जानवर दक्षिण दिशा में कार्बी आंगलोंग की पहाड़ियों की ऊँची ज़मीन की ओर पलायन करते हैं। इस दौरान राष्ट्रीय राजमार्ग-715 पार करते समय तेज़ रफ़्तार वाहनों से कई जानवर दुर्घटनाओं का शिकार होते रहे हैं। चेतावनी संकेतों के बावजूद दशकों तक ये हादसे होते रहे, जिससे एक स्थायी और व्यापक समाधान की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। सोनाली घोष के अनुसार, वन्यजीव सुरक्षा के साथ-साथ एक सुरक्षित और बेहतर हाईवे अब यहाँ की वास्तविक ज़रूरत बन चुका था।

(लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *