जलती धरती, खतरे में मानवता: Oxford अध्ययन का डरावना पूर्वानुमान; 2050 तक 3.8 अरब लोग झेलेंगे भीषण गर्मी (Extreme Heat)
नई दिल्ली। यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड द्वारा किए गए एक व्यापक वैश्विक अध्ययन ने दुनिया को गंभीर चेतावनी दी है कि यदि पृथ्वी का औसत तापमान पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है, तो 2050 तक लगभग 3.79 अरब लोग अत्यधिक और जानलेवा गर्मी (Heat Wave) की चपेट में होंगे। यह शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल Nature Sustainability में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि इसके अधिकांश दुष्परिणाम 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा पार होते ही शुरू हो जाएंगे, जो पेरिस जलवायु समझौते में निर्धारित की गई थी।
तेजी से बढ़ता हीट स्ट्रेस: आंकड़े डराने वाले
रिपोर्ट के अनुसार:
-
वर्ष 2010 में दुनिया की केवल 23% आबादी अत्यधिक गर्मी के दायरे में थी।
-
आने वाले दशकों में यह आंकड़ा 41% तक पहुंच सकता है, यानी लगभग हर दूसरा व्यक्ति।
यह वृद्धि केवल तापमान तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य, ऊर्जा, श्रम, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता पर सीधा प्रहार करेगी।
भारत और नाइजीरिया सबसे बड़े हॉटस्पॉट
ऑक्सफोर्ड अध्ययन में कहा गया है कि भारत और नाइजीरिया सबसे अधिक प्रभावित देशों में होंगे, क्योंकि:
-
जनसंख्या बहुत अधिक है
-
पहले से ही गर्म जलवायु है
-
और शहरी क्षेत्रों में कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर बेहद कमजोर है
इनके अलावा, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, पाकिस्तान और फिलीपींस में भी करोड़ों लोग असहनीय तापमान झेलने को मजबूर होंगे।
वहीं, सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक, साउथ सूडान, लाओस और ब्राजील जैसे देशों में तापमान वृद्धि की दर सबसे तेज़ होगी।
ठंडे देश भी नहीं बचेंगे
अध्ययन यह भी स्पष्ट करता है कि यह संकट केवल उष्णकटिबंधीय देशों तक सीमित नहीं रहेगा।
2006–2016 की अवधि की तुलना में:
-
ऑस्ट्रिया और कनाडा में गर्म दिनों की संख्या दोगुनी हो जाएगी
-
ब्रिटेन, स्वीडन, फिनलैंड में 150% वृद्धि
-
नॉर्वे में 200%
-
और आयरलैंड में 230% तक उछाल आएगा
इन देशों की इमारतें, बिजली ग्रिड और शहरी ढांचा गर्मी सहने के लिए बनाए ही नहीं गए हैं।
स्वास्थ्य, ऊर्जा और अर्थव्यवस्था पर सीधा हमला
गंभीर गर्मी से:
-
हीट स्ट्रोक और हृदय रोग बढ़ेंगे
-
श्रम उत्पादकता घटेगी
-
जलवायु पलायन बढ़ेगा
-
और एयर कंडीशनिंग की मांग विस्फोटक रूप से बढ़ेगी
इससे बिजली खपत बढ़ेगी और अगर ऊर्जा प्रणाली स्वच्छ नहीं हुई तो कार्बन उत्सर्जन और तेज़ होगा।
Oxford का सख्त संदेश
अध्ययन के प्रमुख लेखक डॉ. जीसस लिज़ाना ने कहा:
“1.5 डिग्री से पहले ही सबसे बड़ा दबाव पड़ेगा। सरकारों के पास अब इंतजार करने का समय नहीं है।”
वहीं डॉ. राधिका खोसला, ऑक्सफोर्ड मार्टिन फ्यूचर ऑफ कूलिंग प्रोग्राम की प्रमुख, ने कहा:
“1.5 डिग्री की सीमा पार करना शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और पलायन पर अभूतपूर्व असर डालेगा।”
नई वैश्विक डेटा प्रणाली
इस शोध के साथ एक ओपन-सोर्स ग्लोबल डेटासेट भी जारी किया गया है, जिसमें:
-
30 हाई-रिज़ॉल्यूशन मैप्स
-
कूलिंग और हीटिंग डिमांड का विश्लेषण
-
और हर देश के लिए जोखिम प्रोफाइल शामिल है
यह नीति निर्माताओं के लिए एक रोडमैप है।

