Nepal में 5 मार्च को चुनाव: Gen Z के विरोध के बाद क्या देश पटरी पर लौटेगा?

Nepal में 5 मार्च को चुनाव: Gen Z के विरोध के बाद क्या देश पटरी पर लौटेगा?
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नव ठाकुरीया

Nepal heads to crucial March 5 general elections after Gen Z-led protests toppled the government. Will political stability return amid fierce contests between KP Sharma Oli, Balen Shah and other top leaders?

हिमालयी राष्ट्र नेपाल में 5 मार्च को होने जा रहे आम चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि यह तय करेंगे कि भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और राजनीतिक अस्थिरता के खिलाफ उभरी Gen Z की नाराज़गी के बाद देश दोबारा स्थिरता की राह पकड़ पाएगा या नहीं। यह चुनाव पिछले वर्ष सितंबर में काठमांडू में युवाओं के नेतृत्व में हुए बड़े आंदोलन के बाद सरकार गिरने के चलते अनिवार्य हो गया था।

करीब 3.05 करोड़ की आबादी वाले नेपाल में 1.89 करोड़ से अधिक मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। इनमें लगभग 92 लाख महिलाएं शामिल हैं। देशभर में 10,967 मतदान केंद्रों पर एक ही दिन बैलेट पेपर के जरिए मतदान होगा। 68 राजनीतिक दलों और निर्दलीयों के कुल 3,484 उम्मीदवार 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा के लिए मैदान में हैं। फिलहाल देश की कमान सुप्रीम कोर्ट की पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के हाथों में है।

नेपाल का चुनावी ढांचा 2015 के संविधान पर आधारित मिश्रित प्रणाली है। इसके तहत 165 सांसद सीधे मतदान यानी फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट प्रणाली से चुने जाते हैं, जबकि 110 सीटें आनुपातिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से भरी जाती हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य किसी एक दल के पूर्ण वर्चस्व को रोकना और छोटे दलों तथा अल्पसंख्यकों को संसद में उचित प्रतिनिधित्व देना है। यही कारण है कि नेपाल में गठबंधन सरकारें आम रही हैं, लेकिन इसके चलते राजनीतिक अस्थिरता भी लगातार बनी रही है।

प्रधानमंत्री पद की दौड़ इस बार बेहद रोचक मानी जा रही है। चार बार के प्रधानमंत्री और CPN-UML के नेता खड्ग प्रसाद शर्मा ओली झापा-5 सीट से फिर चुनावी मैदान में हैं। सितंबर 2025 में उन्हें युवाओं के आंदोलन के दबाव में प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था, लेकिन पूर्वी नेपाल में उनका राजनीतिक आधार अब भी मजबूत माना जाता है।

उनके सामने Gen Z की आकांक्षाओं का चेहरा बनकर उभरे 35 वर्षीय बालेंद्र शाह हैं। स्ट्रक्चरल इंजीनियर से रैपर और फिर नेता बने बालेंद्र शाह सोशल मीडिया पर खासे लोकप्रिय हैं। हाल ही में उन्होंने काठमांडू महानगर के मेयर पद से इस्तीफा देकर राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का दामन थामा, जिसका नेतृत्व टीवी पत्रकार से राजनेता बने रबी लामिछाने कर रहे हैं। नेपाल में ओपिनियन पोल पर प्रतिबंध के बावजूद आम राजनीतिक चर्चा यही है कि बालेंद्र शाह सत्ता के केंद्र सिंह दरबार तक पहुंचने की दौड़ में आगे माने जा रहे हैं।

तीसरे बड़े दावेदार के रूप में देश की सबसे पुरानी पार्टी नेपाली कांग्रेस ने अपने नए अध्यक्ष गगन कुमार थापा को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया है। उन्होंने पांच बार प्रधानमंत्री रह चुके शेर बहादुर देउबा की जगह ली है, जिन्होंने इस बार चुनाव न लड़ने का फैसला किया है। वहीं, एक अन्य पूर्व प्रधानमंत्री झाला नाथ खनल भी इस चुनाव से स्वयं को दूर रखे हुए हैं।

वामपंथी राजनीति के अनुभवी नेता पुष्प कमल दहल (प्रचंड) भी एक बार फिर सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। 1996 से 2006 तक चले माओवादी आंदोलन ने नेपाल की 240 वर्ष पुरानी राजशाही को समाप्त कर 2008 में उसे संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बनाया था। हालांकि इसके बाद बीते लगभग दो दशकों में 14 से अधिक सरकारों का बदलना यह दर्शाता है कि राजनीतिक स्थिरता अब भी नेपाल की सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है।

नेपाल चुनाव आयोग ने इस बार सख्त आचार संहिता लागू की है। चुनाव प्रचार में नाबालिगों की भागीदारी पर स्पष्ट प्रतिबंध लगाया गया है। मतदान 5 मार्च को शाम 5 बजे समाप्त होते ही बैलेट बॉक्स काठमांडू भेज दिए जाएंगे। प्रत्यक्ष प्रणाली के नतीजे 24 घंटे के भीतर और आनुपातिक प्रतिनिधित्व से जुड़ी सीटों के परिणाम दो से तीन दिनों में घोषित किए जाने की संभावना है।

नेपाल की 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा भारत से जुड़ी है, इसलिए काठमांडू की राजनीतिक स्थिरता का असर पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत तक महसूस किया जाता है। हाल ही में भारत ने चुनावी तैयारियों में सहयोग के लिए नेपाल को करीब 100 पिकअप वाहन और अन्य सामग्री उपलब्ध कराई है। भारत-नेपाल संबंधों में चीन की बढ़ती भूमिका, सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय संतुलन जैसे मुद्दे भी इस चुनाव को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाते हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या Gen Z के विरोध से जन्मा यह चुनाव नेपाल को स्थिर, पारदर्शी और विकासोन्मुख शासन की ओर ले जाएगा, या फिर गठबंधन राजनीति और सत्ता संघर्ष का पुराना दौर जारी रहेगा। इसका जवाब 5 मार्च को मतपेटियों में बंद हो जाएगा।

(लेखक पूर्वी भारत के वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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