वॉशिंगटन: एक अहम कूटनीतिक संकेत के तहत पाकिस्तान (Pakistan) को 4 फरवरी को वॉशिंगटन (US) में होने वाले ग्लोबल क्रिटिकल मिनरल्स कॉन्फ्रेंस (Global Critical Meniral Meet) में शामिल नहीं किया गया है, जबकि भारत (India) के विदेश मंत्री एस. जयशंकर इस उच्चस्तरीय बैठक में भाग लेंगे।
यह बैठक अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो द्वारा बुलाई गई है, जिसका उद्देश्य वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर बढ़ते दबाव और चीन के वर्चस्व को चुनौती देने के लिए रणनीतिक साझेदारियाँ बनाना है। इस सम्मेलन में दर्जन भर से अधिक समान विचारधारा वाले देशों को आमंत्रित किया गया है — लेकिन पाकिस्तान को नहीं।
🚨 BIG! Pakistan excluded from the Critical Minerals Conference in Washington on Feb 4, while India’s EAM S. Jaishankar attends🤣
— From begging tables to being shut out of strategic forums, Pakistan watches from the sidelines
— The Analyzer (News Updates🗞️) (@Indian_Analyzer) February 1, 2026
खनिज कूटनीति से कूटनीतिक उपेक्षा तक
पिछले वर्ष इस्लामाबाद ने खुद को वैश्विक खनिज दौड़ में प्रमुख खिलाड़ी के रूप में पेश करने के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास किए थे। प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ और सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने व्हाइट हाउस में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को दुर्लभ खनिजों के नमूने भेंट किए थे।
पाकिस्तान ने अमेरिकी कंपनियों, जिनमें यूएस स्ट्रैटेजिक मेटल्स शामिल है, के साथ लगभग 50 करोड़ डॉलर के समझौते भी किए थे। ये समझौते एंटीमनी, तांबा, सोना, टंग्स्टन और रेयर अर्थ एलिमेंट्स के खनन व निर्यात से जुड़े थे।
फिर भी, ये प्रयास वॉशिंगटन में जगह दिलाने में नाकाम रहे।
पाकिस्तान को क्यों किया गया नजरअंदाज?
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका की यह दूरी केवल खनिज संसाधनों पर नहीं, बल्कि राजनीतिक स्थिरता, सुशासन, निवेश सुरक्षा और नीति की विश्वसनीयता जैसे मुद्दों से जुड़ी है।
पाकिस्तान में बार-बार बदलती सरकारें, आर्थिक अस्थिरता और नागरिक-सेना तनाव वॉशिंगटन के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। यही कारण है कि उसके खनिज प्रस्तावों को रणनीतिक साझेदारी की बजाय कूटनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
भारत का विपरीत और मजबूत रुख
भारत ने खुद को वैश्विक सप्लाई-चेन का भरोसेमंद भागीदार बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। उसकी नीतियाँ अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ मेल खाती हैं।
सम्मेलन में भारत की मौजूदगी इस बात का संकेत है कि नई दिल्ली चीन पर निर्भरता घटाने की वैश्विक रणनीति में एक अहम भूमिका निभा रहा है।
खनिज से आगे: भू-राजनीतिक संदेश
पाकिस्तान के लिए यह खनिज पहल अमेरिका के साथ रिश्तों को केवल सुरक्षा से आगे आर्थिक रणनीति की ओर मोड़ने की कोशिश थी।
लेकिन सम्मेलन से बाहर किया जाना यह साफ संदेश देता है कि केवल संसाधन पर्याप्त नहीं हैं — भरोसेमंद शासन, पारदर्शी नीतियाँ और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता ही वॉशिंगटन की प्राथमिकता हैं।

