आदित्य वर्मा, शोधार्थी आज की वैश्विक राजनीति में ग्रीनलैंड (Greenland) संकट अब केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह यूरोप (Europe) के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ का संकेत बन चुका है। यह संकट यूरोप को अमेरिका (US) पर अपनी निर्भरता पर पुनर्विचार करने और नए रणनीतिक विकल्प तलाशने के लिए विवश कर रहा है।
ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क के अधीन एक स्वायत्त क्षेत्र है, अपनी भौगोलिक स्थिति, विशाल प्राकृतिक संसाधनों और आर्कटिक क्षेत्र में खुलते नए समुद्री मार्गों के कारण आज विश्व की सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक चौकियों में शामिल हो चुका है। हाल के हफ्तों में अमेरिका के राष्ट्रपति ने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण की खुली इच्छा जताते हुए यह तक कह दिया कि यदि यूरोपीय देशों ने उसकी “ग्रीनलैंड खरीद योजना” को स्वीकार नहीं किया तो उनके निर्यातित सामानों पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा, जिसे जून तक 25 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है। इस चेतावनी में डेनमार्क, फ्रांस, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम सहित आठ अन्य प्रमुख यूरोपीय देशों का उल्लेख किया गया है।
यह धमकी केवल राजनीतिक दबाव नहीं, बल्कि एक गहरा आर्थिक संकेत भी है। पहले से ही अमेरिका ने स्टील, एल्युमिनियम और ऑटोमोबाइल जैसे उद्योगों पर 25 प्रतिशत तक आयात शुल्क लगाए हैं, जिससे यूरोपीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता कमजोर हुई है और व्यापार घाटा बढ़ा है। इन कदमों ने ट्रांस-अटलांटिक व्यापार संबंधों में गंभीर तनाव पैदा किया है, जिसका प्रभाव यूरोपीय शेयर बाजारों, आपूर्ति श्रृंखलाओं और औद्योगिक उत्पादन पर स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है। इसके जवाब में यूरोपीय संघ भी लगभग 93 अरब यूरो के अमेरिकी उत्पादों पर शुल्क लगाने पर विचार कर रहा है, जिससे यह व्यापार युद्ध और गहराने की आशंका है।
ग्रीनलैंड संकट की जड़ें आर्कटिक भू-राजनीति में निहित हैं। समुद्री बर्फ के पिघलने से नए नौवहन मार्ग खुल रहे हैं, जो यूरोप और एशिया के बीच दूरी को कम कर सकते हैं। साथ ही, यह क्षेत्र भविष्य की ऊर्जा, तकनीक और रक्षा आवश्यकताओं से जुड़े संसाधनों का भंडार है। यही कारण है कि अमेरिका, रूस और चीन—तीनों शक्तियाँ आर्कटिक में अपने प्रभाव को बढ़ाने की होड़ में लगी हैं।
अमेरिका का तर्क है कि ग्रीनलैंड पर नियंत्रण उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक है ताकि वह रूस और चीन के संभावित विस्तार को रोक सके तथा मिसाइल मार्गों पर निगरानी बढ़ा सके। किंतु यह तर्क यूरोप और डेनमार्क के नेतृत्व वाले वैश्विक समुदाय द्वारा चुनौती दी जा रही है। उनका कहना है कि ग्रीनलैंड एक संप्रभु क्षेत्र है और उसके निवासियों के आत्मनिर्णय के अधिकार तथा अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान अनिवार्य है।
यूरोपीय संघ के सदस्य देशों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे किसी भी प्रकार के एकतरफा अमेरिकी नियंत्रण के खिलाफ हैं और ग्रीनलैंड को “बिकाऊ संपत्ति” नहीं मानते। डेनमार्क और अन्य यूरोपीय नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका ने सैन्य या जबरन कार्रवाई की तो यह नाटो जैसे सामरिक गठबंधन के अस्तित्व पर भी गंभीर संकट खड़ा कर सकता है। यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि शीत युद्ध के बाद से नाटो ही ट्रांस-अटलांटिक सुरक्षा व्यवस्था का मूल आधार रहा है।
इस बीच, रूस ने भी पश्चिमी शक्तियों पर दोहरे मानदंड अपनाने का आरोप लगाते हुए कहा है कि यह संकट उनके नैतिक दावों की कमजोरियों को उजागर करता है। रूस का दावा है कि आर्कटिक उसका पारंपरिक क्षेत्र रहा है और वह वहां अपनी रणनीतिक उपस्थिति बनाए रखेगा। चीन भी इस क्षेत्र में अपनी भूमिका बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। इस प्रकार आर्कटिक अब एक नए “ग्रेट गेम” का मैदान बन चुका है, जहाँ संसाधनों के साथ-साथ व्यापक भू-राजनीतिक प्रभुत्व की प्रतिस्पर्धा चल रही है।
इस परिदृश्य में यूरोप के सामने दो स्पष्ट विकल्प हैं। पहला—अमेरिका के साथ पारंपरिक साझेदारी को बनाए रखना, भले ही उसे दबाव और टैरिफ जैसी धमकियों का सामना करना पड़े। दूसरा—एक अधिक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर और बहुध्रुवीय रणनीति अपनाना, जिसमें रूस और चीन के साथ संवाद व सहयोग की संभावनाएँ भी शामिल हों।
यह दूसरा विकल्प आसान नहीं है। रूस के साथ ऊर्जा और सुरक्षा संबंधी टकराव हैं, वहीं चीन के साथ व्यापारिक रिश्तों के बावजूद राजनीतिक और मानवाधिकार संबंधी मतभेद मौजूद हैं। फिर भी, बदलती वैश्विक परिस्थितियों में केवल अमेरिका पर निर्भर रहना यूरोप की रणनीतिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
ग्रीनलैंड संकट ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि यूरोप को नाटो के पारंपरिक ढांचे पर पुनर्विचार करना होगा। आत्मनिर्भर सुरक्षा का अर्थ केवल सैन्य क्षमता बढ़ाना नहीं, बल्कि संयुक्त रक्षा नीति, साझा व्यापार रणनीति, ऊर्जा सुरक्षा और समन्वित वैश्विक कूटनीति को भी सुदृढ़ करना है।
अमेरिका और यूरोप की साझेदारी अब अपरिवर्तनीय नहीं रही। अमेरिकी एकतरफा नीतियों ने यूरोप को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि उसे आर्थिक, सैन्य और राजनयिक क्षेत्रों में अधिक आत्मनिर्भर बनना होगा। एक बहुपक्षीय दृष्टिकोण अपनाकर ही यूरोप न केवल अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है, बल्कि एक संतुलित, स्वावलंबी और प्रभावशाली वैश्विक शक्ति के रूप में उभर सकता है।
ग्रीनलैंड पर अमेरिका की नजर और उसकी टैरिफ धमकियाँ इस बात का संकेत हैं कि यूरोप के पास अब टालने का समय नहीं है। उसे अपने भविष्य की दिशा तय करनी होगी—या तो पुराने ढांचे में बंधे रहकर, या फिर बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अपने लिए एक स्वतंत्र और सशक्त स्थान बनाकर।

