नई दिल्ली: देश की राजनीति में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। विपक्षी दलों के 193 सांसदों (Opposition MPs) ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग करते हुए संसद के दोनों सदनों में औपचारिक नोटिस दिया है। इस कदम से सत्तारूढ़ पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव और तेज हो गया है तथा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है।
बताया जा रहा है कि लोकसभा और राज्यसभा के कुल 193 सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं। इसे संविधान में निर्धारित प्रक्रिया के तहत दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों को विचार के लिए सौंपा गया है।
पक्षपात और अनियमितताओं के आरोप
विपक्षी नेताओं का आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन करते समय पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया है और कई मामलों में निर्णय प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं रही। उनका कहना है कि ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में चुनाव आयोग द्वारा लिए गए कुछ फैसलों ने चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े किए हैं।
नोटिस में यह भी कहा गया है कि मतदाता सूची के संशोधन और चुनाव से जुड़े अन्य प्रशासनिक फैसलों को लेकर विपक्षी दलों के बीच गंभीर चिंताएँ हैं। उनका दावा है कि इन निर्णयों का असर मतदाताओं की भागीदारी और लोकतांत्रिक विश्वसनीयता पर पड़ सकता है।
Over 190 Opposition MPs have submitted notices in both Houses of Parliament seeking a motion for the removal of Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar. @tweets_amit with more details.#CEC #GyaneshKumar #ITVideo @AneeshaMathur pic.twitter.com/bSQPdIpDnl
— IndiaToday (@IndiaToday) March 13, 2026
संवैधानिक प्रक्रिया
भारतीय संविधान के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने जैसी ही होती है। सबसे पहले संसद के पीठासीन अधिकारी नोटिस की जांच करते हैं और उसे स्वीकार या अस्वीकार करने का निर्णय लेते हैं।
यदि नोटिस स्वीकार कर लिया जाता है, तो इसके बाद औपचारिक जांच प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। प्रस्ताव को सफल होने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित होना जरूरी होता है, जिससे यह प्रक्रिया कानूनी रूप से काफी कठोर और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ
विपक्षी दलों ने इस कदम को देश की चुनावी व्यवस्था की स्वतंत्रता और निष्पक्षता की रक्षा के लिए जरूरी बताया है। वहीं कुछ आलोचकों का कहना है कि यह पहल राजनीतिक प्रेरित हो सकती है और इससे संस्थागत टकराव और बढ़ने की आशंका है।
इस घटनाक्रम के बाद संसद में आने वाले दिनों में तीखी राजनीतिक बहस होने की संभावना है और यह मुद्दा सदनों की कार्यवाही के केंद्र में रह सकता है।

