स्ट्रोक क्या होता है?
स्ट्रोक तब होता है जब दिमाग तक खून की सप्लाई अचानक रुक जाती है।
इसके दो मुख्य कारण हो सकते हैं—
- दिमाग की किसी नस में खून का थक्का जम जाना, या
दिमाग की किसी नस का फट जाना और खून बहना।- ऐसी स्थिति में दिमाग के प्रभावित हिस्से तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती, जिससे वह हिस्सा ठीक से काम करना बंद कर देता है। अगर समय पर इलाज न मिले, तो स्ट्रोक से लकवा, बोलने में परेशानी, स्थायी विकलांगता या जान का खतरा भी हो सकता है।
सुपरनोवा स्टेंट किसके लिए उपयोग होता है?
सुपरनोवा स्टेंट का उपयोग दिमागी स्ट्रोक (इस्केमिक स्ट्रोक) के इलाज में किया जाता है।
यह दिमाग की नसों में जमे खून के थक्के को हटाने में मदद करता है, जिससे खून का बहाव फिर से सामान्य हो जाता है और दिमाग को होने वाला नुकसान कम होता है।
नई दिल्ली: भारत में स्ट्रोक इलाज के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की गई है। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), नई दिल्ली ने देश में पहली बार ‘सुपरनोवा स्टेंट’ (‘Supernova Stent’) नामक एक आधुनिक स्ट्रोक उपचार उपकरण का घरेलू क्लिनिकल ट्रायल सफलतापूर्वक पूरा किया है।
AIIMS के अनुसार, यह भारत का पहला स्ट्रोक डिवाइस है जिसे पूरी तरह देश में किए गए क्लिनिकल ट्रायल के आधार पर मंजूरी मिली है। अब तक ऐसे उन्नत उपकरणों के लिए भारत को विदेशी ट्रायल और आयात पर निर्भर रहना पड़ता था।
भारतीय मरीजों को ध्यान में रखकर तैयार
AIIMS ने बताया कि सुपरनोवा स्टेंट को खासतौर पर भारतीय मरीजों की जरूरतों को ध्यान में रखकर डिजाइन किया गया है। भारत में स्ट्रोक की समस्या पश्चिमी देशों की तुलना में कम उम्र के लोगों में ज्यादा देखी जाती है।
डॉक्टरों के मुताबिक, खराब जीवनशैली, तनाव, मधुमेह, हाई ब्लड प्रेशर और समय पर इलाज न मिलना इसके बड़े कारण हैं। ऐसे में सुपरनोवा स्टेंट जैसे तेज और प्रभावी उपकरण की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही थी।
पहले ही सैकड़ों मरीजों में सफल उपयोग
AIIMS ने यह भी स्पष्ट किया कि सुपरनोवा स्टेंट पूरी तरह नया नहीं है। इसे दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में 300 से अधिक मरीजों के इलाज में पहले ही इस्तेमाल किया जा चुका है, जहां इसके नतीजे उत्साहजनक रहे हैं।
अब भारत में हुए क्लिनिकल ट्रायल ने इसे देशी स्तर पर वैज्ञानिक मान्यता दिला दी है।
इलाज सस्ता होने की उम्मीद, कीमत अभी तय नहीं
AIIMS ने बताया कि फिलहाल सुपरनोवा स्टेंट की अंतिम कीमत तय नहीं हुई है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसका भारत में निर्माण शुरू होने से इलाज की लागत में बड़ी कमी आ सकती है।
फिलहाल निजी अस्पतालों में स्ट्रोक के लिए की जाने वाली मैकेनिकल थ्रोम्बेक्टॉमी प्रक्रिया का खर्च 5 से 10 लाख रुपये या उससे ज्यादा तक पहुंच जाता है, जो आम मरीज की पहुंच से बाहर होता है। डॉक्टरों का कहना है कि स्वदेशी डिवाइस आने से यह खर्च काफी हद तक कम हो सकता है।
#AIIMS, नई दिल्ली ने स्ट्रोक के इलाज़ के लिए ‘सुपरनोवा स्टंट’ नामक स्वदेशी उपकरण का पहली बार परीक्षण किया।
संस्थान ने कहा कि #SupernovaStent का निर्माण अब देश में ही किया जाएगा। इससे प्रतिवर्ष स्ट्रोक का शिकार होने वाले 17 लाख से अधिक लोगों को सहायता मिलेगी।#NewDelhi pic.twitter.com/xVUlhRK6Cr
— आकाशवाणी समाचार (@AIRNewsHindi) December 14, 2025
हर साल 17 लाख मरीजों के लिए नई उम्मीद
भारत में हर साल करीब 17 लाख लोग स्ट्रोक का शिकार होते हैं। सही समय पर इलाज न मिलने पर मरीज की जान जाने या जीवनभर की विकलांगता का खतरा रहता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सुपरनोवा स्टेंट जैसे उपकरण अगर ज्यादा अस्पतालों तक पहुंचे, तो ‘गोल्डन आवर’ में इलाज संभव होगा, जिससे हजारों जानें बचाई जा सकती हैं।
सिर्फ एक डिवाइस नहीं, बड़ी उपलब्धि
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, यह सफलता सिर्फ एक उपकरण तक सीमित नहीं है। यह भारत की चिकित्सकीय रिसर्च, मेडिकल टेक्नोलॉजी और आत्मनिर्भर स्वास्थ्य प्रणाली की दिशा में बड़ा कदम है।
AIIMS ने संकेत दिया है कि आने वाले समय में इसके बड़े पैमाने पर उत्पादन, डॉक्टरों को प्रशिक्षण और सरकारी अस्पतालों में उपलब्धता पर काम किया जाएगा।
भारत में स्ट्रोक के खिलाफ जंग में सुपरनोवा स्टेंट को एक नई रोशनी के रूप में देखा जा रहा है।

