मिथलेश दास
विश्व पर्यावरण दिवस (World Environment Day) पर विशेष लेख: झारखंड में खनन, वनों की कटाई, जल संकट और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के बीच विकास और पर्यावरण संरक्षण के संतुलन की जरूरत पर गहन चर्चा।
देश और दुनिया में विकास को प्रगति का सबसे बड़ा पैमाना माना जाता है। ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें, नए उद्योग, आधुनिक तकनीक और आर्थिक वृद्धि को विकास की पहचान के रूप में देखा जाता है। लेकिन जब विकास की यह यात्रा प्रकृति के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगाने लगे, तब यह सोचने की आवश्यकता होती है कि क्या हम वास्तव में सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
विश्व पर्यावरण दिवस (World Environment Day) के अवसर पर यह प्रश्न विशेष रूप से झारखंड जैसे राज्य के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। प्राकृतिक संसाधनों, घने जंगलों, नदियों, पहाड़ों, खनिज संपदा और समृद्ध आदिवासी संस्कृति से भरपूर झारखंड आज विकास और पर्यावरण के बीच बढ़ते संघर्ष का केंद्र बन चुका है। विकास की अंधी दौड़ में जिस प्रकार जंगल कट रहे हैं, खदानें फैल रही हैं, नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं और प्राकृतिक संतुलन बिगड़ रहा है, वह आने वाले समय के लिए गंभीर चेतावनी है।
खनिज संपदा बनी विकास की आधारशिला
झारखंड को प्रकृति ने भरपूर संसाधनों से नवाजा है। देश के खनिज भंडार का एक बड़ा हिस्सा इस राज्य में स्थित है। कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट, यूरेनियम, अभ्रक सहित अनेक खनिज यहाँ प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यही कारण है कि स्वतंत्रता के बाद झारखंड औद्योगिक विकास का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा।
धनबाद की कोयला खदानें, बोकारो का इस्पात उद्योग, जमशेदपुर का औद्योगिक विकास और विभिन्न खनन परियोजनाएँ राज्य की आर्थिक प्रगति के प्रतीक मानी जाती हैं। इन परियोजनाओं ने रोजगार और उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन इसके साथ ही पर्यावरणीय क्षति का एक लंबा अध्याय भी शुरू हुआ।
खनन और पर्यावरणीय संकट
झारखंड का सबसे बड़ा पर्यावरणीय संकट खनन गतिविधियों से जुड़ा हुआ है। खनन आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है, लेकिन अनियंत्रित खनन ने राज्य की प्राकृतिक संरचना को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
धनबाद और झरिया इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। झरिया की भूमिगत कोयला खदानों में दशकों से लगी आग आज भी जल रही है। यह आग केवल कोयले को नहीं, बल्कि पर्यावरण और मानव जीवन को भी प्रभावित कर रही है। इसके कारण भूमि धंस रही है, जहरीली गैसें निकल रही हैं और हजारों लोग स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल स्थानीय समस्या नहीं, बल्कि एक व्यापक पर्यावरणीय संकट का संकेत है।
जंगलों का सिकुड़ता दायरा
खनन और औद्योगिक विस्तार के कारण झारखंड में वनों की कटाई लगातार बढ़ी है। राज्य की पहचान उसके जंगलों से रही है। साल, सखुआ, महुआ और पलाश जैसे वृक्ष केवल वनस्पति नहीं, बल्कि यहाँ की संस्कृति और जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं।
आदिवासी समाज का जीवन जंगलों से गहराई से जुड़ा हुआ है। उनकी परंपराएँ, त्योहार, भोजन, औषधियाँ और आजीविका का बड़ा हिस्सा वनों पर निर्भर करता है। लेकिन विकास परियोजनाओं के नाम पर हजारों हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग खनन और औद्योगिक गतिविधियों के लिए किया जा चुका है।
वनों की कटाई का प्रभाव केवल पेड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह जैव विविधता और वन्यजीवों के अस्तित्व को भी प्रभावित करता है।
बढ़ता मानव-वन्यजीव संघर्ष
जंगलों के सिकुड़ने से वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है। झारखंड में हाथियों और मनुष्यों के बीच बढ़ते संघर्ष की घटनाएँ इसका स्पष्ट उदाहरण हैं।
पहले जहाँ हाथियों के लिए पर्याप्त वन क्षेत्र और सुरक्षित मार्ग उपलब्ध थे, वहीं अब उनके प्राकृतिक गलियारे बाधित हो चुके हैं। परिणामस्वरूप हाथी आबादी वाले क्षेत्रों की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में वृद्धि हो रही है।
जल संकट की बढ़ती चुनौती
झारखंड की नदियाँ कभी जीवन का आधार मानी जाती थीं। दामोदर, स्वर्णरेखा, बराकर और कोयल जैसी नदियाँ राज्य की पहचान रही हैं। लेकिन आज इनकी स्थिति चिंता का विषय बनती जा रही है।
औद्योगिक कचरे, खनन अपशिष्ट और बढ़ते प्रदूषण के कारण कई नदियों का जल दूषित हो रहा है। अनेक क्षेत्रों में पानी की गुणवत्ता लगातार गिर रही है। इसके साथ ही भूजल स्तर में भी कमी दर्ज की जा रही है। गर्मियों के दौरान राज्य के कई हिस्सों में जल संकट गंभीर रूप धारण कर लेता है।
जलवायु परिवर्तन का बढ़ता प्रभाव
पिछले कुछ वर्षों में झारखंड में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। कभी अपेक्षाकृत ठंडे मौसम के लिए पहचाने जाने वाला यह राज्य अब भीषण गर्मी और लू की चपेट में आने लगा है।
कई जिलों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुँच रहा है। वर्षा का स्वरूप भी अस्थिर हुआ है। कहीं अत्यधिक बारिश तो कहीं सूखे जैसी परिस्थितियाँ देखने को मिल रही हैं। इसका सीधा असर कृषि और ग्रामीण जीवन पर पड़ रहा है।
चूँकि राज्य की बड़ी आबादी कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर निर्भर है, इसलिए पर्यावरणीय असंतुलन का सबसे अधिक प्रभाव किसानों और गरीब समुदायों पर पड़ता है।
विकास और पर्यावरण: विरोध नहीं, संतुलन की आवश्यकता
सबसे चिंताजनक बात यह है कि विकास और पर्यावरण को अक्सर दो विरोधी अवधारणाओं के रूप में देखा जाता है। यह मान लिया गया है कि विकास की कीमत पर्यावरणीय क्षति के रूप में चुकानी ही होगी।
लेकिन दुनिया के अनेक देशों ने यह साबित किया है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं। आवश्यकता केवल सही नीति, दूरदृष्टि और जिम्मेदार क्रियान्वयन की है।
झारखंड में भी सतत विकास की अवधारणा को प्राथमिकता देनी होगी। विकास का अर्थ केवल उद्योगों और परियोजनाओं की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि ऐसा विकास सुनिश्चित करना होना चाहिए जो आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों और पर्यावरणीय संतुलन की रक्षा कर सके।
जनभागीदारी और पर्यावरण चेतना जरूरी
पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें समाज की सक्रिय भागीदारी भी आवश्यक है।
विद्यालयों और महाविद्यालयों में पर्यावरण शिक्षा को व्यवहारिक रूप देना होगा। विद्यार्थियों को प्रकृति संरक्षण से जुड़े कार्यक्रमों में शामिल करना होगा। साथ ही आदिवासी समुदायों की पारंपरिक ज्ञान प्रणाली से सीखने की आवश्यकता है।
सरहुल जैसे पर्व प्रकृति, वृक्षों और पर्यावरण के प्रति सम्मान का संदेश देते हैं। आधुनिक समाज को इन परंपराओं से प्रेरणा लेकर प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।
समय की सबसे बड़ी पुकार
विश्व पर्यावरण दिवस केवल एक औपचारिक आयोजन बनकर नहीं रह जाना चाहिए। पौधारोपण की तस्वीरें खिंचवाने या सोशल मीडिया पर संदेश साझा करने भर से पर्यावरण की रक्षा नहीं होगी। इसके लिए वास्तविक और सतत प्रयासों की आवश्यकता है।
सरकार, उद्योग, समाज और आम नागरिक—सभी को मिलकर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम करना होगा। विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास जो जीवन को सुरक्षित बनाए, न कि उसे संकट में डाले।
यदि आज भी हमने प्रकृति की इस अनसुनी चीख को नहीं सुना, तो आने वाला समय और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। झारखंड की धरती, जंगल, नदियाँ और पहाड़ लगातार संकेत दे रहे हैं कि अब संतुलन स्थापित करने का समय आ चुका है।
क्योंकि जब प्रकृति अपना संतुलन खो देती है, तब विकास की चमक भी मानव जीवन को सुरक्षित नहीं रख पाती। प्रकृति हमें सब कुछ देती है, बदले में केवल संरक्षण और सम्मान की अपेक्षा करती है।
यदि विकास की अंधी दौड़ इसी तरह जारी रही, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमसे अवश्य पूछेंगी—जब जंगल कट रहे थे, नदियाँ प्रदूषित हो रही थीं और धरती अपनी पीड़ा व्यक्त कर रही थी, तब हम मौन क्यों थे?


