Assam Flood 2026: पूर्वी असम में आई विनाशकारी बाढ़ के बीच नागालैंड (Nagaland) में पर्यावरणीय क्षरण, अवैध खनन और वनों की कटाई पर नए सवाल उठे हैं। जानिए भारी बारिश, गाद, नदियों और पर्यावरणीय कारकों के बीच संभावित संबंध तथा राहत एवं पुनर्वास की ताजा स्थिति।
जैसे-जैसे पूर्वी असम (Assam) में बाढ़ का पानी उतर रहा है और सरकार हजारों प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू कर रही है, इस आपदा के कारणों को लेकर ध्यान अब ऊपरी इलाकों यानी नागा पहाड़ियों की ओर भी जा रहा है। जुलाई 2026 के दूसरे पखवाड़े में हुई अत्यधिक बारिश ने असम के शिवसागर, चराइदेव, गोलाघाट और जोरहाट समेत कई जिलों में विनाशकारी बाढ़ की स्थिति पैदा कर दी। नागालैंड (Nagaland) और अरुणाचल प्रदेश (Arunachal Pradesh) से निकलने वाली ब्रह्मपुत्र की कई सहायक नदियां भारी मात्रा में गाद और मिट्टीयुक्त पानी लेकर असम के मैदानी इलाकों में पहुंचीं।
बाढ़ से हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि जलमग्न हो गई, बड़ी संख्या में पशुधन और मुर्गियां बह गईं तथा सैकड़ों परिवार बेघर हो गए। 2 अगस्त तक असम में बाढ़ की इस ताजा लहर में बच्चों समेत 82 लोगों की मौत हो चुकी थी, जबकि कुछ लोग अब भी लापता बताए गए। हजारों परिवार बाढ़ प्रभावित इलाकों में बनाए गए राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं। इनमें से बड़ी संख्या में लोगों के घर, फसलें और पशुधन तबाह हो चुके हैं।
हालांकि 18 से 22 जुलाई के बीच असम, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में हुई भारी बारिश—जो कुछ स्थानों पर 137 मिमी तक दर्ज की गई—को इस आपदा का प्रमुख कारण माना गया, लेकिन पहाड़ी इलाकों में मानवीय गतिविधियों से हुए पर्यावरणीय नुकसान ने स्थिति को और गंभीर बनाने के सवाल भी खड़े किए हैं। पूर्वी असम की प्रमुख नदियों—दिखो, दिसांग, दारिका और जांजी—में अचानक पानी और गाद का तेज बहाव आया। कई स्थानों पर नदियां अपनी वहन क्षमता से ऊपर बहने लगीं और तटबंध टूट गए।
रिपोर्टों के अनुसार, नागालैंड सरकार ने संभावित खतरे को लेकर दिसपुर प्रशासन को आगाह किया था, लेकिन असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण स्थिति की गंभीरता का समय रहते पर्याप्त आकलन नहीं कर सका। प्रभावी आंतरिक चेतावनी तंत्र की कथित कमी और शिवसागर तथा चराइदेव जैसे जिलों में अपर्याप्त तैयारियों ने भी नुकसान को बढ़ाने में भूमिका निभाई।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने असम में हुई तबाही पर चिंता जताते हुए मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त की। प्रधानमंत्री मोदी ने नई दिल्ली में असम के नेताओं, जिनमें केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल तथा प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप सैकिया शामिल थे, के साथ बाढ़ की स्थिति की समीक्षा की। इससे पहले उन्होंने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से फोन पर बातचीत कर केंद्र की ओर से हरसंभव सहायता का भरोसा दिलाया था। गृह मंत्री अमित शाह ने भी मुख्यमंत्री से स्थिति की जानकारी ली और राहत, पुनर्वास तथा पुनर्निर्माण कार्यों में आवश्यक केंद्रीय सहयोग का आश्वासन दिया।
इस बीच, पूर्वी असम में बाढ़ से हुए नुकसान का आकलन करने पहुंची छह सदस्यीय अंतर-मंत्रालयी केंद्रीय टीम ने अपना दौरा पूरा कर लिया है। टीम को असम और आसपास के पहाड़ी क्षेत्रों में हुई अत्यधिक बारिश से हुए व्यापक नुकसान की जानकारी दी गई। असम सरकार ने प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिए केंद्र से विशेष पैकेज की मांग भी की है।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने प्रभावित परिवारों के लिए कई राहत उपायों की घोषणा की है। बाढ़ में जान गंवाने वालों के परिवारों को पहले घोषित चार लाख रुपये की अनुग्रह राशि के अतिरिक्त पांच लाख रुपये की सहायता देने की घोषणा की गई। वहीं, बाढ़ से जुड़ी घटनाओं में 30 दिनों से अधिक समय से लापता लोगों के परिवारों को भी चार लाख रुपये की सहायता दी जाएगी।
सरकार ने एक लाख से अधिक बाढ़ प्रभावित परिवारों को तत्काल जरूरतों के लिए 15,000 रुपये प्रति परिवार देने की घोषणा की है। प्रभावित क्षेत्रों के ‘अरुणोदय’ योजना के लाभार्थियों और विद्यार्थियों के लिए भी एकमुश्त आर्थिक सहायता का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा शिक्षा, वाहन, आवास और कृषि सहित विभिन्न मदों में लिए गए ऋणों की अदायगी पर 19 जुलाई से छह महीने की मोहलत देने की घोषणा की गई। शिवसागर और चराइदेव जिलों में क्षतिग्रस्त नामघरों—असमिया समाज के पारंपरिक प्रार्थना स्थलों—की मरम्मत के लिए प्रति नामघर 1.5 लाख रुपये की सहायता देने की भी बात कही गई है।

असम के राज्यपाल लक्ष्मण प्रसाद आचार्य ने 30 जुलाई को बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण किया। उन्होंने प्रभावित परिवारों को भरोसा दिलाया कि संकट की इस घड़ी में सरकारी तंत्र उनके साथ खड़ा है। राज्यपाल ने जिला प्रशासन को राहत शिविरों में रह रहे बच्चों, महिलाओं, स्तनपान कराने वाली माताओं और बुजुर्गों की जरूरतों पर विशेष ध्यान देने का निर्देश दिया।
भारत मौसम विज्ञान विभाग ने आने वाले दिनों में असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा में व्यापक बारिश का अनुमान जताया है। वहीं, भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने बाढ़ का पानी उतरने के बाद प्रभावित इलाकों में जलजनित और वेक्टर जनित बीमारियों के फैलने के खतरे को लेकर आगाह किया है। अधिकारियों से सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित करने को कहा गया है, ताकि टाइफाइड, पीलिया और पेचिश जैसी बीमारियों के प्रसार को रोका जा सके।
नागा पहाड़ियों में खनन और वनों की कटाई पर सवाल
इस बीच, गुवाहाटी स्थित कई समाचार चैनलों ने नागालैंड के मोन जिले सहित कुछ इलाकों में बड़े पैमाने पर कोयला, पत्थर और रेत खनन की गतिविधियों को पूर्वी असम में बाढ़ की गंभीरता से जोड़ते हुए रिपोर्टें प्रसारित की हैं। इन रिपोर्टों में नागा पहाड़ियों में जंगलों के क्षरण और खनन गतिविधियों के कारण जमीन की पानी सोखने की क्षमता प्रभावित होने की आशंका जताई गई है।
कुछ पत्रकारों ने आपदा के दौरान नागा पहाड़ियों का दौरा कर लगातार बारिश के बाद ऊंचाई वाले क्षेत्रों की स्थिति सामने रखी। उनके अनुसार नागालैंड के मोन, मोकोकचुंग और लोंगलेन्ग जिलों में कई घंटों तक भारी बारिश हुई। हालांकि भारत मौसम विज्ञान विभाग ने इसे बादल फटने की घटना नहीं माना। भारी बारिश के बाद असम की निचली नदियों—दिखो, दारिका, जांजी और भोगदोई आदि—का जलस्तर तेजी से बढ़ा और व्यापक तबाही हुई। स्थानीय लोगों का कहना था कि उन्होंने अपने जीवनकाल में ऐसी भयावह बाढ़ नहीं देखी।
नागालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो, जिनके पास भूविज्ञान एवं खनन विभाग भी है, राज्य में अनियंत्रित खनन को लेकर चिंता जताते रहे हैं। उन्होंने नागालैंड विधानसभा में भी अवैध कोयला खनन का मुद्दा उठाया है। हालांकि राज्य में भूमि स्वामित्व की विशिष्ट व्यवस्था के कारण खनन गतिविधियों को नियंत्रित करना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है।
संविधान के अनुच्छेद 371(ए) के तहत नागालैंड में भूमि और उसके संसाधनों से जुड़े मामलों में स्थानीय समुदायों के पारंपरिक अधिकारों और प्रथाओं को विशेष संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। इसी व्यवस्था के बीच कई स्थानों पर निजी या सामुदायिक भूमि पर ओपन-कास्ट अथवा रैट-होल कोयला खनन की गतिविधियां होती रही हैं। आधिकारिक तौर पर वोखा, मोकोकचुंग, लोंगलेन्ग, तुएनसांग और मोन जिलों में 50 से अधिक लाइसेंसधारी ऑपरेटर कोयला खनन से जुड़े बताए जाते हैं, जबकि अनौपचारिक रूप से खनन करने वालों की संख्या इससे कहीं अधिक होने की आशंका है।
असम में भी पहले उठ चुके हैं अवैध खनन के मुद्दे
यह समस्या असम सरकार के लिए भी नई नहीं है। कांग्रेस विधायक देबब्रत सैकिया ने कई बार दिखो नदी में कथित रूप से अनियंत्रित पत्थर और रेत खनन का मुद्दा उठाया है। राज्य विधानसभा में विपक्ष के पूर्व नेता सैकिया ने विभिन्न सत्रों में नदी तल से बड़े पैमाने पर पत्थर और रेत निकाले जाने पर सवाल खड़े किए थे।
गौहाटी हाई कोर्ट ने 21 अक्टूबर 2019 को असम सरकार को एक समर्पित ‘माइन्स एंड मिनरल्स टास्क फोर्स बटालियन’ तथा नदी संरक्षण के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित करने का निर्देश दिया था। इसके बावजूद नदी तल पर कथित अवैध खनन को प्रभावी ढंग से रोकने को लेकर सवाल बने रहे। नजीरा विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले सैकिया ने राज्य के पर्यावरण एवं वन विभाग को भी नदी किनारे खनन गतिविधियों के संभावित दुष्प्रभावों को लेकर पत्र लिखे थे।
असम के संगठन ‘असम सम्मिलित महासंघ’ ने भी असम-नागालैंड सीमा पर कोयला, पत्थर और रेत खनन को रोकने में वर्षों से बरती गई कथित लापरवाही के लिए प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया है। संगठन का दावा है कि इन गतिविधियों ने शिवसागर और चराइदेव जिलों में बाढ़ की गंभीरता बढ़ाने में भूमिका निभाई।
महासंघ के नेता मतिउर रहमान के अनुसार, दिखो नदी नागालैंड की नारुतो पहाड़ियों से निकलकर असम में प्रवेश करती है और आगे ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है। उनका कहना है कि नदी के उद्गम और ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में लगातार होने वाला पर्यावरणीय क्षरण अंततः असम के मैदानी इलाकों को प्रभावित करता है।
कई नदी और पर्यावरण विशेषज्ञों ने भी यह आशंका जताई है कि नागा पहाड़ियों में अवैज्ञानिक खनन और वनों के क्षरण से भारी बारिश के दौरान मिट्टी तथा गाद के साथ पानी का बहाव तेजी से नीचे आता है। ऐसे में असम की हालिया बाढ़ ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या केवल अत्यधिक बारिश को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त है, या फिर ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में खनन, वनों की कटाई और नदी तंत्र में मानवीय हस्तक्षेप की भी व्यापक वैज्ञानिक समीक्षा की जरूरत है।
लेखक गुवाहाटी स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं।


