जब PCI में पत्रकार ही नहीं, तो उसकी प्रासंगिकता क्या?

जब PCI में पत्रकार ही नहीं, तो उसकी प्रासंगिकता क्या?
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नव ठाकुरिया
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) में 13 कार्यरत पत्रकारों के पद अब भी खाली हैं। जानिए PCI की भूमिका, प्रतिनिधित्व के विवाद और बदलते मीडिया परिदृश्य में इसकी प्रासंगिकता।

 

कई महीनों की अनिश्चितता के बाद प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) को उसका चेयरमैन तो मिल गया है, लेकिन 13 कार्यरत पत्रकारों—एडिटर और नॉन-एडिटर दोनों श्रेणियों—के पद अब भी खाली हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब देश की सर्वोच्च प्रेस नियामक संस्था में ही पर्याप्त संख्या में कामकाजी पत्रकार नहीं हैं, तो उसकी प्रासंगिकता क्या रह जाती है?

PCI एक वैधानिक, अर्ध-न्यायिक और स्वतंत्र संस्था है। इसका गठन पहली बार 1966 में प्रेस काउंसिल एक्ट, 1965 के तहत हुआ था। बाद में प्रेस काउंसिल एक्ट, 1978 के तहत 1979 में इसे फिर से स्थापित किया गया। इसका उद्देश्य भारत में समाचार पत्रों और समाचार एजेंसियों के मानकों को बनाए रखना और उनमें सुधार करना है।

जस्टिस रंजना प्रकाश देसाई ने 17 जून 2022 से 16 दिसंबर 2025 तक PCI चेयरमैन के रूप में कार्य किया। इसके बाद 24 अप्रैल 2026 को उन्होंने फिर से पद संभाला। सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत्त न्यायाधीश को तीन वर्ष के एक और कार्यकाल के लिए चेयरमैन नियुक्त किया गया है।

हालांकि, कार्यरत पत्रकारों का प्रतिनिधित्व करने वाली सीटें अब भी खाली हैं। PCI की 15वीं परिषद को पूरा करने के लिए सात सदस्य पेशेवर पत्रकारों की श्रेणी से और छह सदस्य एडिटरों की श्रेणी से चुने जाने बाकी हैं।

कुछ महीने पहले राज्यसभा सदस्य सस्मित पात्रा ने नई दिल्ली में केंद्र सरकार से PCI की मौजूदा परिषद को जल्द पूरा करने का आग्रह किया था। 10 फरवरी को राज्यसभा में बोलते हुए बीजू जनता दल के नेता ने कहा था कि 14वीं परिषद का कार्यकाल 5 अक्टूबर 2024 को समाप्त होने के बाद एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और जवाबदेह प्रेस के लिए पूर्ण परिषद का गठन जरूरी है।

पात्रा ने विशेष रूप से नए चेयरमैन की नियुक्ति पर जोर दिया था, क्योंकि PCI 17 दिसंबर से बिना प्रमुख के काम कर रही थी। इससे पहले केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने संसद को बताया था कि कार्यरत पत्रकारों की श्रेणी के सदस्यों के नामांकन की प्रक्रिया दिल्ली हाई कोर्ट में विचाराधीन थी।

फिलहाल PCI में डॉ. सुधांशु त्रिवेदी, बृज लाल, डॉ. संबित पात्रा, नरेश गणपत म्हस्के, काली चरण मुंडा, प्रो. अश्विनी के. महापात्रा, मनन कुमार मिश्रा, डॉ. के. श्रीनिवासराव, सुधीर कुमार पांडा, एम.वी. श्रेयम्स कुमार, गुरिंदर सिंह, अरुण कुमार त्रिपाठी, ब्रज मोहन शर्मा और आरती त्रिपाठी समेत विभिन्न संस्थाओं और संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हैं।

बार-बार आने वाली कानूनी और प्रशासनिक अड़चनों के बावजूद शेष सीटों को भरने की प्रक्रिया जारी है। 29 सदस्यों वाली PCI की 15वीं परिषद का कार्यकाल 4 अक्टूबर 2027 को समाप्त होगा। इसके बावजूद 13 सीटें अब तक खाली हैं। इनमें छह सीटें एडिटरों और सात सीटें समाचार पत्रों तथा समाचार एजेंसियों के अन्य कार्यरत पत्रकारों के लिए हैं।

यह विवाद तब गहराया जब कुछ राष्ट्रीय पत्रकार संगठनों ने PCI के नियमों में किए गए बदलावों का विरोध किया। इन बदलावों के तहत कार्यरत पत्रकारों के प्रतिनिधियों के चयन में राष्ट्रीय पत्रकार यूनियनों के बजाय अलग-अलग प्रेस क्लबों को भूमिका दी गई थी।

विरोध करने वाले संगठनों का तर्क है कि प्रेस क्लब मूल रूप से पत्रकारों के सामाजिक और पेशेवर मेल-जोल के लिए बने संगठन हैं और उनका दायरा आमतौर पर किसी शहर, कस्बे या क्षेत्र तक सीमित रहता है। कई प्रेस क्लब गैर-पत्रकारों—जैसे शिक्षाविदों, लेखकों, फिल्मी हस्तियों और राजनयिकों—को भी सदस्यता देते हैं। ऐसे में उनके सदस्य हर परिस्थिति में पेशेवर पत्रकारों के हितों का प्रभावी प्रतिनिधित्व कर पाएंगे, यह जरूरी नहीं है।

उनका कहना है कि कोई भी प्रेस क्लब, प्रेस गिल्ड या मीडिया क्लब पूरे देश के पत्रकार समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, भले ही उसके नाम में ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ क्यों न हो। इसके विपरीत, मान्यता प्राप्त पत्रकार यूनियनों में देश के विभिन्न हिस्सों से सदस्य शामिल होते हैं और वे अधिक व्यापक प्रतिनिधित्व प्रदान कर सकती हैं।

इंडियन जर्नलिस्ट्स यूनियन और ऑल इंडिया वर्किंग न्यूज कैमरामैन एसोसिएशन ने भी मीडिया पेशेवरों के प्रतिनिधित्व और उनके अधिकारों के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया है।

जब PCI कई महीनों तक बिना चेयरमैन के रही—जो उसके इतिहास में अभूतपूर्व स्थिति थी—तब यह सवाल भी उठा कि देश के विशाल प्रिंट मीडिया क्षेत्र की निगरानी कौन कर रहा था। रजिस्ट्रार ऑफ न्यूजपेपर्स फॉर इंडिया के अनुसार देश में एक लाख से अधिक पंजीकृत प्रकाशन हैं, जो विभिन्न भाषाओं और अलग-अलग अंतराल पर प्रकाशित होते हैं।

PCI को समाचार पत्रों, समाचार एजेंसियों, संपादकों और कार्यरत पत्रकारों के खिलाफ पेशेवर कदाचार से जुड़ी शिकायतों पर विचार करने का अधिकार है। हालांकि, नियमों के उल्लंघन के मामलों में उसके पास दंडात्मक कार्रवाई करने की शक्ति सीमित है।

देश के विशाल प्रिंट मीडिया के अलावा भारत में सैकड़ों सैटेलाइट न्यूज चैनल, लाखों डिजिटल पोर्टल और सोशल मीडिया आधारित समाचार मंच भी सक्रिय हैं। लेकिन इनमें से अधिकांश PCI के मौजूदा अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। तकनीक आधारित आधुनिक समाचार माध्यमों का बड़ा हिस्सा भी इसकी निगरानी के दायरे में नहीं आता।

PCI को प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा करने और सरकारों के अनुचित व्यवहार पर सवाल उठाने की भूमिका हासिल है। ऐसे में अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि न्यूज चैनलों, रेडियो और डिजिटल समाचार मंचों को भी किसी उपयुक्त व्यवस्था के तहत इसके दायरे में लाया जाए।

सवाल यही है कि क्या भारतीय मीडिया जल्द एक ऐसी PCI की उम्मीद कर सकता है, जो पूरी तरह गठित हो, व्यापक प्रतिनिधित्व रखती हो और बदलते मीडिया परिदृश्य के अनुरूप अधिक अधिकारों के साथ प्रभावी ढंग से काम कर सके?

लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया मामलों पर स्तंभकार हैं।

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