60 साल बाद Tamil Nadu सरकार में Congress की वापसी: राजनीतिक योग्यता, मजबूरी या किस्मत का खेल?

60 साल बाद Tamil Nadu सरकार में Congress की वापसी: राजनीतिक योग्यता, मजबूरी या किस्मत का खेल?
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by Ashis Sinha

करीब 60 साल बाद कांग्रेस तमिलनाडु सरकार में शामिल हुई है। पार्टी ने DMK गठबंधन छोड़कर विजय की TVK सरकार का समर्थन किया और मंत्री पद हासिल किए। राहुल गांधी के नारे को लेकर शपथ समारोह में विवाद भी खड़ा हो गया। 

Congress has returned to the Tamil Nadu government after nearly 60 years by joining Joseph Vijay’s TVK-led coalition after ditching its long-time DMK alliance. The move has triggered debate over whether Congress’ comeback is political merit, strategic survival, or pure luck.

 

 

करीब छह दशक बाद तमिलनाडु की सत्ता में कांग्रेस की वापसी ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। कांग्रेस इसे अपनी “ऐतिहासिक वापसी” बता रही है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि यह वापसी पार्टी की ज़मीनी ताकत से ज्यादा बदले हुए राजनीतिक समीकरणों, गठबंधन की मजबूरियों और सही समय पर लिए गए फैसलों का परिणाम है।

विवाद तब और बढ़ गया जब कांग्रेस विधायक एस. राजेश कुमार ने शपथ ग्रहण समारोह के दौरान Rahul Gandhi के समर्थन में नारे लगाए। इसके बाद यह सवाल और तेज हो गया कि क्या कांग्रेस वास्तव में तमिलनाडु में फिर से मजबूत हो रही है या सिर्फ राजनीतिक परिस्थितियों का फायदा उठा रही है।

1967 के बाद पहली बार सरकार में कांग्रेस

तमिलनाडु में 1967 के बाद पहली बार कांग्रेस औपचारिक रूप से राज्य सरकार का हिस्सा बनी है। पार्टी ने अभिनेता से नेता बने Joseph Vijay की पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होकर सत्ता में वापसी की।

कांग्रेस के पास विधानसभा में केवल पांच विधायक हैं, लेकिन इसके बावजूद पार्टी को मंत्रिमंडल में जगह मिली। कांग्रेस विधायक दल के नेता एस. राजेश कुमार समेत दो कांग्रेस विधायकों को कैबिनेट में शामिल किया गया।

यह वही कांग्रेस है जिसने कभी K. Kamaraj जैसे बड़े नेता दिए थे और तमिलनाडु की राजनीति पर लंबे समय तक राज किया था। लेकिन द्रविड़ राजनीति के उभार के बाद कांग्रेस धीरे-धीरे सत्ता से बाहर होती चली गई।

सरकार में किसे कितनी हिस्सेदारी?

तमिलनाडु में इस बार चुनाव के बाद किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। ऐसे में विजय की TVK को सहयोगियों की जरूरत पड़ी।

मौजूदा गठबंधन में कौन-कौन?

फिलहाल सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल हैं:

  • Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) – मुख्य दल और मुख्यमंत्री पद
  • Indian National Congress – सहयोगी दल
  • बाहर से समर्थन या संभावित भागीदारी की चर्चा:
    • Viduthalai Chiruthaigal Katchi (VCK)
    • Indian Union Muslim League (IUML)

मंत्रिमंडल में सीट शेयरिंग

मुख्यमंत्री विजय ने 10 मई को 9 मंत्रियों के साथ शपथ ली थी। बाद में हुए विस्तार में:

  • TVK के 21 विधायकों को मंत्री बनाया गया
  • कांग्रेस के 2 विधायकों को कैबिनेट में जगह मिली

यानी सरकार में असली नियंत्रण TVK के पास ही है, जबकि कांग्रेस को प्रतीकात्मक लेकिन राजनीतिक रूप से अहम हिस्सेदारी मिली है।

कांग्रेस ने DMK का साथ छोड़ा

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक पहलू यह है कि कांग्रेस ने अपने पुराने सहयोगी Dravida Munnetra Kazhagam (DMK) का साथ छोड़ दिया।

करीब दो दशकों तक कांग्रेस, DMK की सहयोगी रही। लोकसभा से लेकर विधानसभा तक दोनों दल साथ चुनाव लड़ते रहे। लेकिन इतनी लंबी साझेदारी के बावजूद कांग्रेस को कभी DMK सरकार में मंत्री पद नहीं मिला।

इस बार जैसे ही चुनाव में त्रिशंकु स्थिति बनी और विजय की TVK बहुमत से पीछे रह गई, कांग्रेस ने तेजी से राजनीतिक पाला बदल लिया और विजय को समर्थन दे दिया।

राजनीतिक विरोधियों का आरोप है कि कांग्रेस ने सत्ता में हिस्सेदारी पाने के लिए DMK को “डिच” कर दिया। आलोचकों का कहना है कि यह कदम कांग्रेस की वैचारिक राजनीति से ज्यादा उसकी राजनीतिक मजबूरी और अस्तित्व बचाने की रणनीति को दिखाता है।

हालांकि कांग्रेस समर्थकों का कहना है कि राजनीति में स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होते और पार्टी ने अपने भविष्य को देखते हुए व्यावहारिक फैसला लिया।

राहुल गांधी के नारे पर विवाद

शपथ ग्रहण समारोह के दौरान विवाद तब खड़ा हुआ जब कांग्रेस विधायक एस. राजेश कुमार ने आधिकारिक शपथ के बीच राजनीतिक नारे लगाने शुरू कर दिए।

उन्होंने कहा:
“कामराज अमर रहें, भारत रत्न राजीव गांधी अमर रहें, जननेता राहुल गांधी अमर रहें।”

इस पर तमिलनाडु के राज्यपाल Rajendra Viswanath Arlekar ने मुस्कुराते हुए कहा कि यह “शपथ का हिस्सा नहीं है।”

यह वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया। कांग्रेस समर्थकों ने इसे भावनात्मक राजनीतिक अभिव्यक्ति बताया, जबकि विरोधियों ने इसे संवैधानिक मर्यादा के खिलाफ करार दिया।

क्या यह कांग्रेस की राजनीतिक योग्यता है?

कांग्रेस इस वापसी को अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता का प्रमाण बता रही है।

इसके पीछे कुछ तर्क दिए जा रहे हैं:

सही समय पर फैसला

कांग्रेस उन शुरुआती दलों में थी जिसने चुनाव परिणाम आने के तुरंत बाद विजय को समर्थन दिया। इससे वह सरकार गठन में अहम साझेदार बन गई।

कामराज की विरासत

तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में आज भी कांग्रेस को कामराज युग की राजनीति और विकास मॉडल के कारण भावनात्मक समर्थन मिलता है।

राष्ट्रीय स्तर की पहचान

कांग्रेस भले राज्य में कमजोर हो, लेकिन राष्ट्रीय पार्टी होने का फायदा उसे गठबंधन राजनीति में मिलता है।

या फिर यह सिर्फ राजनीतिक किस्मत?

दूसरी तरफ कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस की यह वापसी असली जनाधार से ज्यादा राजनीतिक परिस्थितियों का परिणाम है।

केवल 5 सीटें

कांग्रेस के पास विधानसभा में सिर्फ पांच विधायक हैं। पार्टी के पक्ष में कोई बड़ी जनलहर भी नहीं दिखी।

त्रिशंकु विधानसभा का फायदा

अगर TVK को स्पष्ट बहुमत मिल जाता, तो शायद कांग्रेस को इतनी अहमियत नहीं मिलती।

गठबंधन पर निर्भर राजनीति

आज की कांग्रेस तमिलनाडु में अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं है। उसकी राजनीति मुख्यतः गठबंधनों पर टिकी हुई है।

विडंबना यह भी है कि DMK के साथ वर्षों तक रहने पर भी कांग्रेस को सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मिली, लेकिन जैसे ही उसने गठबंधन बदला, उसे मंत्री पद मिल गया।

विजय की सबसे बड़ी चुनौती

मुख्यमंत्री विजय फिलहाल गठबंधन संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। TVK सरकार में पूरी तरह हावी है, लेकिन आने वाले समय में VCK और IUML जैसे सहयोगी भी हिस्सेदारी की मांग कर सकते हैं।

ऐसे में विजय के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी— गठबंधन को स्थिर रखना और सत्ता संतुलन बनाए रखना।

निष्कर्ष

तमिलनाडु सरकार में 60 साल बाद कांग्रेस की वापसी निश्चित रूप से ऐतिहासिक है, लेकिन यह वापसी कई राजनीतिक सवाल भी खड़े करती है।

यह न तो पूरी तरह कांग्रेस की ताकत का परिणाम है और न ही केवल किस्मत का खेल। इसमें राजनीतिक अवसरवाद, गठबंधन की मजबूरी, बदले हुए समीकरण और सही समय पर लिया गया फैसला— सब कुछ शामिल है।

कांग्रेस ने DMK का साथ छोड़कर विजय के साथ नई राजनीतिक पारी शुरू की है। अब देखना होगा कि यह फैसला पार्टी के लिए लंबे समय की वापसी साबित होता है या सिर्फ सत्ता में बने रहने की एक अस्थायी रणनीति।

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