F. S. Growse (एफ. एस. ग्राउस )की अद्भुत साधना: ‘श्रीरामचरितमानस’ (Shri Ramcharitmanas ) के प्रथम अंग्रेज़ी अनुवादक
वरुण कुमार, लेखक एवं कवि
Discover the remarkable story of F. S. Growse (Frederic Salmon Growse) , the British scholar who first translated Shri Ramcharitmanas into English (Growse titled his English rendition “The Ramayana of Tulsi Das”) and became a lifelong admirer of Indian culture, Hindi, and Sanatan philosophy.
भारतीय संस्कृति और साहित्य के इतिहास में 17 मई का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण और भावुक स्मरण दिवस है। यह वह तिथि है, जब फ्रेडरिक साल्मन ग्राउस (F. S. Growse) जैसे विलक्षण और कालजयी अंग्रेज़ विद्वान की पुण्यतिथि आती है। ग्राउस ऐसे अद्भुत मनीषी थे, जिन्होंने विदेशी और औपनिवेशिक पृष्ठभूमि से होने के बावजूद भारतीय संस्कृति, दर्शन और अध्यात्म को न केवल समझा, बल्कि उसे अपने जीवन का अभिन्न अंग बना लिया। गोस्वामी तुलसीदास कृत ‘श्रीरामचरितमानस’ (Shri Ramcharitmanas) का अंग्रेज़ी में प्रथम अनुवाद कर उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा, सनातन जीवन मूल्यों और रामकथा के वैश्विक संदेश को विश्व मंच तक पहुँचाने का ऐतिहासिक एवं युगांतरकारी कार्य किया।
जन्म, शिक्षा और भारत आगमन
एफ. एस. ग्राउस का जन्म 1836 ई. में इंग्लैंड के सफ़ोक काउंटी में इप्सविच के निकट विल्डेस्ट नामक स्थान पर हुआ था। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि और भाषाओं के प्रति अत्यंत संवेदनशील थे। उनकी उच्च शिक्षा ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित ओरियल और क्वीन्स कॉलेज में हुई, जहाँ उन्होंने अपनी विद्वता की गहरी छाप छोड़ी।
उच्च शिक्षा पूर्ण करने के बाद वर्ष 1860 में उनका चयन तत्कालीन प्रतिष्ठित बंगाल सिविल सेवा (ICS) में हुआ। अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में अधिकांश अंग्रेज़ अधिकारी भारत को केवल एक उपनिवेश, एक बाज़ार या शासन करने के क्षेत्र के रूप में देखते थे। ग्राउस भी प्रारंभ में एक सामान्य प्रशासनिक अधिकारी की तरह भारत आए थे, किंतु भारत की पावन भूमि पर कदम रखते ही यहाँ की समृद्ध संस्कृति, प्राचीन साहित्य, अध्यात्म और लोकजीवन ने शीघ्र ही उनके अंतर्मन को अपनी ओर आकर्षित कर लिया।
1861 में उन्हें ‘एशियाटिक सोसायटी’ का सदस्य बनाया गया। इस संस्था के संपर्क में आने के बाद भारतीय इतिहास, धर्मग्रंथों, प्राच्य विद्या और स्थानीय भाषाओं के प्रति उनका अनुराग और अधिक गहराता चला गया।
कार्यक्षेत्र और ब्रज संस्कृति से अगाध प्रेम
ग्राउस का कार्यक्षेत्र मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश का पश्चिमोत्तर क्षेत्र रहा, जिसमें आगरा, मथुरा और मैनपुरी जैसे ऐतिहासिक जिले शामिल थे। इन क्षेत्रों में प्रशासनिक दायित्वों का निर्वहन करते हुए उन्होंने भारतीय कला, स्थापत्य, लोक संस्कृति और पुरातत्व का अत्यंत गहन अध्ययन किया। विशेष रूप से भगवान श्रीकृष्ण की क्रीड़ास्थली ब्रजभूमि (मथुरा) की संस्कृति से वे आत्मिक रूप से जुड़ गए।
मथुरा में कलेक्टर के पद पर रहते हुए उन्होंने वहाँ के प्राचीन मंदिरों, घाटों और ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण में अद्वितीय रुचि ली। उन्होंने मथुरा के इतिहास और पुरातत्व पर कई शोधपूर्ण लेख लिखे, जो बाद में “Mathura: A District Memoir” नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुए। इस ग्रंथ को आज भी ब्रज की संस्कृति, कला, इतिहास और भूगोल का अत्यंत प्रामाणिक एवं महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है।
ग्राउस ने तत्कालीन ब्रिटिश सरकार की नीतियों के विपरीत जाकर मथुरा की स्थानीय स्थापत्य कला और सांस्कृतिक धरोहरों को बढ़ावा दिया, जिसके कारण उन्हें कई बार सरकारी नाराज़गी का सामना भी करना पड़ा।
हिंदी और जनभाषा का सशक्त समर्थन
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में तत्कालीन अंग्रेज़ी शासन न्यायालयों, कचहरियों और प्रशासनिक कार्यों में उर्दू-फ़ारसी मिश्रित भाषा (हिंदुस्तानी) को बढ़ावा दे रहा था। आम जनता की भाषा हिंदी को हाशिए पर धकेलने के प्रयास किए जा रहे थे। ऐसे संक्रमणकाल में ग्राउस ने हिंदी की शुद्धता, उसकी साहित्यिक महत्ता और उसकी स्वतंत्र पहचान का पुरज़ोर समर्थन किया।
उनका स्पष्ट मानना था कि हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारत की जनभाषा और भारतीय आत्मा की सच्ची अभिव्यक्ति है। उन्होंने अपने प्रशासनिक कार्यों में भी हिंदी को वरीयता देने का प्रयास किया।
एक विदेशी अधिकारी द्वारा हिंदी के प्रति ऐसा अनन्य प्रेम देखकर तत्कालीन भारतीय विद्वान और हिंदी साहित्यकार चकित थे। आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि पंडित श्रीधर पाठक ने ग्राउस की बहुआयामी प्रतिभा और साहित्य-प्रेम की प्रशंसा में लिखा था—
“अंगरेजी अरु फरासीस भाषा कौ पंडित,
संस्कृत हिन्दी रसिक विविध विद्यागुण मंडित।”
‘श्रीरामचरितमानस’ का प्रथम अंग्रेज़ी अनुवाद : एक युगांतरकारी घटना
एफ. एस. ग्राउस के जीवन का सबसे महान, अमर और ऐतिहासिक कार्य गोस्वामी तुलसीदास रचित ‘श्रीरामचरितमानस’ का अंग्रेज़ी में अनुवाद करना था। तुलसीदास की अवधी भाषा, उसके मुहावरों, भारतीय दर्शन, भक्ति के गूढ़ सिद्धांतों और लोक चेतना को किसी विदेशी भाषा में अनूदित करना अत्यंत दुरूह और लगभग असंभव कार्य था, किंतु ग्राउस ने इसे अपनी साधना बना लिया।
उन्होंने केवल शब्दों का भाषांतरण नहीं किया, बल्कि तुलसीदास की मूल भावधारा, रामकथा की अंतर्निहित भक्ति, दार्शनिक गहराई और काव्यात्मक सौंदर्य को अंग्रेज़ी भाषा में यथासंभव सुरक्षित रखने का भगीरथ प्रयास किया।
इस महान परियोजना की रूपरेखा और प्रस्तावना वर्ष 1876 में प्रकाशित हुई। इसके बाद 1877 में बालकांड का प्रथम भाग सरकारी प्रेस से प्रकाशित हुआ। ग्राउस की निरंतर साधना के फलस्वरूप वर्ष 1880 तक संपूर्ण ‘श्रीरामचरितमानस’ का अंग्रेज़ी अनुवाद पुस्तक के रूप में प्रकाशित हो चुका था।
यह अनुवाद वैश्विक स्तर पर और भारत के प्रबुद्ध वर्ग में इतना लोकप्रिय हुआ कि शीघ्र ही इसके अनेक संस्करण प्रकाशित होने लगे। उस दौर में, जब पुस्तकों का मूल्य अत्यंत कम हुआ करता था, तब इस विशाल ग्रंथ का तीन रुपये मूल्य वाला संस्करण भी हाथों-हाथ बिक गया, जो इसकी लोकप्रियता और स्वीकार्यता का प्रमाण था।
अनुवाद की अनूठी शैली और विशेषताएँ
ग्राउस के इस अनुवाद की सबसे अनूठी विशेषता यह थी कि उन्होंने बालकांड का अनुवाद पूर्णतः पद्य शैली में किया, जबकि ग्रंथ के शेष भागों—अयोध्याकांड से लेकर उत्तरकांड तक—को गद्य शैली में प्रस्तुत किया।
बालकांड को काव्यात्मक रूप देने के पीछे उनका उद्देश्य अंग्रेज़ी पाठकों को भारतीय काव्य परंपरा, छंद-विधान और अवधी कविता के गेय प्रवाह से परिचित कराना था। वहीं शेष भागों में गद्य का उपयोग इसलिए किया गया ताकि रामकथा के दार्शनिक संवादों, नीतिगत प्रसंगों और भक्ति के सिद्धांतों को पश्चिमी पाठक अधिक स्पष्टता और सहजता से समझ सकें।
वास्तव में, ग्राउस ने इस अनुवाद के माध्यम से पश्चिमी जगत के सामने प्रचलित उस भ्रांति को तोड़ा कि भारत केवल रूढ़ियों का देश है। उन्होंने सिद्ध किया कि भारतीय अध्यात्म और काव्य-संसार विश्व के किसी भी महान साहित्य से कम नहीं, बल्कि अनेक दृष्टियों से अधिक समृद्ध और मानवीय है।
अंतिम दिन और महाप्रयाण
लगातार कठिन परिश्रम, यात्राओं और मानसिक श्रम के कारण ग्राउस का स्वास्थ्य धीरे-धीरे बिगड़ने लगा। वे अपने जीवन के उत्तरार्ध में लंबे समय तक क्षयरोग (टीबी) से पीड़ित रहे। शारीरिक कष्ट के बावजूद उनकी साहित्य-साधना कभी नहीं रुकी। वे अस्वस्थता की अवस्था में भी निरंतर अध्ययन और लेखन करते रहे।
अंततः वर्ष 1891 में उन्होंने अपनी सरकारी सेवा से पूर्ण अवकाश लिया और इंग्लैंड लौट गए, जहाँ वे सर्रे में निवास करने लगे। वहीं 17 मई 1893 को इस महान भारतीय संस्कृति-प्रेमी और मानस मर्मज्ञ का निधन हो गया।
भले ही उनका पार्थिव शरीर इंग्लैंड की धरती में विलीन हुआ, किंतु उनका सूक्ष्म मन और उनकी कीर्ति सदैव के लिए भारतभूमि, विशेषकर ब्रज और अवध के कण-कण में समाहित हो गई। हिंदी साहित्य जगत ने उन्हें कभी ‘विदेशी’ नहीं माना, बल्कि अपने ही परिवार का एक सम्मानित सदस्य समझा।
उनके निधन का समाचार जब भारत पहुँचा, तो साहित्य जगत शोकाकुल हो उठा। पंडित श्रीधर पाठक ने अत्यंत भावुक शब्दों में उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा—
“हाय गुरु, साहब ठाकुरजी मानन वारे,
कहाँ गये तजि हमें, हमारे परम पियारे।”
आज के समय में ग्राउस की प्रासंगिकता
आज 21वीं सदी में, जब भारतीय संस्कृति, योग, अध्यात्म और सनातन जीवन-मूल्य वैश्विक स्तर पर नई पहचान बना रहे हैं, तब एफ. एस. ग्राउस का योगदान और भी अधिक प्रासंगिक एवं प्रेरणादायी प्रतीत होता है।
ग्राउस का जीवन इस सत्य का जीवंत प्रमाण है कि संस्कृति, ज्ञान और ईश्वर के प्रति सच्चे प्रेम की कोई भौगोलिक या राष्ट्रीय सीमा नहीं होती। भाषा, देश, रंग और जाति की संकीर्ण दीवारों से ऊपर उठकर यदि कोई व्यक्ति किसी अन्य सभ्यता की परंपरा और ज्ञान से निष्कपट प्रेम करता है, तो वह उसका श्रेष्ठतम साधक बन जाता है।
फ्रेडरिक साल्मन ग्राउस ने पूर्व और पश्चिम के बीच एक ऐसे सुदृढ़ वैचारिक और सांस्कृतिक सेतु का निर्माण किया, जिस पर चलकर आज भी वैश्विक समाज भारतीय अध्यात्म के आलोक से आलोकित हो रहा है। ‘श्रीरामचरितमानस’ के इस प्रथम अंग्रेज़ी अनुवादक की साधना को कोटि-कोटि नमन।


