हाल ही में शहर के एक प्रतिष्ठित निजी विद्यालय की कैंटीन पर हुई विवादास्पद छापेमारी ने इस पूरे मामले को और हवा दे दी है। राज्य के एजुकेशनल हब के रूप में पहचान रखने वाले बोकारो की शैक्षणिक साख पर इसे सीधा हमला माना जा रहा है। शिक्षाविद इस मुद्दे पर गोलबंद होते दिख रहे हैं। उनका कहना है कि जानबूझकर निजी स्कूलों को ‘सॉफ्ट टारगेट’ बनाया जा रहा है।
शिक्षाविदों की नाराज़गी—‘टॉपर्स की सूची देख लीजिए’
शिक्षाविद निजी स्कूलों के खिलाफ कथित साज़िशों की एक स्वर में कड़ी निंदा कर रहे हैं। सेक्टर-5 स्थित एक बड़े स्कूल के प्राचार्य ने कहा कि यदि टॉपर्स की सूची देखी जाए, तो अधिकतर मेधावी छात्र इन्हीं “निशाने पर रहने वाले” निजी स्कूलों से निकलते हैं, जिन्होंने बिना किसी बाहरी सहायता के बोकारो को शिक्षा का प्रमुख केंद्र बनाया।
धनबाद की एक नामचीन विद्यालय की प्राचार्या ने भी नाराज़गी जताते हुए कहा कि झारखंड में जो कुछ हो रहा है, वह समझ से परे है—आखिर कौन और क्यों निजी स्कूलों को निशाना बना रहा है?
एक अन्य शिक्षाविद ने इसे प्रशासन का “पुअर शो” बताते हुए कहा कि इस तरह की कार्रवाई अधिकारियों की अपरिपक्वता दर्शाती है। प्रशासन को अपने निर्णयों में पारदर्शिता और तार्किकता बनाए रखनी चाहिए।
ब्यूरोक्रेटिक और राजनीतिक दबाव नया नहीं
शिक्षाविदों का कहना है कि किताबों और ड्रेस के मुद्दों की आड़ में कुछ तथाकथित प्रतिनिधि लंबे समय से स्कूलों पर दबाव बनाते रहे हैं। एडमिशन सीजन के दौरान ब्यूरोक्रेटिक और राजनीतिक हस्तक्षेप कोई नई बात नहीं है, लेकिन “गुप्त कार्रवाई” के नाम पर दमन की सीमा पार करना बेहद चिंताजनक है।
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि आज इस तरह के अन्याय पर चुप्पी साध ली गई, तो कल हर शैक्षणिक संस्थान किसी न किसी प्रभावशाली व्यक्ति की साज़िश का शिकार हो सकता है। बोकारो की शैक्षणिक गरिमा बचाने के लिए प्रशासनिक संवेदनशीलता और पारदर्शिता बेहद जरूरी है।
‘मेज़बान’ से अचानक ‘निशाना’ बनने का सवाल
हाल ही में जिस स्कूल की कैंटीन को आनन-फानन में सील किया गया और 33 घंटे के भीतर खोल भी दिया गया, वह कुछ ही महीने पहले फूड सेफ्टी क्लीयरेंस प्राप्त कर चुकी थी।
चर्चा इस बात को लेकर है कि जिस कैंटीन ने 14 नवंबर 2025 को राज्यपाल Santosh Kumar Gangwar के दौरे के दौरान उनके भोजन की जिम्मेदारी संभाली थी, वह अचानक कुछ ही महीनों में असुरक्षित कैसे घोषित हो गई?
यह भी सवाल उठ रहा है कि जिस अधिकारी के निर्देश पर कार्रवाई हुई, उनके बच्चे भी उसी कैंटीन में भोजन करते थे और अब तक कोई समस्या सामने नहीं आई। इस पूरे घटनाक्रम में विरोधाभास साफ नजर आता है।
“राष्ट्र-निर्माण के आधारस्तंभ हैं विद्यालय, खुंदक निकालने का जरिया नहीं” — विकास कुमार

झारखंड-बिहार के प्रसिद्ध करियर काउंसलर और वरिष्ठ शिक्षाविद Vikas Kumar ने भी इस पूरे मामले पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि बोकारो की पहचान बनाने में बीएसएल (बोकारो इस्पात संयंत्र) के बाद सबसे बड़ा योगदान यहां के स्कूलों का है।
उन्होंने कहा कि स्कूलों पर अनावश्यक दबाव डालना न केवल शहर की पहचान को कमजोर करता है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था को भी गंभीर नुकसान पहुंचाता है। निजी विद्यालय किसी के निजी स्वार्थ या राजनीतिक एजेंडा का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं।
उन्होंने यह भी आशंका जताई कि सुनियोजित तरीके से एक सिंडिकेट इन संस्थानों को निशाना बना रहा है, जो राज्य की शैक्षणिक समृद्धि के लिए बड़ा खतरा है।
सोशल मीडिया बना ‘प्रोपेगेंडा’ का हथियार
शिक्षाविदों का कहना है कि इस पूरे विवाद को सोशल मीडिया की बेलगाम गतिविधियों ने और भड़काया है। विभिन्न प्लेटफॉर्म और निजी पेजों के जरिए भ्रामक सूचनाएं फैलाई जा रही हैं।
ऐसे लोग, जिनके निजी हित पूरे नहीं हो पाए, वे अब सोशल मीडिया का इस्तेमाल अपनी नाराज़गी निकालने के लिए कर रहे हैं। बिना तथ्यों की जांच के भड़काऊ पोस्ट और सनसनीखेज दावे न केवल संस्थानों की छवि खराब कर रहे हैं, बल्कि समाज में भी वैमनस्य पैदा कर रहे हैं।
शिक्षा जगत का मानना है कि यह “डिजिटल प्रोपेगेंडा” जनता के विश्वास को कमजोर करने का एक खतरनाक प्रयास है, जो अंततः पूरे शहर की गरिमा को नुकसान पहुंचा सकता है।