Trump की नीतियों के बीच पीएम मोदी (PM Modi) भारत (India) के लिए नए आर्थिक और रणनीतिक विकल्प तैयार कर रहे हैं। जानिए भारत की बदलती विदेश नीति और वैश्विक साझेदारियों की रणनीति।
US के President डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) की नीतियों में बढ़ती अनिश्चितता के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) भारत (India) के लिए नए आर्थिक और रणनीतिक विकल्प तैयार करने में जुटे हैं। द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, भारत अमेरिका पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए यूरोप, एशिया और दुनिया के दूसरे अहम देशों के साथ रिश्तों को तेजी से मजबूत कर रहा है।
रिपोर्ट का शीर्षक है “Modi Is Hedging Against Trump, One Deal at a Time”। रिपोर्ट के मुताबिक, मोदी सरकार की विदेश नीति में अब सिर्फ राजनीतिक रिश्तों के बजाय ठोस आर्थिक और रणनीतिक समझौतों पर ज्यादा जोर दिखाई दे रहा है। रक्षा, तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज, विनिर्माण और व्यापार जैसे क्षेत्रों में भारत नए साझेदार तलाश रहा है।
Modi corre o mundo e blinda a Índia em relação a Trump. Matéria no New York Times. pic.twitter.com/mfOrgPuN7m
— Dawisson Belém Lopes (@dbelemlopes) August 30, 2026
अमेरिका से रिश्ते अहम, लेकिन विकल्प भी जरूरी
भारत और अमेरिका के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में काफी मजबूत हुए हैं, लेकिन ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में व्यापार और रणनीतिक मुद्दों को लेकर नई चुनौतियां सामने आई हैं। अमेरिकी टैरिफ, भारत के रूस से तेल खरीदने पर दबाव और भारत-पाकिस्तान संघर्ष को लेकर ट्रंप के बयानों ने दोनों देशों के रिश्तों में असहजता बढ़ाई है।
ऐसे माहौल में नई दिल्ली का रुख यह दिखाता है कि भारत अमेरिका के साथ संबंध खत्म करने के बजाय विकल्पों का दायरा बढ़ाना चाहता है। यानी वाशिंगटन महत्वपूर्ण साझेदार बना रहे, लेकिन भारत किसी एक देश पर जरूरत से ज्यादा निर्भर न हो।
यूरोप और एशिया पर बढ़ा फोकस
इसी रणनीति के तहत भारत ने यूरोप और एशिया के कई देशों के साथ अपने संबंधों को नई गति दी है। यूरोपीय संघ के साथ लंबे समय से लंबित व्यापार समझौता इसका बड़ा उदाहरण है। इसके अलावा फ्रांस के साथ रक्षा, तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में सहयोग बढ़ रहा है।
दक्षिण कोरिया के साथ निवेश और जहाज निर्माण, ब्रिटेन के साथ व्यापार तथा नॉर्वे के साथ आर्थिक सहयोग पर भी भारत का जोर बढ़ा है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भी नई दिल्ली अपने रणनीतिक साझेदारों का दायरा मजबूत कर रही है।

ऊर्जा सुरक्षा भी बड़ी वजह
मध्य-पूर्व में जारी तनाव और ईरान से जुड़े घटनाक्रमों ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ाई है। खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर किसी भी तरह का व्यवधान भारत के लिए महंगा साबित हो सकता है।
इसीलिए भारत ऊर्जा के साथ-साथ महत्वपूर्ण कच्चे माल, तकनीक और आपूर्ति श्रृंखला के लिए भी अलग-अलग देशों के साथ संबंध मजबूत कर रहा है। रूस के साथ पुराने रणनीतिक और ऊर्जा संबंधों को भी भारत बनाए हुए है।
मोदी की रणनीति: किसी एक खेमे में नहीं
विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत की यह नीति उसकी पुरानी रणनीतिक स्वायत्तता की सोच से जुड़ी है। भारत अमेरिका के साथ भी संबंध रखता है, रूस के साथ भी, यूरोप के साथ भी और एशिया-प्रशांत के देशों के साथ भी।
द न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट का व्यापक संकेत यही है कि मोदी सरकार बदलते वैश्विक माहौल में भारत को ज्यादा स्वतंत्र और मजबूत स्थिति में रखना चाहती है। नए व्यापार समझौते, रक्षा साझेदारियां, तकनीकी सहयोग और ऊर्जा संबंध इसी बड़ी रणनीति का हिस्सा हैं।
सीधी भाषा में कहें तो भारत का संदेश साफ है—अमेरिका जरूरी है, लेकिन अमेरिका ही एकमात्र विकल्प नहीं है।
ट्रंप के दौर में जब वैश्विक व्यापार और कूटनीति तेजी से बदल रही है, मोदी सरकार भारत के लिए ज्यादा से ज्यादा विकल्प तैयार करने की कोशिश कर रही है—एक समझौता, एक साझेदारी और एक नया विकल्प, हर बार थोड़ा आगे।


