चुनावी संकट और हिंसा के बीच पड़ोसियों से व्यापार पर फोकस करता म्यांमार जुंटा (Myanmar Junta)

चुनावी संकट और हिंसा के बीच पड़ोसियों से व्यापार पर फोकस करता म्यांमार जुंटा
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नव ठाकुरीया

वैश्विक समुदाय—कुछ गिने-चुने देशों को छोड़कर—म्यांमार (Myanmar), जिसे बर्मा या ब्रह्मदेश भी कहा जाता है, में चल रही तीन-चरणीय चुनाव प्रक्रिया की तीखी आलोचना कर रहा है। सैन्य शासन इन चुनावों को दक्षिण-पूर्व एशिया के इस देश को बहुदलीय लोकतंत्र की ओर ले जाने का संभावित मार्ग बता रहा है, लेकिन ज़मीनी हालात इससे बिल्कुल उलट हैं। राजनीतिक अस्थिरता, गृहयुद्ध जैसी स्थिति और व्यापक हिंसा के बीच म्यांमार की सैन्य जुंटा सरकार पड़ोसी देशों के साथ व्यापारिक और आर्थिक रिश्तों को मज़बूत करने पर ज़ोर देती दिख रही है।

सैन्य-संचालित अख़बार ग्लोबल न्यू लाइट ऑफ म्यांमार के अनुसार, गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा देश प्राकृतिक गैस उत्पादन बढ़ाने के लिए चीन, भारत, थाईलैंड, रूस और मध्य-पूर्व के देशों के साथ सहयोग को आगे बढ़ा रहा है। अख़बार में ऊर्जा मंत्री यू को को ल्विन के हवाले से कहा गया है कि लगभग 5.5 करोड़ आबादी वाला म्यांमार अपतटीय तेल और प्राकृतिक गैस की विभिन्न परियोजनाओं में इन विदेशी साझेदारों के साथ तालमेल को मज़बूत कर रहा है।

1 जनवरी 2026 को प्रकाशित एक फ्रंट-पेज रिपोर्ट में बताया गया कि म्यांमार और थाईलैंड अय्यारवाडी और मोट्टामा तलछटी बेसिन के साथ-साथ अन्य अपतटीय क्षेत्रों में तेल और गैस परियोजनाओं में संयुक्त निवेश बढ़ा रहे हैं। वहीं भारत अंडमान द्वीप समूह के निकटवर्ती क्षेत्रों में तेल और गैस की खोज तथा ड्रिलिंग गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।

इसी बीच, सशस्त्र बल—जिन्हें तातमदाव के नाम से जाना जाता है—ने 28 दिसंबर को आम चुनाव के पहले चरण के सफल आयोजन का दावा किया। यह दावा ऐसे समय में किया गया है जब देश लगातार हिंसा और सशस्त्र संघर्ष से जूझ रहा है। चुनाव 330 टाउनशिप में से केवल 102 में ही कराए जा सके। कई क्षेत्रों में मतदान इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि वे जनरल मिन आंग हलिंग के नेतृत्व वाली सैन्य सरकार के नियंत्रण से बाहर हैं।

सैन्य शासन का विरोध कर रहे जातीय सशस्त्र समूहों, पीपुल्स डिफेंस फोर्स (PDF) और अन्य प्रतिरोध संगठनों—जो वर्तमान में म्यांमार के लगभग एक-तिहाई हिस्से पर नियंत्रण रखते हैं—ने इन चुनावों का खुला विरोध किया है। इसके बावजूद, जुंटा द्वारा नियुक्त संघ चुनाव आयोग (UEC) ने 274 टाउनशिप में चुनाव कराने की योजना बनाई, जबकि शेष क्षेत्रों, विशेषकर रखाइन, सागाइंग और शान प्रांतों के कई हिस्सों को “अशांत और अस्थिर” घोषित कर दिया गया।

नेप्यीडॉ, यांगून और मांडले जैसे प्रमुख शहरों के साथ-साथ बागो और अय्यारवाडी क्षेत्रों के कुछ टाउनशिप में भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच मतदान कराया गया। सैन्य समर्थक यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (USDP) को पहले ही 330 सदस्यीय प्यिथु हलुटाव—म्यांमार की संसद के निचले सदन—के लिए 89 निर्वाचन क्षेत्रों में निर्विरोध विजेता घोषित किया जा चुका है।

मतदान केंद्रों पर मुख्य रूप से बुज़ुर्ग मतदाता ही दिखाई दिए, जिनमें से कई ने भय और मजबूरी के बीच मतदान किया। इसके विपरीत, युवाओं—खासकर गैर-सैन्य परिवारों से आने वाले मतदाताओं—ने बड़े पैमाने पर चुनाव का बहिष्कार किया। जुंटा के एक प्रवक्ता के अनुसार, पहले चरण में 1.15 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में से केवल 52 प्रतिशत ने मतदान किया। यह आंकड़ा 2015 और 2020 के चुनावों की तुलना में काफी कम है, जब लगभग 70 प्रतिशत मतदान हुआ था और आंग सान सू की के नेतृत्व वाली नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) ने भारी जीत दर्ज की थी।

UEC पहले ही NLD सहित 40 से अधिक राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द कर चुका है। वर्तमान में केवल छह राजनीतिक दलों को देशव्यापी स्तर पर चुनाव लड़ने की अनुमति है, जबकि 51 छोटी पार्टियां केवल क्षेत्रीय विधानसभाओं तक सीमित हैं। कुल मिलाकर 57 राजनीतिक दलों के 4,863 उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं। दूसरे चरण का मतदान 11 जनवरी को 100 टाउनशिप में और तीसरा चरण 25 जनवरी 2026 को 63 टाउनशिप में प्रस्तावित है। पहली बार उपयोग की जा रही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों से डाले गए मतों के नतीजे जनवरी के अंत तक घोषित होने की उम्मीद है।

गौरतलब है कि 1 फरवरी 2021 को हुए सैन्य तख्तापलट के बाद से म्यांमार में हिंसा और दमन का सिलसिला लगातार जारी है। अब तक 7,500 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, 36 लाख से ज़्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं और लगभग 2 करोड़ नागरिकों को तत्काल मानवीय सहायता की आवश्यकता है। अनुमान है कि देश में 5.4 लाख से अधिक बच्चे गंभीर कुपोषण से पीड़ित हैं।

पूर्व स्टेट काउंसलर आंग सान सू की, राष्ट्रपति यू विन म्यिंट, तथा हज़ारों NLD नेता, पत्रकार और आम नागरिक अब भी जेल में बंद हैं। बड़ी संख्या में लोकतंत्र समर्थक नेता और कार्यकर्ता थाईलैंड, चीन, भारत और बांग्लादेश में शरण लेने को मजबूर हुए हैं।

भारत—जो कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट और भारत–म्यांमार–थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग जैसी अहम परियोजनाओं में निवेश कर रहा है—सीमावर्ती इलाकों में अस्थिरता, अवैध हथियारों और नशीले पदार्थों की तस्करी तथा म्यांमार से हो रहे अनियंत्रित प्रवासन को लेकर गहरी चिंता जता चुका है। म्यांमार के साथ 1,643 किलोमीटर लंबी खुली भूमि सीमा भारत के लिए एक गंभीर सुरक्षा चुनौती बनी हुई है।

इन तमाम परिस्थितियों में नई दिल्ली के सामने म्यांमार की सैन्य जुंटा सरकार के साथ व्यापारिक और आर्थिक संबंध बनाए रखते हुए क्षेत्रीय सुरक्षा, मानवीय संकट और कूटनीतिक संतुलन साधने की जटिल चुनौती खड़ी है।

(लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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