India और Asia देशों के खिलाफ Western Media की ‘औपनिवेशिक मानसिकता’, ‘ओछी पत्रकारिता’ और कथित पेड नैरेटिव…

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क्या  Western Media अब भी India को ‘सपेरों का देश’ और Asian Countries को रूढ़िवादी नजरिये से देखता है ?

 

by Ashis Sinha

Western Media क्या आज भी भारत  (India) और एशियाई (Asian) देशों को औपनिवेशिक नजरिये से देखता है? पहलगाम आतंकी हमले की कवरेज, Norway cartoon विवाद, narrative bias, double standards और digital colonialism को लेकर उठते बड़े सवालों पर विस्तृत रिपोर्ट।” (Growing criticism in India and Asia accuses sections of Western media of colonial mindset, narrative bias, double standards and culturally insensitive reporting on Asian countries.)

‘दुनिया भर में पश्चिमी मीडिया लंबे समय से खुद को लोकतंत्र, मानवाधिकार और पत्रकारिता के सबसे बड़े प्रहरी के रूप में पेश करता रहा है। लेकिन भारत और कई एशियाई देशों में अब एक बड़ा वर्ग यह सवाल उठाने लगा है कि क्या पश्चिमी मीडिया का एक हिस्सा आज भी “औपनिवेशिक मानसिकता” और “ओछी पत्रकारिता” से पूरी तरह बाहर निकल पाया है?

हाल ही में नॉर्वे के एक अखबार द्वारा प्रधानमंत्री Narendra Modi को “सपेरा” दिखाने वाले कार्टून ने इस बहस को फिर तेज कर दिया। भारत समेत कई देशों में इसे केवल व्यंग्य नहीं, बल्कि औपनिवेशिक दौर की उस मानसिकता का हिस्सा बताया गया, जिसमें भारत और एशियाई समाजों को पिछड़ा, रहस्यमयी या असभ्य दिखाया जाता था।

यही नहीं, जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 2025 में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी, जिनमें ज्यादातर पर्यटक थे। भारतीय एजेंसियों और कई रिपोर्टों के मुताबिक, हमले के तार पाकिस्तान समर्थित आतंकी नेटवर्क से जुड़े बताए गए।

प्रत्यक्षदर्शियों और सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, आतंकियों ने कथित तौर पर लोगों की धार्मिक पहचान पूछकर उन्हें निशाना बनाया। इस घटना ने पूरे देश में आक्रोश पैदा कर दिया और कश्मीर में सीमा पार आतंकवाद को लेकर चिंता फिर बढ़ गई।

लेकिन इस हमले को लेकर गुस्से के साथ-साथ एक और विवाद तेजी से सामने आया — पश्चिमी मीडिया के एक हिस्से द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा।

कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने शुरुआती रिपोर्टों में हमलावरों को “terrorists” यानी आतंकवादी कहने के बजाय “gunmen”, “militants” या “armed men” जैसे शब्दों से संबोधित किया। इसे लेकर भारत में पत्रकारों, राजनीतिक विश्लेषकों और सोशल मीडिया यूज़र्स ने तीखी प्रतिक्रिया दी।

आलोचकों का कहना था कि जब यूरोप या अमेरिका में इसी तरह के हमले होते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय मीडिया तुरंत “terror attack” और “terrorists” जैसे शब्दों का इस्तेमाल करता है। लेकिन भारत या अन्य एशियाई देशों में होने वाले आतंकी हमलों के दौरान कई बार अपेक्षाकृत नरम शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

भारत में कई पर्यवेक्षकों के लिए यह केवल शब्दों का मामला नहीं, बल्कि नैरेटिव और वैश्विक धारणा का सवाल बन गया।

आलोचकों के मुताबिक, “terrorist” शब्द किसी हमले की वैचारिक हिंसा और नागरिकों को जानबूझकर निशाना बनाने की गंभीरता को स्पष्ट करता है। वहीं “gunmen” या “armed attackers” जैसे शब्द कई बार उस क्रूरता और आतंकवादी प्रकृति को कम करके पेश करते हैं।

कई भारतीय विश्लेषकों ने कहा कि पहलगाम हमले की कवरेज अंतरराष्ट्रीय मीडिया के एक बड़े पैटर्न को दर्शाती है, जहां एशियाई देशों में आतंकवाद को लेकर भाषा अपेक्षाकृत सावधानीपूर्ण या नरम रखी जाती है।

इस विवाद ने 2008 के 2008 Mumbai attacks और कश्मीर में हुई अन्य घटनाओं के दौरान उठे पुराने सवालों को भी फिर से चर्चा में ला दिया। उस समय भी कुछ अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टिंग पर आरोप लगे थे कि नागरिकों को निशाना बनाए जाने के बावजूद आतंकवाद को लेकर सीधी और स्पष्ट शब्दावली से बचा गया।

भारतीय टिप्पणीकारों ने यह भी कहा कि पहलगाम हमले से जुड़े संगठनों का नाम लंबे समय से पाकिस्तान समर्थित आतंकी नेटवर्क से जुड़ता रहा है। ऐसे में “terrorist” शब्द से बचना कई लोगों को दोहरे मापदंड जैसा लगा।

हालांकि मीडिया विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों की अपनी संपादकीय नीतियां होती हैं। कुछ संस्थान किसी घटना को आधिकारिक रूप से “आतंकवाद” कहने से पहले सरकारी पुष्टि या जांच एजेंसियों के निष्कर्ष का इंतजार करते हैं।

इसके बावजूद भारत में यह धारणा लगातार मजबूत होती जा रही है कि जब आतंकवाद का निशाना भारत या अन्य एशियाई देश बनते हैं, तब पश्चिमी मीडिया का एक हिस्सा अपेक्षाकृत नरम भाषा का इस्तेमाल करता है।

कई भारतीयों के लिए पहलगाम हमले की यह बहस केवल मीडिया कवरेज का मुद्दा नहीं रही, बल्कि यह सवाल बन गई कि क्या अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हिंसा और आतंकवाद को लेकर समान नैतिक मानदंड अपनाती है या नहीं।

लेकिन आलोचकों का कहना है कि मामला केवल एक कार्टून तक सीमित नहीं है। उनका मानना है कि पश्चिमी मीडिया का एक हिस्सा आज भी एशियाई देशों को बराबरी के नजरिये से नहीं, बल्कि “जज” करने वाले दृष्टिकोण से देखता है।

क्या आज भी मौजूद है औपनिवेशिक सोच?

औपनिवेशिक दौर में यूरोपीय ताकतों ने एशिया और अफ्रीका को अक्सर “असभ्य”, “अव्यवस्थित” और “पिछड़ा” बताकर अपने शासन को सही ठहराने की कोशिश की थी। समय के साथ यही सोच राजनीति, शिक्षा और मीडिया संस्थानों में भी गहराई से बैठ गई।

आलोचकों का तर्क है कि उसी सोच की झलक आज भी आधुनिक पश्चिमी पत्रकारिता में दिखाई देती है।

भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, अंतरिक्ष शक्ति है, डिजिटल टेक्नोलॉजी में तेजी से आगे बढ़ रहा है और वैश्विक राजनीति में प्रभाव बढ़ा रहा है। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भारत को अक्सर गरीबी, धार्मिक तनाव, जातीय विवाद, प्रदूषण या लोकतंत्र पर खतरे जैसी खबरों तक सीमित कर दिया जाता है।

इसी तरह China को मुख्यतः “खतरे” के रूप में दिखाया जाता है, जबकि पश्चिम एशियाई देशों को अक्सर आतंकवाद या अस्थिरता से जोड़कर देखा जाता है। अफ्रीकी देशों की चर्चा भी ज्यादातर युद्ध, भूखमरी या मानवीय संकटों के दौरान ही होती है।

आलोचकों का कहना है कि इससे एक ऐसी मानसिक छवि बनती है, जिसमें पश्चिमी देश “सभ्य” और “स्थिर” माने जाते हैं, जबकि एशियाई और ग्लोबल साउथ के देशों को हमेशा समस्याग्रस्त समाजों की तरह पेश किया जाता है।

‘ओछी पत्रकारिता’ का आरोप क्यों?

पश्चिमी मीडिया पर दूसरा बड़ा आरोप “ओछी पत्रकारिता” का है।

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण country को कई बार बेहद सरल और भावनात्मक नैरेटिव में समेट दिया जाता है। भारत में सैकड़ों भाषाएं, अलग-अलग संस्कृतियां, विविध राजनीतिक सोच और विशाल सामाजिक जटिलताएं हैं, लेकिन आलोचकों के मुताबिक कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टें इन्हें गहराई से समझने के बजाय केवल विवादों और सनसनीखेज पहलुओं पर केंद्रित रहती हैं।

उनका कहना है कि कई बार रिपोर्टिंग में ऐतिहासिक संदर्भ, सांस्कृतिक समझ और स्थानीय जटिलताओं की कमी दिखाई देती है।

आलोचकों के अनुसार, कुछ पश्चिमी मीडिया संस्थान पहले से बनी धारणाओं के हिसाब से खबरों को ढालते हैं। यानी वे एशियाई देशों को समझने से ज्यादा, उनके बारे में पहले से मौजूद विचारों को मजबूत करने वाली खबरों को प्राथमिकता देते हैं।

दोहरे मापदंड के आरोप

भारत और कई एशियाई देशों में यह धारणा भी मजबूत हुई है कि पश्चिमी मीडिया अक्सर दोहरे मापदंड अपनाता है।

अगर एशियाई देशों में राजनीतिक विरोध, सामाजिक तनाव या सरकार से जुड़ी विवादित घटनाएं होती हैं, तो उन्हें “लोकतंत्र पर खतरा” या “सत्तावाद” जैसी बड़ी चिंताओं से जोड़ दिया जाता है। लेकिन पश्चिमी देशों में ऐसी ही घटनाओं को अक्सर “राजनीतिक मतभेद” या “लोकतांत्रिक प्रक्रिया” का हिस्सा बताया जाता है।

भारतीय विश्लेषकों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया भारत में तनाव और विवादों को प्रमुखता देता है, लेकिन लोकतांत्रिक भागीदारी, तकनीकी प्रगति, बुनियादी ढांचे के विस्तार और आर्थिक विकास जैसे पहलुओं को अपेक्षाकृत कम महत्व मिलता है।

आलोचकों का दावा है कि इससे यह संदेश जाता है कि पश्चिम ही लोकतंत्र और आधुनिकता का असली पैमाना है, जबकि बाकी देशों को हमेशा कठघरे में खड़ा किया जाता है।

‘पेड नैरेटिव’ और रणनीतिक प्रभाव के आरोप

हाल के वर्षों में एक और गंभीर आरोप सामने आया है। भारत और एशिया के कई राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि “औपनिवेशिक मानसिकता” और “ओछी पत्रकारिता” के अलावा कुछ अंतरराष्ट्रीय नैरेटिव कथित रूप से आर्थिक, वैचारिक या भू-राजनीतिक हितों से भी प्रभावित होते हैं।

आलोचकों का आरोप है कि कुछ वैश्विक मीडिया नेटवर्क कॉरपोरेट फंडिंग, लॉबिंग समूहों, थिंक टैंकों और रणनीतिक संस्थाओं के प्रभाव में काम करते हैं, जिससे खबरों की दिशा और प्रस्तुति प्रभावित हो सकती है।

उनका कहना है कि भारत, चीन और अन्य उभरती एशियाई शक्तियों से जुड़ी नकारात्मक खबरों को कई बार disproportionate तरीके से वैश्विक स्तर पर उछाला जाता है, खासकर तब जब ये देश पश्चिमी रणनीतिक सोच से अलग रास्ता अपनाते हैं।

भारत का Russia–Ukraine War पर स्वतंत्र रुख, BRICS में सक्रिय भूमिका और “मल्टीपोलर वर्ल्ड” की वकालत भी कई पश्चिमी विश्लेषणों में तीखी आलोचना का कारण बनी। कुछ भारतीय टिप्पणीकारों का मानना है कि यह असहजता एक ऐसी विश्व-व्यवस्था से जुड़ी है, जिसमें पश्चिम लंबे समय तक निर्णायक शक्ति रहा है।

हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि हर आलोचनात्मक रिपोर्टिंग को “प्रचार” या “साजिश” मान लेना सही नहीं होगा। मीडिया संस्थान कई राजनीतिक, व्यावसायिक और वैचारिक दबावों के बीच काम करते हैं। फिर भी एशिया में बढ़ता अविश्वास यह दिखाता है कि पश्चिमी मीडिया और ग्लोबल साउथ के बीच भरोसे की दूरी बढ़ रही है।

पुराने स्टीरियोटाइप आज भी क्यों दिखते हैं?

भारत को आज भी कई बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर “सपेरों”, झुग्गियों, अराजकता या रहस्यवाद की छवियों के जरिए दिखाया जाता है, जबकि भारत अब अंतरिक्ष मिशनों, डिजिटल क्रांति और वैश्विक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है।

आलोचकों का कहना है कि इस तरह की प्रस्तुति एशियाई समाजों को आधुनिक वास्तविकताओं के बजाय पुराने औपनिवेशिक प्रतीकों में कैद कर देती है।

कई पर्यवेक्षक यह भी कहते हैं कि एशियाई और अफ्रीकी देशों की त्रासदियों को जिस तरह दृश्यात्मक रूप से दिखाया जाता है, वैसा पश्चिमी देशों के मामले में शायद ही स्वीकार किया जाए।

सूचना युग में ‘मीडिया इम्पीरियलिज्म’

आज दुनिया के अधिकांश बड़े अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान, न्यूज़ एजेंसियां और डिजिटल प्लेटफॉर्म पश्चिमी देशों में केंद्रित हैं। इसलिए वैश्विक घटनाओं को समझने और प्रस्तुत करने का नजरिया भी काफी हद तक पश्चिमी ढांचे से प्रभावित रहता है।

आलोचक इसे “मीडिया इम्पीरियलिज्म” यानी सूचना साम्राज्यवाद कहते हैं — जहां राजनीतिक उपनिवेशवाद खत्म होने के बाद भी नैरेटिव पर नियंत्रण कुछ ताकतों के हाथ में बना हुआ है।

डिजिटल कॉलोनियलिज्म की नई बहस

अब यह बहस केवल टीवी और अखबारों तक सीमित नहीं रही। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, एल्गोरिद्म और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

कई विशेषज्ञों का मानना है कि क्योंकि बड़ी टेक कंपनियां और AI सिस्टम पश्चिमी देशों में विकसित हुए हैं, इसलिए उनमें पश्चिमी सांस्कृतिक और वैचारिक झुकाव दिखाई देना स्वाभाविक है।

इसी को लेकर अब “डिजिटल कॉलोनियलिज्म” यानी डिजिटल औपनिवेशिकता की चर्चा बढ़ रही है।

एशिया का बढ़ता प्रतिरोध

सबसे बड़ा बदलाव यह आया है कि अब एशियाई समाज पश्चिमी नैरेटिव को बिना चुनौती स्वीकार नहीं करते।

सोशल मीडिया और स्वतंत्र डिजिटल प्लेटफॉर्म ने भारत समेत कई देशों को अपनी बात सीधे दुनिया तक पहुंचाने की ताकत दी है। अब किसी भी खबर, कार्टून या रिपोर्ट पर तुरंत वैश्विक प्रतिक्रिया देखने को मिलती है।

नॉर्वे वाले कार्टून पर हुआ विवाद इसी बदलाव का उदाहरण माना जा रहा है। जो बातें कभी बिना विरोध के निकल जाती थीं, अब उन्हें सांस्कृतिक सम्मान और समानता के सवाल पर चुनौती दी जा रही है।

पूरा पश्चिमी मीडिया एक जैसा नहीं

हालांकि कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि पूरे पश्चिमी मीडिया को एक ही नजर से देखना सही नहीं होगा।

कई पश्चिमी पत्रकार, लेखक और संस्थान खुद भी नस्लवाद, यूरोसेंट्रिक सोच और मीडिया बायस की आलोचना करते रहे हैं। कई प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने भारत और एशिया पर बेहद संतुलित और गहन रिपोर्टिंग भी की है।

इसलिए बहस किसी एक पत्रकार या संस्था की नहीं, बल्कि उन व्यापक संरचनात्मक और ऐतिहासिक मानसिकताओं की है, जिनका असर आज भी वैश्विक मीडिया पर दिखाई देता है।

बदलती दुनिया और नई नैरेटिव लड़ाई

असल में “औपनिवेशिक मानसिकता”, “ओछी पत्रकारिता”, कथित नैरेटिव बायसनेस और रणनीतिक प्रभावों को लेकर चल रही यह बहस केवल मीडिया की नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था की कहानी भी है।

करीब दो सदियों तक दुनिया की राजनीतिक, आर्थिक और वैचारिक दिशा मुख्यतः पश्चिमी ताकतों ने तय की। लेकिन 21वीं सदी में एशिया तेजी से उभर रहा है — आर्थिक रूप से भी, रणनीतिक रूप से भी और सांस्कृतिक रूप से भी।

ऐसे में भारत समेत कई एशियाई देश अब केवल आर्थिक शक्ति ही नहीं, बल्कि “नैरेटिव स्वतंत्रता” और “बौद्धिक समानता” की भी मांग कर रहे हैं।

और शायद यही आज की सबसे बड़ी वैश्विक बहस बनती जा रही है — क्या दुनिया अब भी एशिया को पुराने औपनिवेशिक नजरिये से देख रही है, या सचमुच एक बराबरी वाली बहुध्रुवीय दुनिया की ओर बढ़ रही है?’

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