Ajit Doval से Gyanesh Kumar तक: Modi सरकार से आगे बढ़ती विपक्ष की लड़ाई

Ajit Doval से Gyanesh Kumar तक: Modi सरकार से आगे बढ़ती विपक्ष की लड़ाई
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by Ashis Sinha

Ajit Doval से Gyanesh Kumar तक, जानिए Modi सरकार और प्रमुख संवैधानिक व राष्ट्रीय सुरक्षा संस्थाओं को लेकर विपक्ष की बढ़ती राजनीतिक लड़ाई की पूरी कहानी।

 

भारतीय राजनीति में टकराव का दायरा लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। अब लड़ाई केवल सरकार की नीतियों, संसद में बहुमत या किसी एक मुद्दे तक सीमित नहीं रह गई है। चुनाव आयोग, राष्ट्रीय सुरक्षा, संवैधानिक संस्थाओं और सरकार के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों की भूमिका भी राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है।

इस समय सबसे ज्यादा चर्चा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार (CEC, Gyanesh Kumar) को लेकर है।

लेकिन यह कहानी केवल ज्ञानेश कुमार से शुरू नहीं होती।

पिछले कई वर्षों में विपक्षी दलों ने नरेंद्र मोदी सरकार से जुड़े कई महत्वपूर्ण संस्थानों और पदाधिकारियों पर सवाल उठाए हैं। इनमें चुनाव आयोग से लेकर जांच एजेंसियां, राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल (Ajit Doval) तक शामिल हैं।

ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि विपक्ष मोदी सरकार का विरोध क्यों कर रहा है।

बड़ा सवाल यह है कि—

क्या भारतीय राजनीति अब सरकार की नीतियों से आगे बढ़कर उन संस्थानों की विश्वसनीयता की लड़ाई में बदल रही है, जिनके जरिए सरकार शासन करती है?

यही सवाल मौजूदा राजनीतिक टकराव को ज्यादा गंभीर बनाता है।

Gyanesh Kumar: संस्थागत टकराव का नया केंद्र

फिलहाल विवाद का सबसे बड़ा केंद्र चुनाव आयोग की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया है।

विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर संसद में एक और प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहे हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयोग के भीतर SIR से जुड़े कुछ फैसलों को लेकर 10 महीने में कम से कम 14 मौकों पर सवाल या आपत्तियां दर्ज की गई थीं। इनमें मतदाता सूची, नए मतदाताओं के पंजीकरण और नाम जोड़ने-हटाने से जुड़े मुद्दे शामिल थे।

विपक्ष ने इन घटनाओं को चुनाव आयोग के कामकाज से जुड़े गंभीर सवालों के रूप में पेश किया है।

दूसरी ओर, चुनाव आयोग का कहना है कि किसी बहुसदस्यीय संस्था में विचार-विमर्श के दौरान अलग-अलग राय होना असामान्य नहीं है और अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।

यहीं एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।

असहमति होना एक तथ्य है, लेकिन उस असहमति से क्या निष्कर्ष निकाला जाए, यह अलग सवाल है।

इसके बावजूद राजनीतिक स्तर पर विवाद इतना बढ़ चुका है कि विपक्ष ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर संसदीय प्रक्रिया आगे बढ़ा रहा है।

यानी अब विवाद केवल SIR तक सीमित नहीं है।

यह चुनाव आयोग पर जनता के भरोसे की लड़ाई बनता जा रहा है।


लेकिन Ajit Doval (अजित डोभाल) क्यों?

यहीं से कहानी और दिलचस्प हो जाती है।

अगर चुनाव आयोग मोदी सरकार के चुनावी ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा है, तो अजित डोभाल सरकार की राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था के सबसे प्रमुख चेहरों में से एक हैं।

2014 से राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के पद पर रहे डोभाल पिछले एक दशक में मोदी सरकार की सुरक्षा और रणनीतिक नीति के सबसे चर्चित चेहरों में शामिल रहे हैं।

उनकी यही प्रमुख भूमिका उन्हें विपक्षी राजनीति के निशाने पर भी लाती रही है।

और यह सिलसिला नया नहीं है।

2016: उरी हमले के बाद डोभाल पर हमला

सितंबर 2016 में उरी आतंकी हमले के बाद कांग्रेस ने तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर और NSA अजित डोभाल, दोनों के इस्तीफे की मांग की थी।

कांग्रेस ने हमले को लेकर खुफिया और सुरक्षा संबंधी चूक का आरोप लगाया था और सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र की जवाबदेही पर सवाल उठाए थे।

यानी उस समय भी राजनीतिक हमला केवल प्रधानमंत्री या रक्षा मंत्रालय तक सीमित नहीं था।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का पद भी सीधे राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया था।

बाद के वर्षों में पाकिस्तान, आतंकवाद, खुफिया अभियानों, निगरानी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कई मुद्दों पर डोभाल का नाम विपक्षी राजनीति में सामने आता रहा।


पाकिस्तान से लेकर निगरानी तक

अजित डोभाल का नाम धीरे-धीरे मोदी सरकार की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का पर्याय बन गया।

पाकिस्तान नीति हो, आतंकवाद के खिलाफ रणनीति हो, खुफिया एजेंसियों की भूमिका हो या निगरानी से जुड़े आरोप — डोभाल का नाम इन बहसों में बार-बार सामने आया।

मार्च 2025 में राज्यसभा में हुई एक चर्चा के दौरान एक विपक्षी सांसद ने राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में डोभाल के लंबे कार्यकाल का उल्लेख किया और सुरक्षा एजेंसियों तथा कथित पेगासस निगरानी को लेकर व्यापक सवाल उठाए।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये संसदीय बहस में उठाए गए राजनीतिक सवाल और आरोप थे, किसी न्यायिक निष्कर्ष का प्रमाण नहीं।

लेकिन राजनीतिक रूप से संदेश स्पष्ट था—

डोभाल अब केवल राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अधिकारी नहीं रहे थे; उनका पद मोदी सरकार की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर होने वाली राजनीतिक बहस का भी हिस्सा बन चुका था।


जुलाई 2024: राहुल गांधी के ‘चक्रव्यूह’ में डोभाल

जुलाई 2024 में लोकसभा में राहुल गांधी के भाषण ने इस राजनीतिक बहस को एक नया आयाम दिया।

राहुल गांधी ने महाभारत के ‘चक्रव्यूह’ का उदाहरण देते हुए आरोप लगाया कि देश में सत्ता और आर्थिक प्रभाव का एक ऐसा ढांचा बन गया है, जिसके केंद्र में कुछ प्रभावशाली लोग हैं।

उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत, NSA अजित डोभाल और उद्योगपति मुकेश अंबानी तथा गौतम अडानी के नाम लिए।

बीजेपी नेताओं ने राहुल गांधी द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का नाम राजनीतिक भाषण में लेने पर आपत्ति जताई और इसकी आलोचना की।

यह घटना महत्वपूर्ण इसलिए थी क्योंकि इससे यह साफ हुआ कि NSA का पद भी अब देश की व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा बन चुका है।


अक्टूबर 2025: डोभाल ने भी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर चेताया

इसके बाद अक्टूबर 2025 में खुद अजित डोभाल ने संस्थाओं की विश्वसनीयता को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

एक व्याख्यान में डोभाल ने कहा कि चुनाव व्यवस्था, न्यायपालिका, रक्षा और सुरक्षा संस्थानों जैसी महत्वपूर्ण संस्थाओं की विश्वसनीयता को दुष्प्रचार, शत्रुतापूर्ण प्रचार या निहित स्वार्थों के कारण कमजोर नहीं होने दिया जाना चाहिए।

उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई जब विपक्ष लगातार चुनाव आयोग और चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा था।

कई रिपोर्टों ने डोभाल की टिप्पणी को विपक्ष, खासकर राहुल गांधी द्वारा चुनावी व्यवस्था पर उठाए जा रहे सवालों के संदर्भ में देखा। हालांकि महत्वपूर्ण बात यह है कि डोभाल ने अपनी टिप्पणी में किसी खास राजनीतिक दल का नाम नहीं लिया था।

फिर भी राजनीतिक संदेश को नजरअंदाज करना आसान नहीं था।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अब चुनावी व्यवस्था और संस्थागत विश्वसनीयता पर सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन चुके थे।


डोभाल से ज्ञानेश कुमार तक—क्या कोई पैटर्न है?

यहीं से बहस थोड़ी ज्यादा गंभीर हो जाती है।

यह कहने के लिए पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं कि विपक्षी दलों की कोई एक साझा रणनीति है, जिसके तहत मोदी सरकार से जुड़े हर महत्वपूर्ण अधिकारी या संस्था को कमजोर करने का अभियान चलाया जा रहा है।

लेकिन एक राजनीतिक पैटर्न जरूर दिखाई देता है।

विपक्ष लगातार सवाल उठा रहा है—

  • चुनाव आयोग और मतदाता सूची पर;
  • SIR प्रक्रिया पर;
  • राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर;
  • खुफिया एवं जांच एजेंसियों की भूमिका पर;
  • निगरानी से जुड़े आरोपों पर;
  • संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता पर;
  • और सरकार की जवाबदेही पर।

इस दृष्टि से देखें तो ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मौजूदा अभियान को व्यापक राजनीतिक टकराव से पूरी तरह अलग करके देखना भी आसान नहीं है।

लेकिन डोभाल और ज्ञानेश कुमार के मामलों को एक जैसा बताना भी सही नहीं होगा।

डोभाल के मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा और सरकारी सुरक्षा नीति को लेकर राजनीतिक आलोचना रही है, जबकि ज्ञानेश कुमार के मामले में फिलहाल एक विशिष्ट संसदीय प्रक्रिया के जरिए हटाने की मांग सामने है।


विपक्ष की पुरानी रणनीति: अविश्वास प्रस्ताव

मोदी सरकार को सीधे चुनौती देने की कोशिश नई नहीं है।

2018 में विपक्षी दलों ने मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था।

2023 में भी विपक्ष ने अविश्वास प्रस्ताव लाया और सरकार से मणिपुर सहित कई मुद्दों पर जवाब मांगा।

अविश्वास प्रस्ताव लोकतांत्रिक और संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा है। इसे सरकार को असंवैधानिक तरीके से हटाने की कोशिश कहना सही नहीं होगा।

लेकिन राजनीतिक रूप से इसका एक महत्व जरूर है।

यह सरकार को संसद के भीतर अपनी नीतियों और फैसलों का बचाव करने के लिए मजबूर करता है।


अब लड़ाई संसद से बाहर भी है

समय के साथ राजनीतिक टकराव का स्वरूप बदलता गया है।

अब विपक्ष कई मोर्चों पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है।

चुनावी मोर्चा

SIR, मतदाता सूची, वोटर डिलीशन और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली।

राष्ट्रीय सुरक्षा का मोर्चा

खुफिया एजेंसियां, आतंकवाद, पाकिस्तान नीति, सैन्य अभियान और NSA की भूमिका।

संस्थागत मोर्चा

संवैधानिक और जांच संस्थाओं की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता।

संसदीय मोर्चा

अविश्वास प्रस्ताव, हटाने के प्रस्ताव और जवाबदेही की मांग।

सड़क का मोर्चा

विरोध प्रदर्शन, जनअभियान और राजनीतिक लामबंदी।

हर मुद्दे का अपना संदर्भ है।

लेकिन इन सभी को जोड़ने वाला एक बड़ा शब्द है—

विश्वसनीयता।


क्या विपक्ष सरकार को अस्थिर करना चाहता है?

यह सबसे संवेदनशील सवाल है।

विपक्ष की गतिविधियों को सीधे ‘सरकार को अस्थिर करने की साजिश’ कहना तथ्यों से आगे निकल जाना होगा।

हां, यह जरूर दिखाई देता है कि विपक्ष सरकार और उससे जुड़े महत्वपूर्ण संस्थानों के खिलाफ लगातार अधिक आक्रामक राजनीतिक अभियान चला रहा है।

संसदीय प्रस्ताव हैं।

इस्तीफे और हटाने की मांगें हैं।

चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल हैं।

लेकिन इन सबके आधार पर एक ऐसी साझा योजना का निष्कर्ष निकालना, जिसका उद्देश्य सरकार को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर जाकर गिराना हो, अभी उचित नहीं होगा।

लोकतंत्र में विपक्ष को सरकार से सवाल पूछने, संस्थाओं की जवाबदेही तय करने और नीतियों का विरोध करने का अधिकार है।

असल सवाल यह होना चाहिए कि लगाए गए आरोप कितने प्रमाणित हैं और उनके समाधान के लिए संस्थागत प्रक्रिया क्या कहती है।


फिर भी सरकार के लिए राजनीतिक खतरा क्या है?

यहीं विपक्ष की रणनीति का राजनीतिक महत्व सामने आता है।

लोकसभा में बहुमत वाली सरकार को केवल अविश्वास प्रस्ताव से गिराना आसान नहीं होता।

ऐसे में राजनीतिक संघर्ष का दूसरा रास्ता है—सरकार की संस्थागत विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करना।

चुनाव आयोग पर सवाल उठेंगे तो बात चुनाव की विश्वसनीयता तक जाएगी।

राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र पर सवाल उठेंगे तो बात सरकार की सुरक्षा नीति तक जाएगी।

जांच एजेंसियों पर सवाल उठेंगे तो बात संस्थागत स्वतंत्रता तक जाएगी।

और धीरे-धीरे राजनीतिक बहस सरकार से निकलकर पूरे शासन तंत्र की विश्वसनीयता पर पहुंच सकती है।


लेकिन विपक्ष के सामने भी बड़ी चुनौती

इस पूरी प्रक्रिया में विपक्ष के सामने भी एक बड़ा खतरा है।

अगर हर संस्थागत मतभेद को संस्थागत कब्जे या साजिश का प्रमाण बताया जाने लगे, तो आरोपों की विश्वसनीयता भी कमजोर हो सकती है।

मौजूदा चुनाव आयोग विवाद इसका उदाहरण है।

दो चुनाव आयुक्तों द्वारा किसी प्रक्रिया पर सवाल उठाना गंभीरता से जांचे जाने योग्य विषय हो सकता है। लेकिन इससे अपने आप यह साबित नहीं होता कि अंतिम फैसला गैरकानूनी था या राजनीतिक दबाव में लिया गया।

इसी तरह किसी राष्ट्रीय सुरक्षा अधिकारी की आलोचना अपने आप खुफिया विफलता साबित नहीं करती।

राजनीतिक आरोपों को प्रमाण की कसौटी पर खरा उतरना ही होगा।


असली लड़ाई सत्ता की नहीं, भरोसे की है

शायद मौजूदा राजनीतिक टकराव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है।

सरकार चाहती है कि जनता चुनाव आयोग और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा करे।

विपक्ष चाहता है कि जनता इन संस्थाओं के कामकाज पर सवाल उठाए और जवाबदेही की मांग करे।

सरकार और उसके समर्थक राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र का बचाव करते हैं।

विपक्ष पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग करता है।

और इन दोनों के बीच खड़ा है—भारतीय मतदाता।

अगर संस्थाओं पर भरोसा लगातार कमजोर होता गया, तो इसका नुकसान केवल सरकार या विपक्ष को नहीं होगा।

नुकसान लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति जनता के विश्वास का होगा।


आगे की लड़ाई कैसी होगी?

भारतीय राजनीति का अगला बड़ा संघर्ष शायद केवल यह नहीं होगा कि भारत पर कौन शासन करेगा।

संघर्ष यह भी होगा कि—

भारत की संस्थाओं पर भरोसा कौन कायम रख पाएगा?

2016 में उरी हमले के बाद अजित डोभाल के इस्तीफे की मांग से लेकर 2024 में राहुल गांधी के ‘चक्रव्यूह’ में डोभाल के नाम तक, 2025 में डोभाल की संस्थागत विश्वसनीयता पर टिप्पणी से लेकर 2026 में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी अभियान तक—राजनीतिक टकराव का दायरा लगातार विस्तृत हुआ है।

मुद्दे अलग हैं।

संस्थाएं अलग हैं।

राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं।

लेकिन इन सबके केंद्र में एक ही सवाल तेजी से उभर रहा है—

क्या जनता को अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर भरोसा है?

क्योंकि सरकारें आती-जाती हैं।

राजनीतिक दल बदलते हैं।

नेता बदलते हैं।

लेकिन संस्थाएं बनी रहती हैं।

और जब राजनीतिक संघर्ष सरकार से निकलकर संस्थाओं की विश्वसनीयता तक पहुंच जाता है, तो लड़ाई केवल सत्ता की नहीं रह जाती।

वह लोकतंत्र में जनता के भरोसे की लड़ाई बन जाती है।

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