अलविदा कह गए दोस्त, यादों से कहाँ बिछुड़ते हैं…!

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नव ठाकुरिया

यह एक चौंकाने वाली और दिल तोड़ देने वाली खबर थी। कुछ ही दिनों के भीतर बीमारी के कारण हमने असम इंजीनियरिंग कॉलेज (AEC), जालुकबाड़ी के अपने 1985–90 बैच के कम से कम तीन साथियों को खो दिया। उनकी असमय मृत्यु की खबरें हमारे उस व्हाट्सऐप समूह में साझा की गईं, जो गुवाहाटी विश्वविद्यालय के अंतर्गत पढ़े इस बैच के दोस्तों को आज भी जोड़े रखता है। संदेश आते गए, शोक व्यक्त होता गया, लेकिन मन यह स्वीकार करने को तैयार नहीं था कि जिन दोस्तों के साथ हमने जीवन के सबसे सुनहरे दिन बिताए थे, वे अब इस दुनिया में नहीं रहे।

गुवाहाटी विश्वविद्यालय परिसर के पीछे, पहाड़ी की ओट में बसे शांत AEC कैंपस में बिताए वे दिन आज भी स्मृतियों में जीवित हैं। हम सब अपने-अपने सपनों के साथ इस प्रतिष्ठित संस्थान में आए थे और परिवार, समाज तथा राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारियों का वादा लेकर यहाँ से निकले थे। क्लासरूम, मैकेनिकल वर्कशॉप, हॉस्टल नंबर-7 की चहल-पहल और सुंदरबाड़ी बाज़ार की शाम की चाय—सब कुछ आज भी जैसे कल की ही बात लगता है। उन दिनों हमारे प्रिंसिपल डॉ. अपर्णा के. पद्मपति सहित कई विद्वान प्रोफेसर हमें इंजीनियरिंग की जटिल समस्याएँ समझाया करते थे।

कॉलेज के बाद मेरा रास्ता कुछ अलग दिशा में मुड़ गया। मैंने गुवाहाटी के एक दैनिक समाचारपत्र में काम शुरू किया। अचानक लिया गया यह निर्णय मेरी पूरी पेशेवर जिंदगी की दिशा बन गया और मैं पत्रकारिता की दुनिया में रम गया। इसी व्यस्त जीवन के बीच जब सोशल मीडिया समूह में मेरे सहपाठी ज्योतिप्रकाश कुर्मी के निधन की खबर आई, तो मन भीतर तक हिल गया। लंबा-चौड़ा व्यक्तित्व, सलीके से कपड़े पहनने वाला और बेहद विनम्र स्वभाव का यह मित्र मेरे ही ब्रांच का छात्र था। हाल ही में पता चली किडनी की बीमारी से जूझते-जूझते वह जीवन की लड़ाई हार गया।

कुछ ही समय पहले कमल दास भी इस दुनिया को अलविदा कह गए। एक दुर्घटना के बाद लंबे समय तक कष्ट सहने के बाद उनकी जीवन यात्रा समाप्त हुई। हमेशा मुस्कुराने वाला यह दोस्त अचानक यादों में बदल गया। कुछ महीने पहले हमारे एक और साथी सुज्ञान दत्ता भी गंभीर बीमारी से जूझते हुए चल बसे। बीमारी के अंतिम दिनों में भी उन्होंने मुझे फोन किया, लेकिन अपने दर्द की चर्चा नहीं की—बल्कि हमेशा की तरह मेरी पत्रकारिता को लेकर हँसी-मजाक में शिकायतें करते रहे।

समय के साथ हमने और भी कई AECian दोस्तों को खो दिया। संदीप गोयल, जो शांत और गंभीर स्वभाव के मेधावी छात्र थे, बीमारी से जूझते हुए हमें छोड़ गए। मेरे हॉस्टल-साथी गुनगोविंद बुरागोहेन (गुन) का निधन भी हमारे लिए गहरा आघात था। गुन बेहद मिलनसार और आशावादी इंसान था। कॉलेज के दिनों में हम कई बार गुवाहाटी को अलग-अलग नजरियों से देखने निकल पड़ते थे। अक्सर हमारी योजनाएँ सफल नहीं होती थीं, लेकिन गुन हर बार मुस्कुराकर कहता—“अगली बार जरूर कामयाब होंगे।”

कॉलेज छोड़ने के बाद पत्रकारिता में आने के मेरे निर्णय में AEC के प्रोफेसर डॉ. सुरेंद्र नाथ मेधी और ‘नतुन दैनिक’ के संस्थापक संपादक चंद्र प्रसाद सैकिया का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन दिनों मेरे मित्र प्रदीप मेधी अक्सर गुवाहाटी प्रेस क्लब परिसर में मुझसे मिलने आते थे और मज़ाक में कहते कि मैंने ऐसा पेशा चुन लिया है जिसमें आर्थिक सुरक्षा कम है। वे एक सफल इंजीनियर बनने के सपने देखते थे, लेकिन एक दिल के दौरे ने उनकी जीवन यात्रा अचानक समाप्त कर दी।

इस बीच हमने अपने कई और साथियों को खो दिया—प्रबल चौधरी, उत्तम कुमार रॉय (प्रतिभाशाली रंगकर्मी और निर्देशक), मंजू बोराह, स्वपन कुमार दास, बिपुल शर्मा, कमल कृष्ण गुप्ता, मोनिलाल ब्रह्मा, इम्लियाकुम लोंगकुमार (अकुम) और अंतर्मुखी स्वभाव वाले पराग जे. बरुआ। हमारे बैच के एक सक्रिय छात्र नेता प्रणबज्योति बरदोलोई का तो कॉलेज के दिनों में ही एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया था। बजाली कॉलेज (अब भट्टदेव विश्वविद्यालय) में पढ़ने वाले मेरे मित्र जयंत कुमार दास, कैलाश शर्मा और मनोरंजन तालुकदार भी समय से पहले इस दुनिया को अलविदा कह गए।

जीवन की इस लंबी यात्रा में पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि विदाई का सिलसिला केवल कॉलेज तक सीमित नहीं रहा। नलबाड़ी जिले के माखीबाहा में हाई स्कूल के दिनों के मेरे सहपाठी शिव प्रसाद ठाकुरिया भी गंभीर बीमारी के कारण कम उम्र में ही चल बसे। इसके बाद हमारे इलाके के कई परिचित चेहरे भी समय से पहले स्मृतियों में बदल गए—श्रीमती बर्मन, गोपाल सील, भूपेन भट्टाचार्य, फटिक ठाकुरिया, महेश शर्मा, रंजीत पाठक, दिनेश डेका और डॉक्टर दिलीप डेका, जो लगभग दो दशक पहले पश्चिमी असम के अशांत दिनों में लापता हो गए थे।

लेकिन सबसे गहरी स्मृति बचपन के मित्र प्रह्लाद बर्मन की है। भोजकुची गाँव में स्कूल के दिनों की वह घटना आज भी मन में ताज़ा है। सातवीं कक्षा की परीक्षा से ठीक पहले दिल की बीमारी के कारण गुवाहाटी के एक अस्पताल में उसका निधन हो गया। जब हम उसे अंतिम बार देखने उसके घर पहुँचे, तो वह आँगन में शांत लेटा था और उसकी माँ तथा परिजन बिलख-बिलख कर रो रहे थे। उस समय उसके परिवार के पास उसकी कोई तस्वीर भी नहीं थी। बाद में एक समूह-चित्र से उसकी तस्वीर निकाली गई—जिसे तिहू के प्रसिद्ध फोटोग्राफर महेंद्र बरुआ ने खींचा था।

आज भी जब मैं अपने गाँव जाता हूँ, तो लगता है जैसे प्रह्लाद कहीं न कहीं आसपास ही हैं—हँसते-मुस्कुराते। समय भले ही आगे बढ़ता रहे, लेकिन दोस्ती और स्मृतियाँ कभी खत्म नहीं होतीं।
अलविदा कह गए दोस्त, पर यादों से कहाँ बिछुड़ते हैं।
जब तक हम फिर कभी, कहीं और न मिल जाएँ—अलविदा, मेरे दोस्तों!

(लेखक पूर्वी भारत के वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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