आतिशबाजी (Fireworks) की चमक और पटाखों का शोर किसकी खुशी के लिए? जानिए ध्वनि एवं वायु प्रदूषण (Sound & Air Pollution), पशु-पक्षियों पर इसके प्रभाव और घटती मानवीय संवेदनाओं पर विचारोत्तेजक आलेख।
आतिशबाजी (Fireworks) की दुनिया भी बड़ी विचित्र है। कोई आसमान में रंगों की चादर बिछाता है, तो कोई ऐसा धमाका करता है कि कानों में घंटियाँ बजने लगती हैं। बाजार में कम प्रदूषण (Pollution) फैलाने वाले पटाखों से लेकर अधिक प्रदूषण फैलाने वाले पटाखों तक, हल्की रोशनी से लेकर आँखों को चौंधिया देने वाली चमक और धीमी आवाज से लेकर कानों के पर्दों को चुनौती देने वाले धमाकों तक, हर तरह के विकल्प उपलब्ध हैं। पटाखा जितनी जोर से फूटता है, उसे छोड़ने वाले का सीना उतना ही चौड़ा हो जाता है! लगता है, खुशी का पैमाना अब मुस्कान नहीं, बल्कि धमाके की तीव्रता बन गया है।
पटाखों की चिंगारियाँ न जाने कितने बच्चों को झुलसा चुकी हैं, कितने लोगों को अस्पताल पहुँचा चुकी हैं और कितने परिवारों के उत्सव को मातम में बदल चुकी हैं। इनसे निकलने वाला धुआँ, सूक्ष्म कण और हानिकारक रासायनिक पदार्थ मनुष्य, पशु-पक्षियों तथा पर्यावरण के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा करते हैं। इसके बावजूद पटाखों का आकर्षण कम नहीं होता। लगता है, बारूद के साथ इनमें दिखावे का शौक और दूसरों से आगे निकलने की होड़ भी भरी होती है।
दशहरे पर रावण दहन हो, दीपावली का उत्सव, नए वर्ष का स्वागत, बारात का जुलूस, चुनावी जीत का जश्न या फिर पाकिस्तान के विरुद्ध किसी खेल में भारत की विजय-हर अवसर पर आतिशबाजी का चलन दिखाई देता है। ऐसा लगता है मानो ये अवसर खुशियाँ मनाने के साथ-साथ आतिशबाजी की प्रतियोगिता आयोजित करने के लिए भी बने हों। वर्ष में एक बार रात के ठीक बारह बजे होने वाली आतिशबाजी देखकर लगता है कि कैलेंडर बदलने के लिए भी विस्फोटक ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। नया साल आए या पुराना विदा हो, पटाखों की आवाज और रोशनी के बीच शुभकामनाएँ देने का चलन लगातार बढ़ता जा रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि पटाखे फोड़ने वाले को उनकी आवाज में संगीत सुनाई देता है और आनंद की अनुभूति होती है, जबकि पड़ोसी को उसी में कई बार प्रलय की आहट सुनाई देती है। धमाका करने वाला खुशी से झूमता है, बुजुर्ग करवटें बदलते रहते हैं, बीमार व्यक्ति बेचैन हो उठता है और छोटे बच्चे डरकर माँ की गोद में दुबक जाते हैं। लेकिन पटाखे छोड़ने वाले के उत्साह में कोई कमी नहीं आती। उसे अपने अधिकार का पूरा अहसास है, लेकिन दूसरों की परेशानी का शायद थोड़ा भी नहीं!
पटाखों के शोर से केवल मनुष्य ही परेशान नहीं होते। पशु-पक्षियों के लिए भी आतिशबाजी की तेज आवाज और अचानक फैलने वाली चमक भय तथा परेशानी का बड़ा कारण बनती है। कई पशु घबराकर सड़कों पर दौड़ पड़ते हैं और दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं। पक्षियों के लिए अचानक होने वाले तेज धमाके भय और दिशाभ्रम की स्थिति पैदा कर सकते हैं। उनके घोंसलों, विश्राम और सामान्य व्यवहार पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। जो जीव अपनी पीड़ा शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकते, उनकी चुप्पी को हम उनकी सहमति क्यों मान लेते हैं? क्या हमें सचमुच लगता है कि उन्हें भी हमारी तरह इस आतिशबाजी में आनंद आता होगा?
सवाल उठता है कि आखिर आतिशबाजी की आवाज और रोशनी का जादू सिर चढ़कर क्यों बोलता है? क्या खुशी तब तक अधूरी रहती है, जब तक उसकी गूँज पूरे मोहल्ले में न सुनाई दे? क्या अपनी प्रसन्नता प्रमाणित करने के लिए दूसरों की नींद, शांति और सुकून छीनना जरूरी है?
विडंबना देखिए कि हम एक ओर पर्यावरण संरक्षण के लिए प्रचार-प्रसार करते हैं, बच्चों को अच्छे संस्कार देने की बात करते हैं और देश में बढ़ते प्रदूषण पर चिंता जताते हैं, वहीं दूसरी ओर त्योहार आते ही सारी सीखों को छुट्टी पर भेज देते हैं। दीपावली पर घर का कोना-कोना साफ करते हैं, लेकिन अपने भीतर जमी असंवेदनशीलता की धूल साफ करना भूल जाते हैं। लगता है, हमारे संस्कार भी मौसमी हो गए हैं। सामान्य दिनों में शांति और सद्भाव की बातें होती हैं, लेकिन त्योहारों और विशेष अवसरों पर धुएँ और धमाकों की प्रतियोगिता शुरू हो जाती है!
पटाखों का शोर केवल कुछ क्षणों की परेशानी तक सीमित नहीं रहता। अत्यधिक ध्वनि से सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है, नींद में व्यवधान पड़ सकता है और तनाव तथा बेचैनी बढ़ सकती है। विशेष रूप से नवजात शिशुओं, छोटे बच्चों, बुजुर्गों, हृदय रोगियों और ध्वनि के प्रति संवेदनशील लोगों के लिए यह शोर अधिक कष्टदायक हो सकता है। दूसरी ओर, पटाखों से निकलने वाला धुआँ और सूक्ष्म कण वायु की गुणवत्ता खराब करते हैं। इनमें मौजूद रासायनिक पदार्थ वायु प्रदूषण बढ़ाते हैं तथा आँखों और श्वसन तंत्र से जुड़ी परेशानियाँ पैदा कर सकते हैं या पहले से मौजूद समस्याओं को गंभीर बना सकते हैं। पटाखों की चिंगारी कई बार सीधे अस्पताल का रास्ता भी दिखा देती है। यानी कुछ क्षणों के रोमांच की कीमत कई लोगों को अपने स्वास्थ्य से चुकानी पड़ सकती है।
कई बार पटाखे फोड़ना प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है। पड़ोसी ने दस पटाखे फोड़े तो हम बीस फोड़ेंगे, उसने हजार रुपये के पटाखे खरीदने का निश्चय किया है तो हम दस हजार के फोड़ेंगे। उसने आसमान रोशन किया तो हम आसमान सिर पर उठा लेंगे! अपनी खुशी को दूसरों से बड़ी दिखाने की इस होड़ में उत्सव का आनंद पीछे छूट जाता है और प्रदर्शन आगे आ जाता है। खुशी का यह कैसा प्रदर्शन है, जिसमें आनंद से अधिक शोर और उल्लास से अधिक प्रतिस्पर्धा दिखाई देती है?
इसका अर्थ यह नहीं कि त्योहारों की खुशियों पर पहरा लगा दिया जाए। सवाल उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि उसे मनाने के तरीके का है। दीपक जलाना, मिठाइयाँ बाँटना, परिवार और मित्रों के साथ समय बिताना, अपने बच्चों के साथ अनाथालयों के बच्चों में खुशियाँ बाँटना तथा जरूरतमंदों की सहायता करना भी प्रसन्नता व्यक्त करने के सुंदर माध्यम हो सकते हैं। दीपावली का दीपक बिना कान फोड़े रोशनी देता है और नए वर्ष की शुभकामना बिना किसी विस्फोट के भी दिल तक पहुँच सकती है। हरित पटाखों के विकल्प उपलब्ध होने के बावजूद यह समझना जरूरी है कि वे भी पूरी तरह प्रदूषणमुक्त नहीं होते। इसलिए सबसे बेहतर विकल्प अनावश्यक आतिशबाजी से बचना या उसे सांकेतिक और सीमित रखना ही है। इससे उत्सवों और खुशी के पलों को अधिक संवेदनशील, सुरक्षित तथा आनंददायी बनाया जा सकता है।
वैसे भी आवाज और रोशनी का आकर्षण तभी तक अच्छा है, जब तक वह आनंद देने वाला प्रकाश और उल्लास बना रहे। जब वही आवाज मनुष्य के लिए भय और पशु-पक्षियों के लिए आतंक का कारण बन जाए, तब वह उत्सव नहीं, असंवेदनशीलता का शोर बन जाती है।
हमें याद रखना होगा कि धमाके की आवाज और उसकी चमक कुछ ही सेकंड में समाप्त हो जाती है, लेकिन उनसे पैदा हुई चोट, भय और प्रदूषण के दुष्प्रभाव लंबे समय तक बने रह सकते हैं। सभ्यता का परिचय इस बात से नहीं मिलता कि हम आतिशबाजी पर कितना पैसा खर्च कर सकते हैं, उसकी आवाज कितनी दूर तक पहुँचा सकते हैं या कितनी देर तक वातावरण को गुंजायमान रख सकते हैं, बल्कि इससे मिलता है कि हम दूसरों की शांति, स्वास्थ्य और अधिकारों का कितना सम्मान करते हैं। सार्वजनिक स्थानों और रिहायशी क्षेत्रों में निर्धारित समय तथा ध्वनि और आतिशबाजी संबंधी नियमों का पालन करना भी हमारी नागरिक जिम्मेदारी है।
आखिर खुशी वह नहीं, जो पूरे मोहल्ले को जगाकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराए, बल्कि वह है जो किसी की नींद न छीने, किसी पशु को भयभीत न करे, किसी पक्षी को अपना आशियाना छोड़ने पर मजबूर न करे और किसी की साँसों में धुआँ न भरे।
पटाखे तो फूटकर समाप्त हो जाएँगे, लेकिन सवाल हमारे सामने रह जाएगा-
क्या हम सचमुच उत्सव मना रहे थे या अपनी असंवेदनशीलता का शक्ति-प्रदर्शन कर रहे थे?


