अदृश्य युद्ध की ओर India: DRDO की HPM एंटी-ड्रोन तकनीक कैसे बदल सकती है खेल

अदृश्य युद्ध की ओर India: DRDO की HPM एंटी-ड्रोन तकनीक कैसे बदल सकती है खेल
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India अब युद्ध के एक नए दौर की ओर बढ़ रहा है—जहां दुश्मन को गिराने के लिए न गोलियों की आवाज़ होगी, न मिसाइलों का धमाका, बल्कि एक अदृश्य ऊर्जा तरंग ही काफी होगी। इसी बदलाव के केंद्र में है हाई-पावर माइक्रोवेव (High-Power Microwave-HPM) एंटी-ड्रोन तकनीक, जिस पर Defence Research and Development Organisation तेज़ी से काम कर रहा है।

क्या है HPM तकनीक और क्यों है ज़रूरी

HPM एक तरह का डायरेक्टेड-एनर्जी वेपन है। यह किसी ड्रोन पर गोली या मिसाइल नहीं चलाता, बल्कि शक्तिशाली माइक्रोवेव तरंगें छोड़कर उसके इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम को फेल कर देता है।

इन तरंगों का असर:

  • ड्रोन का कंट्रोल सिस्टम बंद
  • GPS नेविगेशन ठप
  • कम्युनिकेशन लिंक टूट जाता है

नतीजा—ड्रोन हवा में ही बेकार होकर गिर जाता है।

इस तकनीक की सबसे बड़ी ताकत है कि यह एक साथ कई ड्रोन को खत्म कर सकती है, खासकर ड्रोन स्वार्म (झुंड) हमलों के खिलाफ।

खर्च का गणित: शुरुआत महंगी, लेकिन चलाना सस्ता

HPM सिस्टम बनाना आसान नहीं है—इसमें उन्नत तकनीक और भारी निवेश लगता है।

  • सिस्टम लागत: ऐसे सिस्टम बनाने में करोड़ों डॉलर तक खर्च हो सकते हैं
  • प्रति उपयोग लागत: एक बार तैयार होने के बाद, इसे चलाने का खर्च बेहद कम होता है—लगभग सिर्फ बिजली का खर्च

यानी जहां एक मिसाइल दागने में लाखों रुपये खर्च होते हैं, वहीं HPM सिस्टम लगातार और सस्ते में काम कर सकता है

रनिंग खर्च: बिना गोला-बारूद, बिना झंझट

HPM सिस्टम की खास बात यह है कि इसमें:

  • किसी तरह का गोला-बारूद नहीं चाहिए
  • बार-बार रीलोड करने की जरूरत नहीं
  • सिर्फ बिजली और कूलिंग सिस्टम की जरूरत होती है

इससे:

  • लंबे समय तक लगातार ऑपरेशन संभव
  • लॉजिस्टिक खर्च कम
  • त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता बढ़ती है

पोर्टेबिलिटी: अब लैब से मैदान तक

पहले ऐसे सिस्टम भारी और स्थिर होते थे, लेकिन अब इन्हें मोबाइल प्लेटफॉर्म पर विकसित किया जा रहा है।

  • ट्रक या कंटेनर पर लगाए जा सकते हैं
  • बॉर्डर, एयरबेस या संवेदनशील इलाकों में आसानी से तैनात
  • जरूरत के अनुसार तेजी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाए जा सकते हैं

Defence Research and Development Organisation भी इसी दिशा में काम कर रहा है—ताकि सिस्टम मैदान में तुरंत इस्तेमाल के लिए तैयार हो

सटीकता बनाम कवरेज: एक साथ कई निशाने

HPM पारंपरिक हथियारों की तरह एक लक्ष्य पर निशाना नहीं लगाता।

  • यह एक इलेक्ट्रोमैग्नेटिक ज़ोन बनाता है
  • इस ज़ोन में आने वाले कई ड्रोन एक साथ प्रभावित होते हैं
  • स्वार्म अटैक में बेहद प्रभावी

हालांकि:

  • यह लेजर की तरह बेहद सटीक नहीं होता
  • आसपास के इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम पर असर पड़ने का जोखिम रहता है

रेंज और भूमिका

HPM सिस्टम फिलहाल कम से मध्यम दूरी (करीब 1–5 किमी) के लिए डिजाइन किए जा रहे हैं।

इन्हें एयर डिफेंस की आखिरी सुरक्षा परत (last line of defence) माना जा रहा है, जहां यह:

  • रडार
  • मिसाइल सिस्टम
  • इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम

के साथ मिलकर काम करेगा।


मुख्य फायदे

  • एक साथ कई ड्रोन को निष्क्रिय करने की क्षमता
  • तुरंत असर (स्पीड ऑफ लाइट)
  • बिना आवाज़ और बिना विस्फोट
  • कम लागत में लगातार ऑपरेशन
  • कम कोलेटरल डैमेज

चुनौतियां अभी बाकी

यह तकनीक अभी पूरी तरह परिपक्व नहीं है। कुछ चुनौतियां हैं:

  • ज्यादा बिजली की जरूरत
  • मजबूत कूलिंग सिस्टम की आवश्यकता
  • आसपास के इलेक्ट्रॉनिक्स पर असर का खतरा
  • अभी परीक्षण और विकास चरण में

DRDO की रणनीति

Defence Research and Development Organisation HPM के साथ-साथ लेजर आधारित सिस्टम पर भी काम कर रहा है, ताकि भविष्य में एक मल्टी-लेयर एयर डिफेंस सिस्टम तैयार किया जा सके।

इसका उद्देश्य:

  • ड्रोन स्वार्म जैसे खतरों का मुकाबला
  • सैन्य ठिकानों और इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा
  • महंगे मिसाइल सिस्टम पर निर्भरता कम करना

निष्कर्ष: युद्ध का बदलता चेहरा

ड्रोन जितने सस्ते होते जा रहे हैं, उनसे बचाव उतना ही चुनौतीपूर्ण बनता जा रहा है। ऐसे में HPM तकनीक भारत के लिए एक स्मार्ट, किफायती और भविष्यवादी समाधान बनकर उभर रही है।

आने वाले समय में युद्ध सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि इलेक्ट्रॉनिक और ऊर्जा नियंत्रण से तय होंगे।

और शायद अगली लड़ाई में जीत उसी की होगी, जिसके पास सबसे ताकतवर—अदृश्य हथियार होगा।

Ashis Sinha

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