मांदर की थाप में गूंजता प्रकृति और रिश्तों का Karam Parab

मांदर की थाप में गूंजता प्रकृति और रिश्तों का Karam Parab
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मिथलेश दास

 

करम परब (Karam Parab) झारखंड की प्रकृति, लोकसंस्कृति, श्रम, भाई-बहन के प्रेम और सामुदायिक एकता का जीवंत पर्व है। जानिए मांदर, अखरा, जावा और करम वृक्ष की परंपरा।

 

झारखंड (Jharkhand) की मिट्टी में पर्व केवल उत्सव नहीं होते, बल्कि वे जीवन और प्रकृति के बीच सदियों पुराने रिश्ते की अभिव्यक्ति होते हैं। यहां के जंगल, पहाड़, नदियां, खेत और अखरा लोकजीवन के ऐसे अभिन्न हिस्से हैं, जिनके बिना झारखंड की सांस्कृतिक पहचान की कल्पना अधूरी है। इन्हीं परंपराओं के बीच करम परब प्रकृति, प्रेम, श्रम, भाई-बहन के स्नेह और सामुदायिक एकता का जीवंत उत्सव बनकर आता है।

भादो की हरियाली जब धरती को नई आभा देती है, खेतों में फसलें उम्मीद जगाती हैं और गांव की पगडंडियों पर मांदर की थाप सुनाई देने लगती है, तब महसूस होता है कि करम केवल एक पर्व नहीं, बल्कि झारखंड के लोकजीवन की धड़कन है। करम वृक्ष की डाल को श्रद्धा के साथ अखरा या पूजा-स्थल पर स्थापित करना प्रकृति के प्रति उस आदर का प्रतीक है, जिसे यहां के समाज ने पीढ़ियों से अपने संस्कारों में संजोकर रखा है।

जावा उठाने की परंपरा भी इसी जीवन-दर्शन से जुड़ी है। बालू या मिट्टी में बोए गए बीज जब अंकुर बनकर निकलते हैं, तो उनमें आने वाली फसल की उम्मीद के साथ जीवन की निरंतरता का संदेश भी छिपा होता है। एक छोटा-सा बीज मिट्टी, पानी और देखभाल पाकर जिस तरह हरा अंकुर बनता है, उसी तरह मनुष्य का जीवन भी प्रकृति के सहयोग से ही फलता-फूलता है। करम की परंपरा में कृषि और श्रम के सम्मान का भाव इसी कारण इतना गहरा है।

किसान जब खेत में बीज डालता है, तब वह केवल अन्न नहीं उगाता, बल्कि अपने परिवार और समाज के भविष्य की आशा भी धरती को सौंपता है। करम हमें याद दिलाता है कि हमारी थाली का अन्न खेत, किसान, वर्षा, जंगल और मिट्टी के सामूहिक सहयोग का परिणाम है।

करम परब से जुड़ी लोककथाओं में भी कर्म की महत्ता, प्रकृति के सम्मान और पारिवारिक-सामाजिक संबंधों की रक्षा का संदेश मिलता है। विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों में इन कथाओं का स्वरूप अलग हो सकता है, लेकिन उनका मूल भाव यही है कि प्रकृति और अपने सामाजिक दायित्वों से विमुख होकर स्थायी सुख की कल्पना नहीं की जा सकती। यही कारण है कि करम की डाल केवल पूजा की वस्तु नहीं रह जाती, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के सह-अस्तित्व का प्रतीक बन जाती है।

आज जब विकास की दौड़ में जंगलों पर दबाव बढ़ रहा है, जलस्रोत संकट में हैं और धरती को केवल संसाधन के रूप में देखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, तब करम की यह लोकचेतना पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

करम परब का दूसरा सुंदर पक्ष उसकी सामूहिकता है। मांदर की पहली थाप पड़ते ही गांव का अखरा मानो जीवंत हो उठता है। युवक-युवतियां, महिलाएं और बुजुर्ग जब एक साथ गीत और नृत्य में शामिल होते हैं, तो वहां व्यक्ति की पहचान पीछे छूट जाती है और समुदाय की पहचान सामने आती है। एक-दूसरे का हाथ थामकर लय में उठते कदम केवल नृत्य नहीं करते, बल्कि यह संदेश देते हैं कि समाज तभी आगे बढ़ सकता है, जब उसके कदम एक-दूसरे के साथ चलें।

झारखंड के पारंपरिक सामाजिक जीवन में अखरा इसी सामूहिकता का केंद्र रहा है। वह केवल नाचने-गाने का स्थान नहीं, बल्कि लोक-संस्कृति की पाठशाला भी रहा है, जहां एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को गीत, नृत्य, कथा, भाषा, व्यवहार और सामुदायिक जीवन के संस्कार सौंपती रही है।

करम गीतों में प्रेम है, विरह है, प्रकृति है, खेत-खलिहान हैं, भाई-बहन का स्नेह है और जीवन की कठिनाइयों के बीच भी उत्सव मनाने की अद्भुत जिजीविषा है। इन गीतों को केवल मनोरंजन समझना हमारी लोकविरासत को कम करके आंकना होगा। ये उन पीढ़ियों की स्मृतियां हैं, जिन्होंने लिखित पुस्तकों से अधिक अपने अनुभवों को गीतों और कथाओं के माध्यम से सुरक्षित रखा।

करम परब भाई-बहन के रिश्ते को भी विशेष आत्मीयता प्रदान करता है। बहनें अपने भाइयों के सुख, समृद्धि और मंगल की कामना करती हैं। लेकिन इस पर्व का सामाजिक दायरा केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहता। पूरा गांव एक परिवार की तरह दिखाई देता है। पूजा सामूहिक होती है, गीत सामूहिक होते हैं, नृत्य सामूहिक होता है और उल्लास भी साझा होता है। यही करम की सबसे बड़ी सामाजिक शक्ति है—वह ‘मैं’ को ‘हम’ में बदल देता है।

आज रोजगार, शिक्षा और बेहतर अवसरों की तलाश में गांवों के युवा दूर शहरों और महानगरों की ओर जा रहे हैं। परिवार छोटे होते जा रहे हैं और मोबाइल की स्क्रीन पर बढ़ती आभासी निकटता के बावजूद प्रत्यक्ष सामाजिक संबंधों की गर्माहट कई स्तरों पर कम हो रही है। ऐसे समय में करम जैसे पर्व सामाजिक रिश्तों की ऊष्मा लौटाने का अवसर देते हैं।

झारखंड के उरांव, मुंडा, संताल, हो सहित विभिन्न आदिवासी-मूलवासी और सदानी समुदायों में स्थानीय विविधताओं के साथ करम की परंपरा दिखाई देती है। भाषा, गीत, कथा और अनुष्ठान में अंतर हो सकता है, लेकिन प्रकृति, कर्म और सामूहिकता का मूल भाव सभी को एक साझा सांस्कृतिक सूत्र में जोड़ता है। यही विविधता झारखंड की ताकत भी है।

करम परब हमें यह भी सिखाता है कि सांस्कृतिक एकता के लिए सबका एक जैसा होना जरूरी नहीं है। अपनी-अपनी विशिष्टता को बचाए रखते हुए भी लोग एक साझा संस्कृति और संवेदना के साथ खड़े हो सकते हैं।

समय बदल रहा है और उसके साथ पर्व मनाने के तौर-तरीके भी बदल रहे हैं। शहरों में करम परब के बड़े आयोजन होने लगे हैं। आकर्षक मंच सज रहे हैं, आधुनिक प्रकाश व्यवस्था और ध्वनि-विस्तारक यंत्रों का उपयोग बढ़ा है और सोशल मीडिया ने करम परब को गांव के अखरा से निकालकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचा दिया है।

यह बदलाव अपने आप में गलत नहीं है। संस्कृति स्थिर नहीं रहती, वह समय के साथ नए रूप ग्रहण करती है। चिंता तब होती है, जब आधुनिकता का आकर्षण पर्व की मूल आत्मा पर हावी होने लगे। यदि मांदर की थाप तेज डीजे के शोर में दब जाए, पारंपरिक करम गीतों की जगह पूरी तरह फिल्मी गीत ले लें, अखरा की सामूहिकता मंचीय प्रदर्शन में बदल जाए और पर्व सामाजिक प्रतिष्ठा दिखाने की प्रतियोगिता बन जाए, तो हमें विचार करना होगा कि हम करम मना तो रहे हैं, लेकिन कहीं उसकी मूल आत्मा को पीछे तो नहीं छोड़ रहे।

आधुनिकता को अपनाते हुए परंपरा की आत्मा को बचाना आज सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। नई पीढ़ी को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि करम हमारा महत्वपूर्ण परब है। उसे यह भी समझाना होगा कि करम वृक्ष क्यों महत्वपूर्ण है, जावा क्यों उठाया जाता है, करम गीतों में कौन-से भाव निहित हैं और अखरा का सामाजिक महत्व क्या रहा है।

विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को स्थानीय संस्कृति के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। करम परब के अवसर पर लोकगीत, नृत्य, निबंध, परिचर्चा और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा सकते हैं। बुजुर्ग लोक कलाकारों और परंपरागत ज्ञान रखने वाले लोगों से नई पीढ़ी का संवाद कराया जाना चाहिए।

कुड़ुख, मुंडारी, संताली, हो, नागपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया सहित झारखंड की विभिन्न भाषाओं में प्रचलित करम गीतों और कथाओं का दस्तावेजीकरण भी जरूरी है। जो संस्कृति सदियों से स्मृति और वाणी के सहारे चली आ रही है, उसे अब लिखित, ऑडियो और वीडियो रूप में भी सुरक्षित करना समय की मांग है।

सोशल मीडिया इसमें सकारात्मक भूमिका निभा सकता है, बशर्ते उसका उपयोग केवल तस्वीरें और रील साझा करने तक सीमित न रहे। करम के गीत, लोककथाएं, वाद्ययंत्र, नृत्य शैलियां और उनके पीछे छिपे अर्थ भी डिजिटल माध्यमों पर दर्ज किए जाने चाहिए।

झारखंड की पहचान केवल कोयला, लौह अयस्क और खनिज संपदा से नहीं है। उसकी वास्तविक समृद्धि जंगलों, भाषाओं, लोकगीतों, मांदर, अखरा और उन परंपराओं में भी है, जिन्होंने यहां के समाज को सदियों से एक सूत्र में बांधकर रखा है। विकास की कोई भी अवधारणा यदि इस सांस्कृतिक संपदा को पीछे छोड़ देती है, तो वह झारखंड की संपूर्ण पहचान का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती।

आज करम परब का एक महत्वपूर्ण संदेश पर्यावरण संरक्षण से भी जुड़ता है। दुनिया जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, अनियमित वर्षा, जंगलों की कटाई, जलस्रोतों के संकट और जैव विविधता के नुकसान जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। झारखंड में भी खनन, औद्योगीकरण, शहरी विस्तार और जंगलों पर बढ़ते दबाव ने प्रकृति के संतुलन को कई स्तरों पर प्रभावित किया है।

ऐसे समय में उस लोकसंस्कृति की ओर लौटना जरूरी है, जिसने वृक्ष को पूजा के केंद्र में रखा और मनुष्य को प्रकृति का मालिक नहीं, बल्कि उसका सहभागी माना। हालांकि करम की सार्थकता केवल करम डाल की पूजा करने में नहीं है। पूजा तभी अर्थपूर्ण होगी, जब उसके साथ जंगल बचाने, पेड़ लगाने, जलस्रोतों को सुरक्षित रखने और मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने का संकल्प भी जुड़ा हो।

करम के अवसर पर गांव, विद्यालय, महाविद्यालय और सामाजिक संस्थाएं यदि स्थानीय प्रजातियों के पौधे लगाएं और उनकी देखभाल की जिम्मेदारी भी तय करें, तो लोकपरंपरा आधुनिक पर्यावरण संरक्षण का प्रभावी माध्यम बन सकती है।

करम हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का संदेश देता है, लेकिन जड़ों की ओर लौटने का अर्थ आधुनिकता से मुंह मोड़ना नहीं है। इसका अर्थ है—विकास और प्रकृति, तकनीक और परंपरा, व्यक्ति और समुदाय के बीच संतुलन स्थापित करना।

मांदर की थाप हमें सामूहिकता की लय सिखाती है। जावा के हरे अंकुर हमें उम्मीद देते हैं। करम वृक्ष प्रकृति के प्रति कृतज्ञता जगाता है और अखरा हमें बताता है कि उत्सव की वास्तविक खुशी अकेले नहीं, बल्कि साथ मिलकर जीने में है।

जिस करम डाल के सामने हम सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं, उसी भावना के साथ यदि एक पेड़ बचा सकें; जिस अखरा में हाथ से हाथ मिलाकर नाचते हैं, उसी भावना से समाज में एक-दूसरे का हाथ थाम सकें; और जिन गीतों में रिश्तों के मंगल की कामना करते हैं, उसी संवेदना को अपने व्यवहार में उतार सकें—तभी करम का वास्तविक अर्थ हमारे जीवन में उतर सकेगा।

विकास की अंधी दौड़ में यदि जंगल समाप्त हो जाएं, अखरे सूने पड़ जाएं, मांदर की थाप केवल सांस्कृतिक मंचों तक सिमट जाए और नई पीढ़ी करम गीतों को पहचानना भूल जाए, तो हमारे पास पर्व का नाम तो बचेगा, लेकिन उसकी आत्मा नहीं।

इसलिए करम को बचाना केवल एक त्योहार को बचाना नहीं है। यह झारखंड की प्रकृति, लोकस्मृति, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक अस्मिता को बचाने का भी प्रयास है।

करम की डाल जब तक हरी रहेगी, हमारी लोक-संस्कृति की जड़ें भी जीवित रहेंगी; और मांदर की थाप जब तक अखरा में गूंजती रहेगी, झारखंड की सांस्कृतिक आत्मा भी धड़कती रहेगी।

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