From Self-Interest to Civic Responsibility: The Need for a Fundamental Change in Mindset
प्रो. (डॉ.) मनमोहन प्रकाश, शिक्षाविद्
क्या हमारा क्षणिक स्वार्थ हमारे विवेक पर भारी पड़ रहा है? पढ़िए एक महत्वपूर्ण वैचारिक विमर्श।
मनुष्य को पृथ्वी का सबसे बुद्धिमान और विवेकशील प्राणी माना जाता है। उसके पास सही और गलत, सत्य और असत्य, न्याय और अन्याय में अंतर करने की अद्भुत क्षमता है। हमारा अनुभव, शिक्षा, सामाजिक मूल्य और कानून इस विवेक को और अधिक परिष्कृत करते हैं। इसके बावजूद एक कड़वा और विचित्र सत्य यह है कि हममें से अधिकांश लोग अनेक गंभीर गलतियाँ जानबूझकर करते हैं। हम भली-भाँति जानते हैं कि हमारा आचरण अनुचित है और इसके परिणाम आत्मघाती हो सकते हैं, फिर भी हम उन गलतियों को बार-बार दोहराते हैं।
आज के मशीनी और उपभोक्तावादी युग में यह केवल भारतीय समाज की समस्या नहीं है, बल्कि समूचे वैश्विक मानव समाज की एक सामान्य प्रवृत्ति बन चुकी है। हालांकि भारत जैसे विशाल, घनी आबादी वाले और सांस्कृतिक विविधताओं से परिपूर्ण देश में यह समस्या अधिक स्पष्ट और मुखर रूप से दिखाई देती है।
उदाहरण के लिए, हम सभी जानते हैं कि ध्वनि प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए कितना हानिकारक है। तेज हॉर्न, अनियंत्रित डीजे और लाउडस्पीकर का शोर बच्चों, वृद्धों, रोगियों और बेजुबान पशुओं को असहनीय पीड़ा देता है तथा विद्यार्थियों की एकाग्रता को भी भंग करता है। इसके बावजूद विवाह समारोहों, धार्मिक आयोजनों और राजनीतिक रैलियों में हम ध्वनि की गरिमा और कानूनी मर्यादाओं को ताक पर रख देते हैं।
यही स्थिति पर्यावरण के प्रति हमारे व्यवहार में भी दिखाई देती है। सड़कों पर कूड़ा फेंकना, नदियों, तालाबों और अन्य जलाशयों में प्लास्टिक, रासायनिक अपशिष्ट तथा पूजा-सामग्री प्रवाहित करना हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है। हम जानते हैं कि भूजल, कोयला और पेट्रोलियम जैसे प्राकृतिक संसाधन सीमित हैं, फिर भी उनका अंधाधुंध दोहन जारी है। ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन के खतरों को प्रतिदिन महसूस करने के बावजूद ‘विकास’ के नाम पर पेड़ों की कटाई निरंतर जारी है और समाज में इसके प्रति कोई व्यापक सामूहिक पश्चाताप दिखाई नहीं देता।
यातायात नियमों के प्रति हमारा रवैया तो और भी चिंताजनक है। लाल बत्ती पार करना, हेलमेट न पहनना, सीट बेल्ट से परहेज करना, गलत दिशा में वाहन चलाना तथा वाहन चलाते समय मोबाइल फोन का उपयोग करना मानो बहादुरी का प्रतीक बन गया है। प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों के माध्यम से पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने में भी हमें कोई संकोच नहीं होता। विडंबना यह है कि जब इन गलतियों के कारण कोई दुर्घटना घटती है, तब हम अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करने के बजाय व्यवस्था, प्रशासन या सड़कों को दोष देकर स्वयं को निर्दोष साबित करने का प्रयास करते हैं।
यही प्रवृत्ति हमारे सामाजिक और नैतिक जीवन में भी दिखाई देती है। झूठ बोलना, अनुचित लाभ उठाना, भ्रष्टाचार करना, कर चोरी करना, सार्वजनिक विमर्श में अभद्र भाषा का प्रयोग करना तथा धोखाधड़ी जैसे कृत्य अब सामान्य सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बनते जा रहे हैं। प्रश्न यह है कि जब हमारी चेतना स्वयं स्वीकार करती है कि यह सब गलत है, तो हमारा व्यवहार इसके विपरीत क्यों होता है?
मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों के अनुसार इसके पीछे चार प्रमुख कारण हैं।
1. तात्कालिक लाभ की प्रवृत्ति
मनुष्य का मस्तिष्क दूरगामी नुकसान की तुलना में तत्काल मिलने वाले लाभ को अधिक महत्व देता है। उदाहरण के लिए, लाल बत्ती तोड़कर दो मिनट बचा लेने का तात्कालिक लाभ उसे संभावित दुर्घटना के गंभीर खतरे से अधिक आकर्षक लगता है। इसी प्रकार पेड़ बेचकर प्राप्त होने वाला तत्काल आर्थिक लाभ भविष्य के पर्यावरणीय संकट पर भारी पड़ जाता है।
2. सामूहिक अनुकरण की मानसिकता
जब लोग देखते हैं कि समाज में बड़ी संख्या में लोग नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं और उन्हें कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है, तो वे भी उसी मार्ग पर चल पड़ते हैं। धीरे-धीरे यह सामूहिक अनाचार सामाजिक स्वीकृति प्राप्त कर लेता है। कचरा फेंकने वाला व्यक्ति अक्सर यह सोचकर स्वयं को उचित ठहराता है कि जब पूरी सड़क ही गंदी है, तो उसके द्वारा फेंके गए एक रैपर से क्या फर्क पड़ेगा।
3. दंड के भय का अभाव
जिन देशों में कानून का शासन कठोर, निष्पक्ष और प्रभावी होता है, वहाँ नागरिक नियम तोड़ने का साहस नहीं करते। इसके विपरीत जहाँ कानून का पालन ढीला हो या प्रभाव और पहुँच के बल पर बच निकलने की संभावना बनी रहे, वहाँ अपराधियों और नियम तोड़ने वालों का मनोबल बढ़ जाता है।
4. नैतिक शिक्षा और नागरिक बोध की कमी
जब शिक्षा व्यवस्था केवल डिग्री प्रदान करने और रोजगार प्राप्त करने का माध्यम बनकर रह जाती है, तब चरित्र निर्माण का मूल उद्देश्य पीछे छूट जाता है। परिणामस्वरूप हम तकनीकी रूप से दक्ष और साक्षर लोग तो तैयार कर लेते हैं, किंतु जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिकों का निर्माण नहीं कर पाते।
भारतीय दर्शन ने इस मानवीय भटकाव का उत्तर बहुत पहले ही दे दिया था। हमारे मनीषियों ने काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार को मानव की अधिकांश भूलों और पतनों का मूल कारण बताया है। आधुनिक मनोविज्ञान भी इस तथ्य की पुष्टि करता है कि आत्म-नियंत्रण की कमी और अनियंत्रित स्वार्थ मनुष्य को गलत निर्णय लेने के लिए प्रेरित करते हैं।
मेरा मानना है कि इस जटिल समस्या का समाधान केवल कठोर कानून बनाने या नए जुर्माने निर्धारित करने से नहीं होगा। इसके लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। व्यक्तिगत आचरण में सुधार, व्यापक सामाजिक जागरूकता, प्राथमिक स्तर से ही मूल्य-आधारित शिक्षा तथा बिना किसी भेदभाव के त्वरित और प्रभावी दंड व्यवस्था—ये सभी परिवर्तन के आवश्यक स्तंभ हैं।
जब तक हम यह आत्मसात नहीं करेंगे कि हमारी एक छोटी-सी लापरवाही समाज, पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को अंधकारमय बना सकती है, तब तक कोई सार्थक परिवर्तन संभव नहीं होगा।
वास्तव में, यक्ष प्रश्न यह नहीं है कि हम अनजाने में गलतियाँ क्यों करते हैं; वास्तविक प्रश्न यह है कि जब हम भली-भाँति जानते हैं कि सही क्या है, तब भी गलत करने का दुस्साहस हमारे भीतर कहाँ से आता है। जिस दिन हमारा आत्मविवेक हमारे क्षणिक स्वार्थ पर विजय प्राप्त कर लेगा, उसी दिन एक स्वस्थ, समृद्ध, उत्तरदायी और सभ्य समाज का पुनर्जन्म होगा।


