Tiger Hill का वो अजेय ‘टाइगर’: 19 की उम्र, 17 गोलियां और परमवीर चक्र की अमर गाथा

72 / 100 SEO Score

 

 

रुण कुमार
टाइगर हिल  (Tiger Hill)पर लहराता तिरंगा आज भी उस 19 वर्षीय ‘टाइगर’ की दहाड़ की गवाही देता है, जिसने हिंदुस्तान के गौरव को हिमालय की चोटियों से भी ऊँचा कर दिया।

 

भारतीय सैन्य इतिहास में कई ऐसी वीरगाथाएँ हैं जो रोंगटे खड़े कर देती हैं, लेकिन कारगिल युद्ध (Kargil War) के नायक ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव (Yogendra Singh Yadav) की कहानी केवल बहादुरी की मिसाल नहीं, बल्कि मृत्यु पर जीवन और भय पर कर्तव्य की विजय का जीवंत दस्तावेज है।
मात्र 19 वर्ष की आयु में, जब अधिकांश युवा अपने भविष्य के सपने संजो रहे होते हैं, तब योगेंद्र सिंह यादव ने टाइगर हिल की बर्फीली चोटियों पर अपने लहू से हिंदुस्तान की जीत की इबारत लिख दी थी।

मिट्टी की पुकार: बुलंदशहर से युद्धभूमि तक

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले का एक छोटा-सा गाँव है— औरंगाबाद अहीर। इसी मिट्टी में 10 मई 1980 को योगेंद्र सिंह यादव का जन्म हुआ। उनके पिता करन सिंह यादव कुमाऊँ रेजिमेंट के बहादुर सैनिक थे, जिन्होंने 1965 और 1971 के युद्धों में वीरता दिखाई थी।

जब दूसरे बच्चे परियों की कहानियाँ सुनते थे, तब योगेंद्र और उनके बड़े भाई जितेंद्र अपने पिता से युद्धभूमि की सच्ची दास्तानें सुना करते थे। उन्हीं प्रेरणादायक कहानियों ने दोनों भाइयों के भीतर देशभक्ति की लौ जला दी। योगेंद्र सिंह यादव ने अपने आदर्श भगत सिंह, सुभाष चंद्र बोस और रानी लक्ष्मीबाई जैसे महानायकों में खोजे। यही कारण था कि मात्र 16 वर्ष की आयु में वे भारतीय सेना की प्रतिष्ठित ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट में भर्ती हो गए।

कारगिल युद्ध (Kargil War): जब दुश्मन ने पीठ में छुरा घोंपा

वर्ष 1999 की शुरुआत में, जब पूरा देश शांति की उम्मीद कर रहा था, तब पाकिस्तान ने कारगिल, द्रास और बटालिक सेक्टर की ऊँची पहाड़ियों पर घुसपैठ कर दी। दुश्मन 16 से 18 हजार फीट की ऊँचाई पर बने उन बंकरों में जा बैठा, जिन्हें भारतीय सेना सर्दियों में खाली कर देती थी।

मई के पहले सप्ताह में जब सच्चाई सामने आई, तो पूरा देश स्तब्ध रह गया। दुश्मन श्रीनगर को लेह से जोड़ने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग NH-1D पर सीधी गोलाबारी कर रहा था। जवाब में भारत ने ‘ऑपरेशन विजय’ शुरू किया। यह युद्ध दुनिया के सबसे दुर्गम और ऊँचे इलाकों में लड़ा गया, जहाँ तापमान शून्य से 30-40 डिग्री नीचे तक चला जाता था।

Tiger Hill (टाइगर हिल): युद्ध का सबसे निर्णायक मोड़

कारगिल युद्ध में टाइगर हिल का सामरिक महत्व सबसे अधिक था। जो टाइगर हिल पर नियंत्रण रखता, वही पूरे क्षेत्र की गतिविधियों को नियंत्रित कर सकता था। 18 ग्रेनेडियर्स को इस चोटी को दुश्मन से मुक्त कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई।

कमांडिंग ऑफिसर कर्नल कुशल ठाकुर ने बटालियन को तीन हिस्सों— अल्फा, डेल्टा और ‘घातक’ कंपनी— में विभाजित किया। योगेंद्र सिंह यादव इसी ‘घातक’ कंपनी का हिस्सा थे, जिसका काम दुश्मन की पहली रक्षा पंक्ति को तोड़ना था।

25 सैनिकों के दल को टाइगर हिल की लगभग सीधी चढ़ाई करनी थी। पहाड़ इतना खड़ा था कि जरा-सी चूक हजारों फीट गहरी खाई में मौत बन सकती थी। योगेंद्र सिंह यादव ने स्वेच्छा से सबसे कठिन जिम्मेदारी ली— चट्टान पर चढ़कर रस्सी बाँधने की।

जैसे ही वे पहली चौकी के पास पहुँचे, दुश्मन को उनकी आहट मिल गई। ऊपर से मशीनगनों और ग्रेनेडों की बारिश शुरू हो गई। भारतीय सेना के कई जवान शहीद हो गए। अंततः केवल सात कमांडो आगे बढ़ पाए। कुछ देर बाद हुई भीषण मुठभेड़ में योगेंद्र सिंह यादव के छह साथी भी वीरगति को प्राप्त हो गए।

अकेला योद्धा: 17 गोलियां और अटूट संकल्प

अब टाइगर हिल की बर्फीली चोटी पर योगेंद्र सिंह यादव अकेले थे। उनके बाएँ हाथ में गोली लगी थी, जिससे हड्डी टूट गई थी और हाथ लगभग निष्क्रिय हो गया था। शरीर के विभिन्न हिस्सों में 17 गोलियाँ और छर्रे धँसे हुए थे।

लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने टूटे हाथ को बेल्ट से बाँध लिया ताकि वह बाधा न बने और कोहनी के बल रेंगते हुए दुश्मन के बंकर की ओर बढ़े। उन्होंने लगातार ग्रेनेड फेंके और अपनी AK-47 से 15-20 घुसपैठियों को ढेर कर दिया।

दुश्मन को लगा कि भारतीय सेना की पूरी कंपनी ने हमला कर दिया है। इसी भ्रम का लाभ उठाकर उन्होंने दूसरी और फिर तीसरी चौकी पर भी कब्जा कर लिया।

मौत के मुंह से लौटकर दी जीत की सूचना

गंभीर रूप से घायल अवस्था में जमीन पर पड़े योगेंद्र सिंह यादव ने पाकिस्तानी कमांडर को भारतीय चौकियों पर जवाबी हमला करने का आदेश देते सुना। वे जानते थे कि यदि यह सूचना नीचे नहीं पहुँची, तो भारतीय सेना को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

लगभग अचेत अवस्था में भी उन्होंने अपनी बची हुई शक्ति जुटाई और किसी तरह अपनी चौकी तक यह महत्वपूर्ण सूचना पहुँचाई। उनकी चेतावनी ने भारतीय सेना को सतर्क कर दिया और दुश्मन का जवाबी हमला नाकाम कर दिया गया। अंततः टाइगर हिल पर तिरंगा फहरा दिया गया।

अमर सम्मान: सबसे युवा परमवीर

शुरुआत में यह खबर फैली थी कि योगेंद्र सिंह यादव शहीद हो गए हैं, लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। उन्हें गंभीर हालत में अस्पताल पहुँचाया गया, जहाँ महीनों के उपचार के बाद उन्होंने मौत को भी मात दे दी।

भारत सरकार ने उनके अदम्य साहस और अतुलनीय वीरता के लिए उन्हें सेना के सर्वोच्च सम्मान ‘परमवीर चक्र’ से अलंकृत किया। मात्र 19 वर्ष की आयु में यह सम्मान पाने वाले वे सबसे युवा सैनिकों में शामिल हो गए।

आज ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव करोड़ों भारतीयों के लिए जीवित प्रेरणा हैं। उन्होंने सिद्ध कर दिया कि जब देश की आन, बान और शान की बात हो, तब एक भारतीय सैनिक यमराज को भी प्रतीक्षा करने पर मजबूर कर सकता है।

टाइगर हिल पर लहराता तिरंगा आज भी उस 19 वर्षीय ‘टाइगर’ की दहाड़ की गवाही देता है, जिसने हिंदुस्तान के गौरव को हिमालय की चोटियों से भी ऊँचा कर दिया।

“शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।”

पूरा राष्ट्र ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव की वीरता को शत-शत नमन करता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *