वॉशिंगटन: पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच Donald Trump ने ईरान को लेकर बेहद कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने साफ कहा है कि जब तक Strait of Hormuz पूरी तरह “खुला, सुरक्षित और निर्बाध” नहीं हो जाता, तब तक अमेरिकी सैन्य कार्रवाई जारी रहेगी। ट्रंप ने यहां तक चेतावनी दी कि जरूरत पड़ी तो ईरान को “स्टोन एज” (Stone Age) यानी पाषाण युग में धकेल दिया जाएगा।
ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर दावा किया कि ईरान की मौजूदा नेतृत्व ने अमेरिका से सीज़फायर की इच्छा जताई है। हालांकि उन्होंने साफ कर दिया कि किसी भी तरह का युद्धविराम तभी संभव है, जब होरमुज़ जलडमरूमध्य से वैश्विक शिपिंग सामान्य रूप से बहाल हो जाए।
‘WHEN WE FEEL THEY’VE BEEN SET BACK TO THE STONE AGE… WON’T BE ABLE TO MAKE NUKES…’
‘WE’LL LEAVE’ — Trump on Iran https://t.co/b9nRiQGPhe pic.twitter.com/abnLnx2wK1
— RT (@RT_com) March 31, 2026
होरमुज़ बना टकराव का केंद्र
होरमुज़ जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है, जहां से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल गुजरता है। इसके बंद होने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर असर पड़ा है और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेचैनी बढ़ गई है। ट्रंप ने इसे अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकता बताते हुए कहा कि यह मार्ग हर हाल में खुलना चाहिए।
ईरान का पलटवार, सीज़फायर से इनकार
वहीं, ईरान ने ट्रंप के दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने कहा कि तेहरान ने किसी भी तरह के सीज़फायर की मांग नहीं की है और वह दबाव में कोई फैसला नहीं करेगा। उन्होंने दो टूक कहा कि ईरान हर स्थिति में अपनी रक्षा करने के लिए तैयार है।
बैकचैनल बातचीत, लेकिन भरोसा नहीं
अराघची ने यह भी माना कि उनकी अमेरिका के मिडिल ईस्ट दूत Steve Witkoff से बातचीत होती रही है, लेकिन इसे औपचारिक वार्ता नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच भरोसे की स्थिति लगभग खत्म हो चुकी है, जिससे कूटनीतिक रास्ता मुश्किल बना हुआ है।
संघर्ष बढ़ने के संकेत
ईरान ने यह भी संकेत दिया है कि अगर जमीनी स्तर पर संघर्ष बढ़ता है, तो वह उसका भी जवाब देने के लिए तैयार है। मौजूदा हालात में दोनों पक्ष सैन्य और कूटनीतिक मोर्चे पर अलग-अलग संकेत दे रहे हैं, जिससे स्थिति और जटिल होती जा रही है।
संकट की जड़: होरमुज़
स्पष्ट है कि इस पूरे टकराव के केंद्र में होरमुज़ जलडमरूमध्य ही है। इसके खुलने या बंद रहने पर ही आगे की रणनीति तय होगी। जब तक इस अहम समुद्री रास्ते पर सहमति नहीं बनती, तब तक तनाव कम होने की संभावना भी बेहद कम दिख रही है।

