US 20 साल का न्यूक्लियर फ्रीज़ (Nuclear Freeze) चाहता था, Iran 5 साल पर अड़ा—आख़िरी मोड़ पर टूटी बातचीत

US 20 साल का न्यूक्लियर फ्रीज़ (Nuclear Freeze) चाहता था, Iran 5 साल पर अड़ा—आख़िरी मोड़ पर टूटी बातचीत
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नई दिल्ली: अमेरिका (US) और ईरान (Iran) के बीच चल रही हाई-लेवल बातचीत एक अहम मोड़ पर आकर टूट गई। दोनों देश लगभग समझौते के करीब पहुंच चुके थे, लेकिन यूरेनियम संवर्धन (Uranium Enrichment) पर रोक की अवधि को लेकर मतभेद इतना बड़ा था कि पूरी डील अटक गई।

समझौता करीब था, पर एक मुद्दा बना सबसे बड़ा रोड़ा

बातचीत से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, दोनों पक्ष कई अहम बिंदुओं—जैसे प्रतिबंधों में राहत और निगरानी व्यवस्था—पर सहमति के करीब थे। लेकिन असली टकराव इस बात पर हुआ कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को कितने समय तक सीमित रखेगा

अमेरिका ने 20 साल तक यूरेनियम संवर्धन पर रोक की मांग रखी, ताकि लंबे समय तक यह सुनिश्चित किया जा सके कि ईरान परमाणु हथियार की दिशा में आगे न बढ़ सके। वहीं ईरान सिर्फ 5 साल की रोक पर तैयार था। उसका कहना था कि इससे ज़्यादा अवधि उसकी संप्रभुता और तकनीकी विकास के अधिकार पर असर डालेगी।

अमेरिका की रणनीति: लंबी सुरक्षा की गारंटी

वॉशिंगटन के लिए यह प्रस्ताव सिर्फ एक शर्त नहीं, बल्कि लंबी अवधि की सुरक्षा रणनीति का हिस्सा था। अमेरिका चाहता था कि ईरान जल्दी से अपने परमाणु कार्यक्रम को फिर से शुरू न कर सके। इसके लिए कड़े निरीक्षण और मौजूदा संवर्धित यूरेनियम के नियंत्रण जैसी शर्तें भी शामिल थीं।

अमेरिका के नजरिए से 20 साल का समय एक व्यावहारिक समझौता था—पहले की स्थायी रोक की मांग से थोड़ा नरम, लेकिन फिर भी पर्याप्त सख्त।

ईरान की दलील: संप्रभुता से समझौता नहीं

ईरान ने साफ किया कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है और उस पर लंबे समय तक रोक लगाना उचित नहीं है। तेहरान का मानना था कि 5 साल का समय विश्वास बहाली के लिए पर्याप्त है और इससे उसकी राष्ट्रीय हितों की भी रक्षा होगी।

साथ ही, ईरान ने अपने संवर्धित यूरेनियम को देश से बाहर भेजने के प्रस्ताव का भी विरोध किया और निगरानी के तहत तकनीकी समाधान सुझाए।

लंबी बातचीत, लेकिन नतीजा शून्य

घंटों चली इस बातचीत को हाल के वर्षों की सबसे गंभीर कूटनीतिक कोशिशों में माना जा रहा था। दोनों पक्ष कई मुद्दों पर आगे बढ़े, लेकिन समयसीमा पर टकराव इतना गहरा था कि अंतिम सहमति नहीं बन पाई।

क्षेत्रीय तनाव बढ़ने की आशंका

बातचीत के टूटने के बाद मध्य-पूर्व में तनाव बढ़ने की आशंका फिर से गहराने लगी है। अब यह डर है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को तेज़ कर सकता है, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी आर्थिक या सैन्य दबाव बढ़ा सकते हैं।

आगे क्या?

हालांकि बातचीत फिलहाल रुकी है, लेकिन कूटनीतिक रास्ते अभी पूरी तरह बंद नहीं हुए हैं। मध्यस्थ देशों के जरिए फिर से बातचीत शुरू करने की कोशिशें जारी रह सकती हैं। लेकिन जब तक दोनों पक्ष रोक की अवधि जैसे मूल मुद्दे पर समझौता नहीं करते, तब तक स्थायी समाधान मुश्किल दिखता है।


निष्कर्ष

यह घटनाक्रम एक बार फिर दिखाता है कि अमेरिका और ईरान के बीच अविश्वास की खाई अब भी गहरी है। जहां अमेरिका लंबी सुरक्षा चाहता है, वहीं ईरान अपनी संप्रभुता से समझौता नहीं करना चाहता। जब तक यह संतुलन नहीं बनता, तब तक परमाणु समझौते की राह आसान नहीं होगी।

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