इस्लामाबाद में US–Iran शांति वार्ता विफल रही, जिससे पाकिस्तान की मध्यस्थता पर सवाल उठे और वैश्विक कूटनीति में नए तनाव सामने आए।
अमेरिका और ईरान के बीच बहुप्रतीक्षित शांति वार्ता पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में बिना किसी ठोस नतीजे के खत्म हो गई। इस विफलता के बाद अब एक बड़ा सवाल उठ रहा है—क्या पाकिस्तान इस तरह की जटिल और संवेदनशील बातचीत के लिए सही जगह और सही मध्यस्थ था?
करीब एक दिन तक चली गहन बातचीत के बावजूद दोनों देशों के बीच परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों में राहत और सामरिक नियंत्रण जैसे अहम मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई।
पाकिस्तान को क्यों चुना गया था?
पाकिस्तान ने खुद को एक तटस्थ मध्यस्थ के रूप में पेश किया था। उसके अमेरिका और ईरान दोनों के साथ कूटनीतिक संबंध हैं, और हाल के समय में उसने क्षेत्रीय शांति की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाने की कोशिश भी की है।
इस्लामाबाद ने बैकचैनल बातचीत के जरिए दोनों पक्षों को एक मंच पर लाने में सफलता जरूर हासिल की, लेकिन बातचीत को नतीजे तक पहुंचाना कहीं ज्यादा कठिन साबित हुआ।
मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की सीमाएं
इस वार्ता की विफलता ने यह साफ कर दिया कि पाकिस्तान की भूमिका सीमित थी।
न तो उसके पास ऐसा आर्थिक या राजनीतिक दबाव है जिससे वह अमेरिका या ईरान को समझौते के लिए मजबूर कर सके, और न ही वह किसी समझौते की गारंटी देने की स्थिति में है। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान सिर्फ एक मेजबान की भूमिका निभा पाया, निर्णायक मध्यस्थ की नहीं।
तटस्थता पर उठे सवाल
पाकिस्तान की क्षेत्रीय राजनीति भी इस पूरी प्रक्रिया में सवालों के घेरे में रही।
एक तरफ उसके ईरान के साथ संबंध हैं, वहीं दूसरी ओर सऊदी अरब जैसे देशों के साथ उसकी नजदीकियां भी जगजाहिर हैं, जो ईरान के प्रतिद्वंद्वी माने जाते हैं। ऐसे में ईरान की नजर में पाकिस्तान की तटस्थता पर संदेह होना स्वाभाविक था।
कूटनीति में केवल तटस्थ होना ही काफी नहीं होता, बल्कि तटस्थ दिखना भी उतना ही जरूरी होता है।
मूल मुद्दे ही बहुत गहरे थे
वार्ता की विफलता के पीछे सबसे बड़ी वजह दोनों देशों के बीच बुनियादी मतभेद थे।
अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर सख्त नियंत्रण स्वीकार करे, जबकि ईरान प्रतिबंधों में राहत और अपनी संप्रभुता की गारंटी चाहता है। इसके अलावा होर्मुज़ जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक क्षेत्र पर नियंत्रण का विवाद भी बड़ा मुद्दा बना हुआ है।
ये ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें किसी एक बैठक में सुलझाना आसान नहीं है।
तनाव और जल्दबाजी ने बिगाड़ा खेल
वार्ता के दौरान समय की कमी और बढ़ते तनाव ने भी स्थिति को और जटिल बना दिया।
एक ओर बातचीत चल रही थी, वहीं दूसरी ओर सैन्य कदमों और संभावित कार्रवाई की घोषणाएं माहौल को और अविश्वासपूर्ण बना रही थीं। ऐसे माहौल में किसी ठोस समझौते की उम्मीद करना मुश्किल था।
क्या पाकिस्तान सच में गलत विकल्प था?
इस सवाल का जवाब इतना सीधा नहीं है।
आलोचकों का मानना है कि पाकिस्तान के पास न तो पर्याप्त वैश्विक प्रभाव है और न ही वह पूरी तरह निष्पक्ष नजर आता है। वहीं, कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे हालात में बहुत कम देश थे जो दोनों पक्षों को एक साथ बैठा सकें—और पाकिस्तान ने कम से कम यह काम कर दिखाया।
निष्कर्ष
इस्लामाबाद में अमेरिका–ईरान वार्ता की विफलता यह बताती है कि शांति केवल बातचीत की जगह से तय नहीं होती, बल्कि दोनों पक्षों की मंशा और परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
पाकिस्तान ने एक मंच जरूर दिया, लेकिन दशकों पुराने अविश्वास, टकराव और रणनीतिक हितों के टकराव के सामने वह पर्याप्त नहीं था।
आखिरकार, यह विफलता सिर्फ पाकिस्तान की नहीं, बल्कि उस जटिल वैश्विक राजनीति की है जिसमें समझौते की जमीन अभी भी दूर नजर आती है।


