Myanmar के President की India यात्रा: आशा और निराशा के बीच संतुलन की तलाश

Myanmar के President की India यात्रा: आशा और निराशा के बीच संतुलन की तलाश
68 / 100 SEO Score

 

नव ठाकुरिया

म्यांमार (Myanmar) के राष्ट्रपति  (President) यू मिन आंग ह्लाइंग की भारत यात्रा ने दोनों देशों के बीच सुरक्षा, व्यापार और कनेक्टिविटी सहयोग को नई दिशा दी, लेकिन लोकतंत्र और मानवाधिकारों को लेकर विवाद भी खड़े कर दिए। यह यात्रा भारत के रणनीतिक हितों और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच संतुलन की परीक्षा बन गई है।

 

म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग की पांच दिवसीय आधिकारिक भारत यात्रा (30 मई से 3 जून, 2026) नई दिल्ली और विशेष रूप से भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रही। इस क्षेत्र को म्यांमार की सैन्य-समर्थित सरकार से सुरक्षा, कनेक्टिविटी, विकास और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे कई मोर्चों पर सकारात्मक आश्वासनों की उम्मीद थी। म्यांमार (पूर्व में बर्मा या ब्रह्मदेश) के शीर्ष सैन्य कमांडर से राष्ट्रपति बने ह्लाइंग की यह भारत की पहली आधिकारिक यात्रा थी। यह यात्रा अंतरराष्ट्रीय मान्यता और वैधता हासिल करने के उनके प्रयासों को भी दर्शाती है, क्योंकि दिसंबर 2025 और जनवरी 2026 में हुए विवादित आम चुनावों के बाद ही वे राष्ट्रपति पद तक पहुंचे हैं।

हालांकि, म्यांमार में लोकतंत्र की बहाली के लिए संघर्ष कर रहे कई संगठनों ने नई दिल्ली की आलोचना करते हुए कहा कि भारत ऐसे शासक की मेजबानी कर रहा है, जिस पर वर्षों से अपने ही नागरिकों के खिलाफ दमन, मानवाधिकार उल्लंघन और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के आरोप लगते रहे हैं।

भारत प्रवास के दौरान ह्लाइंग ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से मुलाकात की। उन्होंने नई दिल्ली में यूनियन ऑफ म्यांमार फेडरेशन ऑफ चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री (UMFCCI) और भारतीय उद्योग परिसंघ (CII) द्वारा आयोजित भारत-म्यांमार बिजनेस कॉन्क्लेव को संबोधित किया। सम्मेलन में दोनों देशों के उद्योग जगत के प्रतिनिधियों ने द्विपक्षीय व्यापार और निवेश के अवसरों को बढ़ाने पर चर्चा की।

ह्लाइंग ने नोएडा स्थित एनटीपीसी एनर्जी टेक्नोलॉजी रिसर्च एलायंस (NETRA) परिसर का भी दौरा किया, जहां उन्हें स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, नवीकरणीय ऊर्जा एकीकरण और ग्रिड लचीलापन से जुड़ी आधुनिक तकनीकों की जानकारी दी गई। इससे पहले उन्होंने बोधगया पहुंचकर महाबोधि मंदिर, महाबोधि मेडिटेशन सेंटर और सुजाता मंदिर में प्रार्थना अर्पित की।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी बैठक इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रही। दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा की तथा दोनों देशों के बीच बहुआयामी सहयोग को और मजबूत करने पर बल दिया। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि म्यांमार भारत की “नेबरहुड फर्स्ट”, “एक्ट ईस्ट” और “महासागर” (क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक एवं समग्र प्रगति) नीतियों के केंद्र में स्थित है।

बैठक के दौरान व्यापार और आर्थिक सहयोग, रक्षा एवं सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, विकास परियोजनाओं और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। दोनों पक्ष रुपये-क्यात भुगतान प्रणाली के माध्यम से व्यापार को और सुगम बनाने पर सहमत हुए तथा मई 2024 में इसकी शुरुआत के बाद से लेन-देन में आई निरंतर वृद्धि का स्वागत किया।

सुरक्षा सहयोग भी बातचीत का प्रमुख विषय रहा। दोनों देशों ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी प्रकार की भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए अपने-अपने क्षेत्रों का इस्तेमाल नहीं होने दिया जाएगा। ह्लाइंग ने आश्वासन दिया कि म्यांमार की धरती का उपयोग भारत विरोधी उग्रवादी संगठन नहीं कर पाएंगे। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत-म्यांमार सीमा के आसपास सक्रिय सशस्त्र समूहों और उनके खिलाफ सैन्य अभियानों के कारण उत्पन्न मानवीय संकट पर भी चिंता व्यक्त की। इन संघर्षों के चलते बड़ी संख्या में लोगों को भारतीय सीमा क्षेत्रों में शरण लेनी पड़ी है, जिससे स्थानीय आबादी प्रभावित हुई है।

दोनों पक्षों ने कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांजिट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट और भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय राजमार्ग परियोजना को शीघ्र पूरा करने के महत्व पर भी सहमति जताई। कलादान परियोजना का उद्देश्य रखाइन राज्य के सितवे बंदरगाह को भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र से जोड़ना है। हालांकि, राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा चुनौतियों के कारण यह परियोजना वर्षों से विलंब का सामना कर रही है। इसी प्रकार भारत-म्यांमार-थाईलैंड राजमार्ग परियोजना भी म्यांमार के विभिन्न क्षेत्रों में जारी संघर्षों के कारण आगे नहीं बढ़ पाई है।

प्रधानमंत्री मोदी ने म्यांमार में स्थायी शांति, राष्ट्रीय मेल-मिलाप और लोकतंत्र की बहाली की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने लोकतंत्र समर्थक नेता डॉ. आंग सान सू की की रिहाई का मुद्दा भी उठाया। सू की 1 फरवरी 2021 के सैन्य तख्तापलट के बाद से हिरासत में हैं। उस तख्तापलट का नेतृत्व स्वयं मिन आंग ह्लाइंग ने किया था, जिसके परिणामस्वरूप लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) सरकार को सत्ता से बेदखल कर दिया गया था।

नोबेल शांति पुरस्कार विजेता सू की वर्तमान में नेपीता में नजरबंद हैं और लंबी सजा काट रही हैं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, वे स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याओं से भी जूझ रही हैं। दूसरी ओर, अक्टूबर 2023 से कई जातीय सशस्त्र संगठनों और पीपुल्स डिफेंस फोर्सेज़ (PDF) द्वारा संयुक्त रूप से चलाए जा रहे अभियानों के कारण देश के बड़े हिस्से जुंटा-विरोधी बलों के नियंत्रण में आ गए हैं।

करीब 5.5 करोड़ की आबादी वाला म्यांमार आज गंभीर राजनीतिक और मानवीय संकट से गुजर रहा है। एक ओर सैन्य शासन के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर सेना द्वारा व्यापक दमन अभियान जारी है। हवाई हमलों, गांवों को जलाने, सामूहिक गिरफ्तारियों और मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। हजारों लोग मारे जा चुके हैं, लाखों विस्थापित हुए हैं और बड़ी संख्या में नागरिक जेलों में बंद हैं।

मीडिया भी सैन्य शासन के निशाने पर है। तख्तापलट के बाद से सैकड़ों पत्रकारों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से कई अब भी जेलों में बंद हैं। हाल ही में विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) ने चेतावनी दी कि म्यांमार में हर चार में से एक व्यक्ति गंभीर खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहा है।

इसी पृष्ठभूमि में ह्लाइंग की भारत यात्रा को लेकर लोकतंत्र समर्थक समूहों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। करेनी, करेन, काचिन, मोन, अराकान और अन्य समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले 20 जातीय क्रांतिकारी संगठनों, राजनीतिक दलों और नागरिक समाज समूहों के गठबंधन ने इस यात्रा की निंदा की।

म्यांमार में संघीय लोकतंत्र की स्थापना के लिए गठित स्ट्रैटेजिक इनिशिएटिव फोरम (SIF) ने कहा कि ह्लाइंग के पास कोई लोकतांत्रिक जनादेश नहीं है और उन्हें म्यांमार के वैध राष्ट्रपति के रूप में मान्यता नहीं दी जानी चाहिए। फोरम ने उन्हें “तख्तापलट के जरिए सत्ता हासिल करने वाला नेता” बताया और कहा कि देश में अंतिम स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव नवंबर 2020 में हुए थे, जिसमें एनएलडी को स्पष्ट जनादेश मिला था।

इसी तरह, सैन्य शासन के खिलाफ काम करने वाले संगठन जस्टिस फॉर म्यांमार (JFM) ने भी भारत सरकार की आलोचना की। संगठन का आरोप है कि नई दिल्ली अनजाने में म्यांमार के सैन्य शासन को वैधता प्रदान कर रही है। JFM ने ह्लाइंग को युद्ध अपराधों का आरोपी बताते हुए कहा कि वे म्यांमार के लोगों के खिलाफ भय और दमन का वातावरण बनाए हुए हैं।

निर्वासित नेशनल यूनिटी गवर्नमेंट (NUG) ने भी ह्लाइंग की भारत यात्रा पर कड़ी आपत्ति जताई। लोकतंत्र समर्थक समूहों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को सैन्य शासन के बजाय उन शक्तियों का समर्थन करना चाहिए जो म्यांमार में संघीय लोकतंत्र, मानवाधिकार और राजनीतिक स्थिरता की बहाली के लिए संघर्ष कर रही हैं।

मिन आंग ह्लाइंग की भारत यात्रा ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि नई दिल्ली को अपने सामरिक हितों और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन बनाना होगा। एक ओर भारत के लिए म्यांमार पूर्वोत्तर की सुरक्षा, क्षेत्रीय संपर्क और एक्ट ईस्ट नीति की सफलता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, वहीं दूसरी ओर म्यांमार के भीतर लोकतंत्र, मानवाधिकार और राजनीतिक वैधता से जुड़े प्रश्न लगातार अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बने हुए हैं। यही कारण है कि यह यात्रा आशा और निराशा के बीच संतुलन तलाशने की एक जटिल कूटनीतिक कवायद के रूप में देखी जा रही है।

(लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार, स्तंभकार और मीडिया विश्लेषक हैं।)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *