नेहरू-गांधी परिवार, चुनावी हार और संगठनात्मक संकट: क्यों लगातार गिर रही है कांग्रेस?
कभी देश की सबसे ताकतवर पार्टी रही कांग्रेस (Congress)आज राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। जानिए 206 सीटों से गिरकर सीमित राज्यों तक सिमटने, गांधी परिवार पर निर्भरता, संगठनात्मक कमजोरी और चुनावी हारों की पूरी कहानी।
कभी भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा और सबसे प्रभावशाली चेहरा रही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Congress) आज अपने अस्तित्व और प्रासंगिकता की लड़ाई लड़ती दिखाई दे रही है। आज़ादी की लड़ाई का नेतृत्व करने वाली और दशकों तक देश की सत्ता पर काबिज रहने वाली कांग्रेस पिछले दो दशकों में लगातार कमजोर होती गई है।
एक समय ऐसा था जब देश के अधिकांश राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थीं और केंद्र की राजनीति उसी के इर्द-गिर्द घूमती थी। लेकिन अब हालात ऐसे हैं कि पार्टी कुछ राज्यों तक सिमटकर रह गई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के तेज़ उभार, क्षेत्रीय दलों की मजबूती और संगठनात्मक कमजोरियों ने कांग्रेस की राजनीतिक ज़मीन को लगातार कमजोर किया है।
लोकसभा में कांग्रेस का गिरता ग्राफ
कांग्रेस की गिरती ताकत को लोकसभा चुनावों के आंकड़ों से साफ समझा जा सकता है।
| लोकसभा चुनाव वर्ष | कांग्रेस की सीटें |
|---|---|
| 2004 | 145 |
| 2009 | 206 |
| 2014 | 44 |
| 2019 | 52 |
| 2024 | 99 |
2009 में यूपीए सरकार की वापसी के साथ कांग्रेस ने 206 सीटें जीतकर बड़ी सफलता हासिल की थी। उस समय ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस लंबे समय तक राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत बनी रहेगी।
लेकिन सिर्फ पांच साल बाद, 2014 में पार्टी 44 सीटों पर सिमट गई। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में कांग्रेस का सबसे खराब प्रदर्शन था। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने विकास, राष्ट्रवाद और भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के सहारे कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया।
हालांकि 2024 में कांग्रेस ने कुछ सुधार करते हुए 99 सीटें हासिल कीं, लेकिन पार्टी अब भी अपने पुराने राजनीतिक प्रभाव से काफी दूर दिखाई देती है।
2026 में कांग्रेस की स्थिति
मई 2026 तक कांग्रेस सीधे तौर पर केवल 4 राज्यों में सत्ता में है, जबकि 3 अन्य राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में गठबंधन सरकार का हिस्सा है।
कांग्रेस शासित राज्य
| राज्य | मुख्यमंत्री |
|---|---|
| कर्नाटक | सिद्धारमैया |
| तेलंगाना | ए. रेवंत रेड्डी |
| हिमाचल प्रदेश | सुखविंदर सिंह सुक्खू |
| केरल | वी. डी. सतीशन |
2026 में कांग्रेस ने केरल में वापसी करते हुए वाम मोर्चे की 10 साल पुरानी सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया।
गठबंधन या समर्थित सरकारें
| state / केंद्रशासित प्रदेश | प्रमुख दल | कांग्रेस की भूमिका |
|---|---|---|
| झारखंड | झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) | गठबंधन सहयोगी |
| तमिलनाडु | DMK गठबंधन | सहयोगी दल |
| जम्मू-कश्मीर | JKNC गठबंधन | समर्थन सहयोगी |
यानी आज कांग्रेस केवल 7 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता का हिस्सा है। यह उस पार्टी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है जिसने कभी देश के अधिकांश हिस्सों पर शासन किया था।
आखिर कैसे कमजोर होती गई कांग्रेस?
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि कांग्रेस का पतन अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे कई कारण रहे।
यूपीए-2 सरकार के दौरान 2G स्पेक्ट्रम और कोयला आवंटन जैसे कथित घोटालों ने कांग्रेस की छवि को नुकसान पहुंचाया। दूसरी ओर बीजेपी ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बेहद मजबूत, तकनीक आधारित और बूथ स्तर तक फैला संगठन तैयार कर लिया।
कांग्रेस युवा मतदाताओं और नए राजनीतिक विमर्श से जुड़ने में भी पीछे रह गई। कई राज्यों में क्षेत्रीय दलों ने कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक पर कब्जा जमा लिया।
उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और आंध्र प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में कांग्रेस धीरे-धीरे हाशिये पर चली गई।
गांधी परिवार पर निर्भरता और नेतृत्व संकट
कांग्रेस के लगातार कमजोर होने के साथ-साथ पार्टी की नेतृत्व संरचना पर भी सवाल उठते रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस लंबे समय से नेहरू-गांधी परिवार केंद्रित राजनीति पर अत्यधिक निर्भर रही है, जिसके कारण पार्टी में मजबूत क्षेत्रीय और दूसरी पंक्ति का नेतृत्व अपेक्षित रूप से विकसित नहीं हो सका।
राहुल गांधी पिछले कई वर्षों से कांग्रेस का प्रमुख चेहरा रहे हैं। उनके समर्थक उन्हें सरकार के खिलाफ मुखर विपक्षी नेता मानते हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि वे लगातार चुनावी जीत दिलाने वाला प्रभावशाली राजनीतिक मॉडल तैयार नहीं कर पाए। उनकी कुछ राजनीतिक टिप्पणियों, विदेशों में दिए गए बयानों और संस्थागत मुद्दों पर उठाए गए सवालों ने भी राजनीतिक बहस को जन्म दिया और कई बार पार्टी को रक्षात्मक स्थिति में ला खड़ा किया।
हालांकि कांग्रेस समर्थकों का कहना है कि लोकतंत्र में सरकार और संस्थाओं पर सवाल उठाना विपक्ष की जिम्मेदारी होती है। ‘भारत जोड़ो यात्रा’ जैसी पहलों के जरिए राहुल गांधी ने पार्टी कार्यकर्ताओं और कुछ वर्गों के बीच नई राजनीतिक ऊर्जा पैदा करने की कोशिश भी की।
पिछले कुछ वर्षों में कई वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी छोड़ी और नेतृत्व पर फैसले लेने में कमजोरी तथा संगठनात्मक ढीलापन का आरोप लगाया। राजस्थान, पंजाब और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में अंदरूनी गुटबाजी ने भी पार्टी को काफी नुकसान पहुंचाया।
फिर भी, 2014 के बाद लगातार चुनावी गिरावट ने कांग्रेस के भीतर नेतृत्व परिवर्तन, संगठनात्मक सुधार और नए राजनीतिक विज़न को लेकर बहस को तेज कर दिया है। कई वरिष्ठ नेताओं और राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि पार्टी को भविष्य में अधिक सामूहिक नेतृत्व, मजबूत क्षेत्रीय चेहरों और बेहतर संगठनात्मक ढांचे की जरूरत होगी।
कांग्रेस के पतन के पीछे बताए जाने वाले प्रमुख कारण
राजनीतिक विश्लेषकों और चुनावी विशेषज्ञों के अनुसार कांग्रेस के लगातार कमजोर होने के पीछे कई कारण माने जाते हैं:
- गांधी परिवार पर अत्यधिक निर्भरता
- मजबूत क्षेत्रीय नेतृत्व का अभाव
- संगठनात्मक कमजोरी और बूथ स्तर पर कमजोर पकड़
- लगातार चुनावी हार से कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरना
- कई राज्यों में गुटबाजी और आंतरिक संघर्ष
- युवा और नए मतदाताओं से कमजोर जुड़ाव
- क्षेत्रीय दलों के उभार से पारंपरिक वोट बैंक का खिसकना
- बदलते राजनीतिक नैरेटिव के साथ तालमेल बैठाने में कठिनाई
- डिजिटल और सोशल मीडिया राजनीति में अपेक्षाकृत कमजोर उपस्थिति
- राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट और आक्रामक राजनीतिक संदेश की कमी
- बड़े राज्यों में संगठन का लगातार कमजोर होना
- पार्टी छोड़कर कई वरिष्ठ नेताओं का दूसरे दलों में जाना
इन्हीं तमाम कारणों ने मिलकर कांग्रेस को उस स्थिति में ला खड़ा किया है, जहां पार्टी अब केवल सत्ता वापसी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति में अपनी स्थायी प्रासंगिकता बनाए रखने की चुनौती का सामना कर रही है।
क्या कांग्रेस वापसी कर सकती है?
हालांकि कांग्रेस कमजोर हुई है, लेकिन वह अब भी देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी है और उसकी ऐतिहासिक विरासत बेहद बड़ी है।
‘भारत जोड़ो यात्रा’ जैसे अभियानों ने पार्टी को कुछ हद तक नई ऊर्जा दी है और कार्यकर्ताओं में उत्साह पैदा किया है। लेकिन राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि कांग्रेस की वापसी के लिए केवल भावनात्मक राजनीति काफी नहीं होगी।
पार्टी को संगठन मजबूत करना होगा, नए नेतृत्व को आगे लाना होगा, ज़मीनी स्तर पर फिर से पकड़ बनानी होगी और बीजेपी के मुकाबले एक स्पष्ट राजनीतिक नैरेटिव तैयार करना होगा।
फिलहाल भारतीय राजनीति की सबसे पुरानी पार्टी सत्ता की नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाने की लड़ाई लड़ती नजर आ रही है।


