Eastern India में तेज़ हुआ भगवा प्रभाव (Saffron Wave), Foreign Media की बढ़ी बेचैनी

Eastern India में तेज़ हुआ भगवा प्रभाव (Saffron Wave), Foreign Media की बढ़ी बेचैनी
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नव ठाकुरिया

पूर्वी भारत  (Eastern India) में भाजपा  (BJP)और भगवा  (Saffron) राजनीति के तेज़ उभार ने विदेशी मीडिया  (Foreign Media)का ध्यान खींचा है। असम और पश्चिम बंगाल में भाजपा की बढ़ती ताकत, कांग्रेस की गिरती स्थिति, UCC और बांग्लादेशी घुसपैठ  (Bangladesh Infiltration) जैसे मुद्दों पर विस्तृत विश्लेषण।

हाल के वर्षों में पूर्वी भारत (Eastern India) में जिस तेज़ी से भगवा (Saffron) राजनीति का विस्तार हुआ है, वैसा परिदृश्य पहले कभी देखने को नहीं मिला। इसकी सबसे बड़ी पुष्टि पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के उल्लेखनीय प्रदर्शन और असम में उसकी लगातार तीसरी चुनावी जीत से हुई, जहाँ राष्ट्रवादी दल ने अपनी राजनीतिक पकड़ और मजबूत कर ली।

हालिया विधानसभा चुनावों से पहले चुनावी विश्लेषकों और राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने कई अनुमान लगाए थे। कुछ का मानना था कि भाजपा-नीत गठबंधन असम में सत्ता बरकरार रखते हुए 126 सदस्यीय विधानसभा में सौ से अधिक सीटें हासिल कर सकता है। वहीं पश्चिम Bengal की 294 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के 200 सीटों का आँकड़ा पार करने और सत्तारूढ़ अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस को कड़ी चुनौती देने की संभावनाओं ने राजनीतिक हलकों में व्यापक चर्चा पैदा कर दी थी।

4 मई को हुई मतगणना भाजपा के लिए उत्साहजनक साबित हुई। भाजपा ने अकेले 82 सीटों पर जीत दर्ज की, जबकि उसके सहयोगी असम गण परिषद (एजीपी) और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) को 10-10 सीटें मिलीं। इसके विपरीत कांग्रेस और उसके सहयोगी दल मिलकर महज 21 सीटों तक सिमट गए। गौरव गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस को केवल 19 सीटों से संतोष करना पड़ा।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने भाजपा की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विधानसभा चुनावों से पहले संगठन के शताब्दी वर्ष के अवसर पर असम में हजारों ‘हिंदू सम्मेलन’ आयोजित किए गए। भाजपा के एक बड़े राजनीतिक दल के रूप में उभरने से बहुत पहले ही संघ इस क्षेत्र में अपनी मजबूत जड़ें जमा चुका था।

संघ के स्वयंसेवकों ने घर-घर संपर्क, जनसभाओं और सोशल मीडिया अभियानों के माध्यम से लोगों को अधिकाधिक मतदान के लिए प्रेरित किया। हिंदू मतदाताओं को खुलकर अपने मताधिकार का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया गया। राज्य में 85.91 प्रतिशत मतदान को भी भगवा उम्मीदवारों के पक्ष में महत्वपूर्ण कारक माना जा रहा है।

हालाँकि, कई विदेशी मीडिया संस्थानों ने इन चुनावी परिणामों को आलोचनात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया। न्यूयॉर्क टाइम्स ने बंगाल में भाजपा के उभार को “हिंदू राष्ट्रवाद का खतरनाक विस्तार” बताया, जबकि बीबीसी ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वाकांक्षी रणनीति के तहत पूर्वी भारत में “भगवा दल की लंबी यात्रा” के रूप में चित्रित किया।

दूसरी ओर, द गार्डियन ने विपक्ष के कमजोर पड़ने पर चिंता व्यक्त की, जबकि अल जज़ीरा ने इसे “भारतीय लोकतंत्र के क्षरण” से जोड़कर देखा। ले मोंदे ने पूर्वी भारत में भाजपा के उभार को भारतीय धर्मनिरपेक्षता के लिए चुनौती बताया, वहीं सीएनएन ने इसे विकास की बजाय ध्रुवीकरण की राजनीति की जीत के रूप में पेश किया।

हालाँकि, द वॉशिंगटन पोस्ट ने टिप्पणी की कि यह जीत 2029 के राष्ट्रीय चुनावों से पहले नरेंद्र मोदी की राजनीतिक स्थिति को और अधिक मजबूत करेगी। समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने भी माना कि भाजपा को हिंदू-केंद्रित प्रचार अभियान का स्पष्ट लाभ मिला।

बांग्लादेश के कई समाचार पत्रों ने भी स्वीकार किया कि चुनाव परिणाम सत्तारूढ़ भगवा दल की स्थिति को और मजबूत करेंगे। द डेली स्टार और ढाका ट्रिब्यून ने आशंका जताई कि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों से पहले निर्वाचन आयोग द्वारा किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान का असर मतदान पर पड़ा, जिसके दौरान लाखों मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए। इन मतदाताओं को ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस का पारंपरिक समर्थक माना जाता था।

विदेशी मीडिया ने ममता बनर्जी को नरेंद्र मोदी और भाजपा के धार्मिक राष्ट्रवादी एजेंडे की सबसे मुखर आलोचकों में से एक के रूप में प्रस्तुत किया। उन्हें आशंका थी कि बंगाल में भाजपा की सफलता “हिंदू-प्रथम राजनीति” को और अधिक बल देगी, जिसकी झलक 2014 में केंद्र में भाजपा सरकार बनने के बाद लगातार दिखाई देती रही है।

हालिया विधानसभा चुनावों की श्रृंखला में तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी में भी मतदान हुआ। भाजपा ने इन राज्यों में भी अपने मत प्रतिशत में वृद्धि दर्ज की। इसके विपरीत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थिति तमिलनाडु और केरल को छोड़कर अधिकांश क्षेत्रों में कमजोर होती दिखाई दी। वामपंथी दलों को भी करारी हार का सामना करना पड़ा और वर्तमान में देश के किसी भी राज्य में उनकी विचारधारा वाली सरकार शेष नहीं बची है। अब 28 राज्यों में से केवल सात राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें रह गई हैं।

अब लाखों भाजपा समर्थकों की निगाहें कोलकाता और गुवाहाटी की नई सरकारों की उन पहलों पर टिकी हैं, जिनका मुख्य जोर सतत विकास, जनकल्याण और बांग्लादेश से होने वाली अवैध घुसपैठ को रोकने पर है। पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने भारत-बांग्लादेश सीमा पर बाड़ लगाने के लिए आवश्यक भूमि उपलब्ध कराने की प्रक्रिया तेज़ करने की घोषणा की — एक ऐसा मुद्दा, जिसका तृणमूल कांग्रेस सरकार लंबे समय तक विरोध करती रही थी।

इसी बीच असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने भी अपने चुनावी वादों को पूरा करने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण फैसले लिए। इनमें बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों से स्थानीय आबादी की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उपाय भी शामिल हैं। अपनी पहली मंत्रिमंडल बैठक में हिमंत सरकार ने ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ (समान नागरिक संहिता) के मसौदा विधेयक को मंजूरी दे दी, जिसे 21, 22, 25 और 26 मई 2026 को होने वाले विधानसभा सत्र में पेश किए जाने की तैयारी है।

हालाँकि, प्रस्तावित कानून के दायरे से अनुसूचित जनजातियों — चाहे वे पहाड़ी क्षेत्रों की हों या मैदानी इलाकों की — को बाहर रखा जाएगा। पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों, सामाजिक प्रथाओं और अनुष्ठानों को भी इससे अलग रखने की बात कही गई है।

माना जा रहा है कि समान नागरिक संहिता मुख्य रूप से विवाह की न्यूनतम आयु, बहुविवाह पर रोक, पैतृक संपत्ति में बेटियों के समान अधिकार और ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ जैसे मुद्दों को कवर करेगी। भाजपा-नीत गठबंधन को मिले भारी जनादेश को ‘संकल्प पत्र 2026’ पर जनता की मुहर बताते हुए मंत्रिमंडल ने अगले पाँच वर्षों में विभिन्न सरकारी विभागों में दो लाख युवाओं को रोजगार देने का भी संकल्प लिया है।

विदेशी मुद्रा की बचत को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर प्रतिक्रिया देते हुए असम सरकार ने कुछ सख्त दिशा-निर्देश लागू करने की योजना बनाई है। इसके तहत अगले छह महीनों तक नए सरकारी वाहन नहीं खरीदे जाएंगे। चिकित्सा कारणों को छोड़कर अधिकारियों के विदेश दौरों पर रोक रहेगी, जबकि राज्यपाल, मुख्यमंत्री, मंत्रियों और अधिकारियों के काफिलों में वाहनों की संख्या भी सीमित की जाएगी।

इसके साथ ही सरकारी विभागों और संस्थानों के लिए केवल इलेक्ट्रिक वाहन ही किराये पर लिए जाएंगे। मंत्रिमंडल ने यह भी निर्णय लिया कि भारत रत्न डॉ. भूपेन हजारिका की जन्म शताब्दी का समापन समारोह आगामी 8 सितंबर को राजधानी स्थित भारत मंडपम में आयोजित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त गुवाहाटी के श्रीमंत शंकरदेव कलाक्षेत्र परिसर में डॉ. भूपेन हजारिका को समर्पित एक संग्रहालय भी स्थापित किया जाएगा।

(लेखक पूर्वी भारत के वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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