भारतीय राजनीति में एक बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव दर्ज हुआ है। करीब पांच दशक बाद देश का कोई भी राज्य अब वामपंथी (Left) शासन के अधीन नहीं है। केरल (Kerala) विधानसभा चुनाव 2026 में CPI(M) नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) की हार के साथ भारत में वामपंथ की आखिरी सरकार भी चली गई।
चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, केरल की 140 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया। कांग्रेस को 50 सीटें मिलीं, जबकि उसकी सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने 18 सीटें जीतीं। दूसरी ओर CPI(M) 31 सीटों पर सिमट गई और CPI को 14 सीटें मिलीं।
इसके साथ ही 1977 से लगातार किसी न किसी राज्य में बनी हुई वामपंथी सत्ता का सिलसिला समाप्त हो गया।
कभी भारतीय राजनीति की सबसे ताकतवर धुरी था वामपंथ
एक समय ऐसा था जब वामपंथ भारतीय राजनीति की सबसे प्रभावशाली ताकतों में गिना जाता था।
पश्चिम बंगाल में 1977 से 2011 तक लगातार 34 वर्षों तक लेफ्ट फ्रंट की सरकार रही, जिसे दुनिया की सबसे लंबी लोकतांत्रिक कम्युनिस्ट सरकारों में माना जाता है। त्रिपुरा में भी वामपंथ ने 1993 से 2018 तक 25 वर्षों तक शासन किया। वहीं केरल लंबे समय तक वामपंथ की वैचारिक और संगठनात्मक राजधानी बना रहा।
भूमि सुधार, मजदूर अधिकार, ट्रेड यूनियन राजनीति, सार्वजनिक क्षेत्र और कल्याणकारी नीतियों जैसे मुद्दों पर वाम दलों का राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा प्रभाव था। विश्वविद्यालयों, किसान संगठनों और बौद्धिक जगत में भी उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती थी।
लेकिन पश्चिम बंगाल से शुरू हुआ पतन धीरे-धीरे पूरे देश में फैल गया।
बंगाल के आंकड़े बताते हैं कितना सिमट गया वामपंथ
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजे वामपंथ के पतन की सबसे बड़ी तस्वीर पेश करते हैं।
चुनाव आयोग के अनुसार 294 सदस्यीय बंगाल विधानसभा में भाजपा ने 207 सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जबकि तृणमूल कांग्रेस 80 सीटों पर सिमट गई। कभी 34 साल तक बंगाल पर राज करने वाली CPI(M) सिर्फ 1 सीट जीत सकी।
राजनीतिक रूप से यह बेहद प्रतीकात्मक स्थिति है।
जो बंगाल कभी लोकतांत्रिक कम्युनिस्ट राजनीति का सबसे बड़ा गढ़ माना जाता था, वहां आज वामपंथ लगभग राजनीतिक नक्शे से गायब हो चुका है।
विश्लेषकों का मानना है कि 2011 में बंगाल की सत्ता खोना केवल एक चुनावी हार नहीं थी, बल्कि वहीं से वामपंथ के दीर्घकालिक पतन की शुरुआत हो गई थी।
केरल की हार ने खत्म किया आखिरी किला
केरल को वामपंथ का अंतिम मजबूत गढ़ माना जा रहा था। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश कर रहे थे।
लेकिन बेरोजगारी, भ्रष्टाचार के आरोप, सत्ता विरोधी माहौल और बदलती राजनीतिक अपेक्षाओं ने LDF के खिलाफ माहौल बना दिया। नतीजतन UDF ने निर्णायक जीत दर्ज की।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह सिर्फ एक चुनावी हार नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के एक बड़े अध्याय का अंत है।
आखिर क्यों कमजोर हुआ वामपंथ?
विशेषज्ञों के अनुसार वामपंथ का पतन अचानक नहीं बल्कि धीरे-धीरे हुआ।
लंबे समय तक सत्ता में रहने से पैदा हुई एंटी-इनकंबेंसी, कमजोर होता संगठन, युवा मतदाताओं से दूरी, नेतृत्व संकट और बदलती सामाजिक-आर्थिक राजनीति के साथ खुद को ढालने में असफलता इसके प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।
उधर भाजपा के तेज उभार और कांग्रेस व क्षेत्रीय दलों की लगातार मौजूदगी ने भी वाम दलों की राजनीतिक जमीन को लगातार छोटा किया।
जो विचारधारा कभी भारतीय राजनीति की स्थायी शक्ति मानी जाती थी, वह धीरे-धीरे चुनावी प्रभाव खोती चली गई।
भारतीय राजनीति का नया दौर
हालांकि वाम दल अभी भी ट्रेड यूनियनों, छात्र संगठनों और कुछ जन आंदोलनों में प्रभाव रखते हैं, लेकिन अब उनकी भूमिका सत्ता चलाने वाली नहीं बल्कि वैचारिक विपक्ष की रह गई है।
देश में किसी भी वामपंथी सरकार का न होना भारतीय राजनीति के वैचारिक संतुलन को भी बदल सकता है। मजदूर अधिकार, सरकारी क्षेत्र और कल्याणकारी अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर अब पहले जैसी संस्थागत आवाज शायद कम सुनाई दे।
करीब 50 साल बाद भारत के राजनीतिक नक्शे पर अब कोई “लाल राज्य” नहीं बचा है।
और भारतीय वामपंथ के सामने अब सबसे बड़ा सवाल सत्ता बचाने का नहीं, बल्कि अपनी प्रासंगिकता दोबारा साबित करने का है।