क्या आपने कभी किसी दैनिक अख़बार के प्रबंधन को अपने ही पहले पन्ने पर यह विज्ञापन प्रकाशित करते देखा है कि उसका अख़बार “बिक्री के लिए नहीं है” (Not For Sale)? समाचारों के लिए सबसे महत्वपूर्ण माने जाने वाले स्थान का उपयोग करते हुए The Assam Tribune के प्रबंधन ने 26 मई 2026 को एक प्रमुख विज्ञापन प्रकाशित कर स्पष्ट किया कि यह प्रतिष्ठित समाचार-पत्र बिक्री के लिए नहीं है।
लेकिन सवाल यह है कि The Assam Tribune के मौजूदा प्रबंधन को ऐसा असामान्य कदम उठाने की आवश्यकता क्यों पड़ी? सोशल मीडिया पर फैल रही अफवाहों का खंडन करने के लिए क्या एक संक्षिप्त स्पष्टीकरण पर्याप्त नहीं था? क्या इसे वैकल्पिक मीडिया में प्रकाशित खबरों पर की गई ‘अति-प्रतिक्रिया’ माना जाए, या फिर प्रबंधन किसी बड़े और महत्वपूर्ण घटनाक्रम पर पर्दा डालने की कोशिश कर रहा था?
कड़े शब्दों में जारी विज्ञापन में प्रमुखता से कहा गया कि “The Assam Tribune बिक्री के लिए नहीं है।” इसमें दावा किया गया कि अख़बार की कथित बिक्री को लेकर सोशल मीडिया पर चल रही अटकलें पूरी तरह निराधार और भ्रामक हैं।
विज्ञापन में कहा गया, “पिछले 88 गौरवशाली वर्षों से The Assam Tribune एक स्वतंत्र, विश्वसनीय और जिम्मेदार संस्था के रूप में खड़ा रहा है। यह पूरी ईमानदारी, साहस और पत्रकारिता की उत्कृष्टता के साथ राष्ट्र और जनता की सेवा के लिए समर्पित है।”
प्रबंधन ने यह भी चेतावनी दी कि जो व्यक्ति, समूह या संस्थान इस तरह की ‘आधारहीन और मानहानिकारक’ सामग्री के निर्माण, प्रसार या प्रचार में शामिल पाए जाएंगे, उनके खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
यह विवाद तब और गहरा गया जब मई 2026 के चौथे सप्ताह में सोशल मीडिया पर यह चर्चा तेज़ हो गई कि इस प्रतिष्ठित अख़बार को उद्योगपति गौतम अडानी के नेतृत्व वाले अडानी समूह को लगभग 421 करोड़ रुपये में बेच दिया गया है। देखते ही देखते कई जानी-मानी हस्तियों ने भी इन दावों को आगे बढ़ाया।
सोशल मीडिया पर किए गए दावों में कहा गया कि प्रबंधन लंबे समय से कर्मचारियों को नियमित वेतन देने में असफल रहा है और ट्रिब्यून मीडिया हाउस के 75 से अधिक पूर्व कर्मचारियों को अब तक उनके वैधानिक बकाए का भुगतान नहीं मिला है, जिसके कारण उन्हें न्यायालय की शरण लेनी पड़ी। हालांकि अधिकांश प्रतिक्रियाओं में लोगों ने अख़बार की कथित वित्तीय स्थिति पर चिंता और दुख व्यक्त किया।
पूर्वोत्तर भारत का यह सबसे पुराना मीडिया समूह वित्तीय चुनौतियों का सामना कर रहा है। इसकी पुष्टि ‘असम ट्रिब्यून कर्मचारी संघ’ के बयानों से भी होती है। संघ ने समय-समय पर वेतन और सेवानिवृत्ति लाभों के भुगतान में देरी का आरोप लगाया है। यूनियन ने कार्यालय परिसर में कई विरोध-प्रदर्शन किए और प्रेस वार्ताओं में यह दावा किया कि असम सरकार के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग पर विज्ञापन मद में बड़ी राशि बकाया है। प्रबंधन ने भी सरकारी बकाया राशि के शीघ्र भुगतान की आवश्यकता पर जोर दिया।
इसी बीच प्रबंधन ने अपने सहयोगी प्रकाशन ‘दैनिक असम’ का संचालन एक अन्य मीडिया समूह को सौंप दिया। नए प्रबंधन ने 17 सितंबर 2025 से अख़बार का कार्यभार संभाला, लेकिन 75 से अधिक कर्मचारियों की बकाया देनदारियों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इसके बाद प्रभावित कर्मचारियों ने न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया। रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने हाल ही में पूर्व प्रबंधन को बकाया राशि के भुगतान का निर्देश दिया है।
1939 में असम के उद्योगपति राधा गोविंदा बरुआ द्वारा स्थापित यह मीडिया समूह लंबे समय तक क्षेत्र में विश्वसनीय और निष्पक्ष पत्रकारिता का प्रतीक माना जाता रहा है। उल्लेखनीय है कि ट्रिब्यून हाउस ने वर्ष 2010 में देश में सबसे पहले मजीठिया वेतन बोर्ड की सिफारिशों को लागू किया था।
हालांकि हाल के वर्षों में समूह को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। ‘दैनिक असम’ के हस्तांतरण से पहले प्रबंधन ने अपने सात दशक पुराने टैब्लॉइड ‘असम बानी’ का भी प्रकाशन बंद कर दिया। यह साप्ताहिक अख़बार बाद में ‘दैनिक असम’ के रविवार परिशिष्ट के रूप में प्रकाशित हो रहा था। अंतिम बार इसका प्रकाशन 12 सितंबर 2025 को हुआ, लेकिन इसके बंद होने को लेकर कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई।
दशकों तक ट्रिब्यून मीडिया समूह ने असम और पूर्वोत्तर भारत के महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक घटनाक्रमों—जैसे भाषा आंदोलन, विदेशी-विरोधी आंदोलन, उग्रवाद, सामाजिक अशांति और क्षेत्रीय राजनीति के उभार—को प्रमुखता से कवर किया। कोविड-19 महामारी के बाद क्षेत्र के अधिकांश समाचार-पत्रों की तरह इसे भी प्रसार और विज्ञापन राजस्व में भारी गिरावट का सामना करना पड़ा।
मीडिया पर्यवेक्षकों का मानना है कि ट्रिब्यून हाउस ने लंबे समय तक अपनी संपादकीय विश्वसनीयता बनाए रखी, लेकिन हाल के वर्षों में इन मूल्यों पर आंशिक रूप से समझौता हुआ है। आलोचकों का आरोप है कि कुछ अवसरों पर संपादकीय रुख़ ने विवादों को जन्म दिया, जिससे संस्थान की दशकों पुरानी प्रतिष्ठा प्रभावित हुई।
भले ही ट्रिब्यून मीडिया हाउस आज गंभीर आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा हो, लेकिन कई जानकारों का मानना है कि इसका संकट केवल कोविड-19 महामारी का परिणाम नहीं है। उनके अनुसार संस्थान के भीतर संपादकीय जवाबदेही और प्रबंधन संबंधी समस्याओं ने भी स्थिति को जटिल बनाया है। ऐसे में यह सवाल अभी भी बना हुआ है कि क्या “Not For Sale” का यह विज्ञापन केवल अफवाहों का खंडन था या फिर इसके पीछे कोई और बड़ी कहानी छिपी हुई है।
(लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक हैं।)


