नव ठाकुरिया
तुलेसी डॉक्टर (Tulesi Doctor) यानी तुलसी चरण चौधरी की प्रेरणादायक कहानी, जिन्होंने Assam के ग्रामीण इलाकों में दशकों तक निस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा की।
हम अक्सर उन्हें एक लंबे-चौड़े और हट्टे-कट्टे सज्जन के रूप में याद करते हैं, जो तिहू टाउनशिप के दक्षिणी इलाकों की ग्रामीण सड़कों पर अपनी तिपहिया गाड़ी (रिक्शा) से घूमते रहते थे। इलाके में किसी के बीमार होने की खबर मिलते ही वे कहीं भी पहुँच जाते थे। इतना ही नहीं, उनके पहुँचते ही मरीज और उसके परिवार को उसके जल्द ठीक होने की उम्मीद बंध जाती थी। मखिबाहा के देउलारगुरी चुपा में स्थित उनका घर मेडिकल इमरजेंसी के समय ग्रामीणों के लिए एक भरोसेमंद ठिकाना था और वह दिन में लगभग 16 घंटे खुला रहता था।
वे थे तुलसी चरण चौधरी (12 अक्टूबर 1904–28 नवंबर 1986)—एक असाधारण ग्रामीण चिकित्सक, जिन्हें लोग प्यार से ‘तुलेसी डॉक्टर’ (Tulesi Doctor) कहते थे। उनके बेटे सतीश चौधरी हमेशा उनके साथ उनकी तिपहिया गाड़ी पर जाते थे। कभी-कभी उनके भतीजे डॉ. देबी चरण चौधरी, जो गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल रह चुके एक प्रसिद्ध चिकित्सक थे, भी समाज के पिछड़े वर्गों की सेवा के इस काम में उनके साथ शामिल होते थे।
मुझे कम-से-कम एक ऐसा अवसर आज भी याद है, जब तुलेसी डॉक्टर हमारे घर आए थे। मेरे तीन-चार चचेरे भाई-बहन बुखार से पीड़ित थे। मॉनसून की भारी बारिश के बाद वे पानी से लबालब धान के खेत में तैरने चले गए थे। बुढ़िया नदी के बाढ़ के पानी में मछली पकड़ने और तैरने के मामले में मैं थोड़ा अनाड़ी था, जैसा कि मेरे चचेरे भाई-बहन मानते थे। इसलिए अक्सर मुझे सड़क किनारे बैठकर उनके सूखे कपड़ों की रखवाली करनी पड़ती थी, जब तक कि वे अपना काम पूरा कर लें।
लेकिन अच्छी बात यह थी कि जब मेरे पिता, हरिमल ठाकुरिया, के बुलावे पर तुलेसी डॉक्टर हमारे घर आए, तो उन्होंने मुझे कोई इंजेक्शन नहीं लगाया। बरामदे में आराम से बैठकर तुलेसी डॉक्टर ने उन सभी को बुलाया, जो बीमार महसूस कर रहे थे, और एक-एक करके उन्हें इंजेक्शन लगाए। मुझे उनके दर्द से कराहते चेहरों को देखकर बड़ा मजा आता था।
बाद में तुलेसी डॉक्टर ने मुझे भी कुछ दवाइयाँ दीं, लेकिन साथ ही जोरदार और कड़े शब्दों में सलाह भी दी—बाढ़ के पानी में मत तैरना और इलाके में कभी आवारागर्दी मत करना। मन लगाकर पढ़ाई करना। तुम आने वाले कुछ वर्षों में हमारे इलाके के लिए एक अच्छे डॉक्टर बन सकते हो।
कुछ समय के लिए मैंने खुद को एक योग्य डॉक्टर के रूप में देखना शुरू कर दिया था—एक ऐसा डॉक्टर, जो मखिबाहा-भोजकुची इलाके के ग्रामीण लोगों का इलाज करता, ठीक वैसे ही जैसे ‘तुलेसी डॉक्टर’ ने पूरी ईमानदारी और निष्ठा से किया था।
असल में, अगर अब तक की मेरी परीक्षाओं के अंकों को देखा जाए तो मैं मेडिकल की पढ़ाई कर सकता था। लेकिन किस्मत को शायद कुछ और ही मंजूर था। मुझे लगता है कि जब वह मेरी किस्मत लिख रहे थे, तब घर की मालकिन से उनकी कोई अनबन हो गई होगी और उसी मानसिक तनाव में उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद भी मुझे पत्रकारिता के क्षेत्र में डाल दिया!
किस्मत के इस फैसले के कारण मुझे अपनी जिंदगी गुजारने के लिए कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लेकिन इस पेशे ने मुझे भारत के पूर्वी हिस्से के अलग-अलग इलाकों में ग्रामीण आबादी की कभी खत्म न होने वाली तकलीफों को करीब से देखने का एक अनोखा अवसर भी दिया।
लेकिन मुझे मानना होगा कि मैं कभी ‘तुलेसी डॉक्टर’ जैसा नहीं बन सकता था। उन्होंने पश्चिमी असम के नलबाड़ी—जो पहले कामरूप जिले का हिस्सा था—के पूरे इलाके को अपना घर बना लिया था। वहाँ लगभग हर घर उनके लिए अपने घर जैसा था।
आज के दौर में, जब बहुत पढ़े-लिखे डॉक्टर मरीजों की बीमारी का पता लगाने और इलाज करने के लिए अक्सर अत्याधुनिक तकनीकी उपकरणों पर निर्भर रहते हैं, तुलेसी डॉक्टर अपने स्टेथोस्कोप और उँगलियों के सहारे ही अपनी जिम्मेदारी निभाते थे। वे मरीज के शरीर की स्थिति का लगभग सही अंदाजा लगा लेते थे।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक स्वास्थ्य उपकरणों के आने से बहुत पहले के उस दौर में, तुलेसी डॉक्टर और उनके जैसे अनेक चिकित्सकों ने समाज के प्रति पूरी ईमानदारी, लगन और समर्पण के साथ इस नेक पेशे की मिसाल कायम की। मरीजों और उनके परिवारों से उन्हें जो सबसे बड़ी पूँजी मिली, वह थी भरोसा और विश्वास—ऐसी चीज, जो आज के समय में शायद ही देखने को मिलती है।
हमारे इलाके—जो नेपाल, भूटान, तिब्बत-चीन, म्यांमार और बांग्लादेश से घिरा है—में कुशल स्वास्थ्यकर्मियों, जिनमें डॉक्टर भी शामिल हैं, की संख्या बढ़ने के साथ स्वास्थ्य क्षेत्र में काफी सुधार हुआ है। फिर भी बड़ी संख्या में ग्रामीण परिवार आज भी इन नई स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित हैं।
पिछले कुछ वर्षों में नए डॉक्टर, नर्स और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों को तैयार करने के लिए इस इलाके, खासकर असम में, कई मेडिकल कॉलेज और संस्थान खुले हैं। लेकिन समय पर उचित चिकित्सा सुविधा न मिल पाना इस क्षेत्र के लिए अब भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वैश्विक मानक के तौर पर प्रति 1,000 आबादी पर कम-से-कम एक डॉक्टर और प्रति 1,000 आबादी पर दो नर्स होने चाहिए। लगभग छह करोड़ की आबादी वाले हमारे इस इलाके को आज भी बड़ी संख्या में और डॉक्टरों की जरूरत है। इसलिए यह क्षेत्र और अधिक डॉक्टरों का इंतजार कर रहा है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या आने वाले डॉक्टर आम ग्रामीण परिवारों की सेवा उसी लगन और आत्मीयता से कर पाएँगे, जिस लगन से तुलेसी डॉक्टर और उनके जैसे अनेक ग्रामीण चिकित्सक किया करते थे?
आमतौर पर एक ग्रामीण डॉक्टर लगातार निस्वार्थ सेवा करते हुए समुदाय के साथ गहरा जुड़ाव और जिम्मेदारियाँ निभाता है। बिना किसी तत्काल उपलब्ध सपोर्ट सिस्टम और पर्याप्त क्लिनिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के, ग्रामीण डॉक्टर अक्सर कई भूमिकाएँ निभाते हैं। इनमें लोगों से बातचीत करना और उनकी समस्याएँ सुनना भी शामिल है।
वे लोगों का इलाज केवल एक जगह बैठकर नहीं करते, बल्कि पूरे ग्रामीण इलाके में कहीं भी पहुँच जाते हैं। और वे सिर्फ बीमारी और दवाओं के बारे में ही बात नहीं करते। परिवार की भलाई, खेती, छोटे-मोटे कारोबार और समुदाय से जुड़ी दूसरी पहलों पर भी वे पूरी गंभीरता से चर्चा करते हैं।
पता ही नहीं चलता कि कब गाँव का डॉक्टर केवल एक हेल्थकेयर प्रोवाइडर से आगे बढ़कर परिवार का सबसे भरोसेमंद सदस्य बन जाता है—एक ऐसा व्यक्ति, जिस पर लोग न केवल चिकित्सा संबंधी मामलों में, बल्कि जीवन की दूसरी सामान्य समस्याओं में भी पूरा भरोसा करने लगते हैं।
मुझे याद है कि मरीजों के परिवार वाले ‘तुलेसी डॉक्टर’ को सम्मान के साथ उनका मेहनताना या मानदेय देते थे। वे पैसे को पारंपरिक ‘बोटा’ में रखते थे, जो बेल मेटल या पीतल से बना कटोरे जैसा एक बर्तन होता है।
इसे आज की दुनिया में प्रचलित बाजार-आधारित स्वास्थ्य व्यवस्था में डॉक्टर को दी जाने वाली महज फीस नहीं कहा जा सकता। यह एक असमिया परिवार के प्यार, सम्मान और स्नेह का प्रतीक था।
इस तरह, तुलसी चरण चौधरी ने समाज के प्रति पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ अपना जीवन जिया। चार दशक बाद, अपने प्रिय ‘तुलेसी डॉक्टर’ को याद करते हुए, मेरी ईश्वर से बस यही प्रार्थना है कि उस अनदेखी दुनिया में उन्हें हमेशा शांति और सुकून मिले।
लेखक पूर्वोत्तर भारत के वरिष्ठ स्तंभकार हैं।

